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शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

खोज जारी है......

खोज जारी है…......कभी कभी वापस अपने वादियूं में जाने का दिल करता है....वो गाँव का सुन्दर कल कल करती नदी का किनारा, वो हरे भरे खेत, वो कल कल करता शीशे जैसा साफ़ सुन्दर पानी, जिसमे न सरकार का बिल का डर है न ही कोई समय का लफड़ा, मीठे मीठे फल जिन्हें बंदरों की तरह तोड़ने में अपना अलग ही आनंद आता था, वहीं जाने का मन करता है, ना पर्दूषण ना ही खाने पीने का डर , प्रकर्ति की गोद में, प्रकर्ति के लिए और प्रकर्ति के लोगून के द्वारा......काश .....!एक दिन ...सिर्फ एक दिन वो भी बड़ी मशक्कत के बाद...... हफ्ते भर की इकलौती छुट्टी होती है,बाहर के इतने काम होते हैं की घर में रुक नहीं पाता हूँ ममी जी पैर पटकती रह जाती है कि कभी घर पर नहीं रुकता ये लड़का....दिन का खाना खाए घर पर मुद्दत हो गई है....खैर सिस्टर के घर गया था बूढ़ी सास का देहांत हो गया था.....काफी लोग मिले, वहा आये हुए थे.... अच्छा समय निकला छोटी भांजी के साथ ,बात करते हुए ,खेलते हुए....प्यारी प्यारी सी बात, छोटे बच्चे करते हैं...कहते हैं ना भगवान् का रूप होते हैं बच्चे...सच कहा है....अच्छा लगा। पहली बार कुछ अलग तरह के लोगू से मिलना अछा लगा....उसके बाद पुरानी जगह गए जहां कभी काम करते थे, कई पत्रकार मिले वहां, पुराने दिनूं की याद ताज़ा हो गई, जब कभी आकाशवाणी जाया करते थे... इनके साथ काम किया और बहुत अच्छा समय निकला।लगातार जद्दोजहद रहती है हर पल मीडिया में। जब तक आप अपने न्यूज़ रूम में पहुंचते हैं, आप मानसिक रुप से पूरी तरह तैयार हो चुके होते हैं। अगले दिन के लिए आपको फ़िट भी रहना है, और आज का काम भी पूरा करना है, परफेक्ट तरीके से । पूरा दिन थकाने वाला होता है। खाने-पीने की सुध नहीं रहती। फिर भी करना तो है। क्योंकि यही सोचा था कि यही काम करेंगे। और कितने लोग हैं दुनिया में, जो वो करना चाहते थे, वही कर रहे हैं? मैं अपने आप को इस बारे में बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मैं आज जीवन के ऐसे दौर से गुज़र रहा हूँ, जहाँ पर मुझे दिल्ली से निकलना ज़्यादा अच्छा लगता है। छोटे शहरों में काम करना ज़्यादा अच्छा लगता है। लोगों से ज़्यादा-से-ज़्यादा मिलना मुझे बहुत अच्छा लगता है। बड़े शहर अब रास नहीं आते हैं। लेकिन हमारा काम पूरी तरह से दिल्ली और नॉएडा में होने की वजह से कहीं-न-कहीं एक मजबूरी भी है बड़े शहर में रहने की। बहरहाल, मेरी शांति और सुकून की जद्धोजहद और खोज जारी है..... और मैं भी आशा करता हूँ कि इसका रास्ता भी मिल ही जाएगा…

शनिवार, 23 जनवरी 2010

दिल्ली की ठण्ड और शमशान घाट....

जनवरी का महिना और ठण्ड न हो ऐसा कैसे हो सकता है और इस ठण्ड का मंजर क्या होगा....अंदाजा लगाए तो दिल्ली के निगम बोध घाट से ज्यादा उपयुक्त जगह और क्या हो सकती है.....निगम बोध घाट जी हाँ ऐसी जगह जहाँ पर हिन्दू लोग अंतिम संस्कार करने आते हैं....में भी गया था चौहान जी की माता जी के अंतिम संस्कार में भाग लेने.... न्यूज़ रूम में था रात घर से फ़ोन आया की चौहान जी की माता का देहांत हो गया है सुबह अंतिम संस्कार होगा ....रात ऑफिस से घर देर पंहुचा.. जिस वजह से सुबह जल्दी नहीं उठ सका और थोडा देर हो गई शमशान पहुचने में. फिर भी जब तक पंहुचा तब तक मृतक का पार्थिव शरीर अग्नि के हवाले कर दिया गया था. बस अग्नि ने मृतक शरीर को अपनी आगोश में लगभग पूरी तरह ले लिया था ......मंजर देखा था चौकाने वाला ! कम से कम ३०-४० मुर्दे एक साथ.....हे भगवान्....! जहाँ देखो मुर्दे ही मुर्दे .....खैर पहली बार नहीं जा रहा था इसलिए कोई डर या फिर सहम की बात नहीं थी लेकिन इतने सारे मुर्दे देख कर निश्चित ही मन में कई सवाल उठे....... अंतिम सत्य भी वही है....सभी ने यही आना है....एक दिन ! चौहान जी का परिवार मेरी कजन सिस्टर का परिवार है. खैर गया तो देखा यमुना नदी किनारे मुर्दे ही मुर्दे जल रहे हैं....अधिकतर इनमे से बुजुर्ग थे जो ठण्ड के कारन परलोक सिधार गए. अम्मा जी की उम्र भी 80 के ऊपर थी. लेकिन इस बार की ठण्ड वो भी नहीं सह सकी और जिंदगी को अलविदा कह दिया1. रिकॉर्ड मेन-टेन करने वाले से पुछा तो बोला कि सर आज तो अधिक तर बूढ़े ही आये हैं, और अब तक 4३ मुर्दे आ चुके हैं..........जबकि उस टाइम बजा था शाम तक पता नहीं क्या होगा..?और कितने मुर्दे आयेंगे? बगल में बिजली से जलाने वाला बड़ा सा हाल था वहां पर भी भीड़ लगी हुई थी. मन ही मन सोचा मरने वालूँ कि भी कमी नहीं है इस दुनिया में....खैर ये सब इश्वर कि मर्जी है कौन कब किधर जायेगा...मुर्दे जलाने के लिए लकडियाँ देखी तो कची थी, और मुर्दे के ऊपर कोई चीनी तो कोई घी कोई वही बैठे एक लाला जैसे इंसान से लकड़ी के बॉक्स के पतले फट्टे खरीद रहा था, जो चंडी लूट रहा था एक लड़की का बॉक्स का मतलब 3०० रुपये, जो पेटी सेब या फिर फ्रूट कि होती है. ये हाल हैं शाम शान घाटों का. ....मुह में पान चबाये सर में पंडित जी वाला लाल कपडा लपेगे हुए ऐसे लग रहा था जैसे वही इस शमशान घाट का प्रधान हो, और हो भी क्या पता.....मगर वहां का मंजर देख कर दिल दुखी जरुर हुआ, अंतिम संस्कार कि जगह भी इतनी बुरी तरह बिकी हुई है जहां देखो ब्यापार ही ब्यापार ...इंसान को मर कर भी चैन नहीं मिलना...अंतिम संस्कार करने वाले पण्डे तो ऐसे लग रहे थे जैसे मवाली, और इतनी बुरी तरह से काम कर रहे थे जैसे उनमे होड़ लगी है मंदी में कौन कितनी जल्दी सब्जी बेचता है या फिर ग्राहक को पकड़ता है....और जलने के बाद उस राख को एक तसले में दाल कर यमुना के नाले जैसे गंदे पानी में डूबा कर चांटा है और उसमे कुछ सोना या फिर कुछ कीमती चीज़ मिलती है तो उसको मुह में दाल लेता है.....हे भगवान् ! इंसान कैसे कैसे काम करता है.....जवान युवक जिनकी उम्र 15-25 साल की बीच है वो ऐसा कम करने में लगे हुए हैं....काम तो चलो जैसा भी है लेकिन जिस तरीके से कर रहे थे वो अजीब था.....सच में मंज़र बड़ा खतरनाक था वो ..... एक इंसान मरे इंसान के शरीर को जलाकर,बहाकर,हिलाकर.... कैसे - कैसे अपना पेट भरता है.....वो भी यमुना किनारे....राजधानी दिल्ली हाल ये है.....ठण्ड में इससे खतरनाक मंजर और कही का नहीं हो सकता है.....

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

थ्री ईडियट्स और एक कन्या....





जगह- द्वारका सेक्टर चार का राजापुरी बस स्टॉप, समय- सुबह के दस बज के चालीस मिनट के आस पास . मैं ऑफिस जा रहा था, हालांकि ड्यूटी ३ बजे से थी, लेकिन कुछ ज़रूरी काम करना था तो सोचा कि जल्दी पहुंचा जाये और वैसे भी दिल्ली में आफिस जाना रोज़ किसी युद्घ पर जाने से कम थोड़े ही है- तीन घंटे भीड़, धुआं और धक्के से लड़ते हुए जाना और उतनी ही जद्दोजहद करके वापिस आना . नेहरु प्लेस के लिए द्वारका-नजफगढ़ की हॉट-फेब्रेट बस नंबर ७६४ की इंतज़ार में खड़ा था, क्यूंकि इस टाइम बस में भीड़ नहीं होती और सीट आराम से मिल जाती है. जैसे ही मैं बस स्टॉप पर पहुंचा...वहां दो तीन लोग और थे. लो फ्लोर बस में जाने का मूड था- ब्लू लाइन के झूले सहने की हिम्मत नहीं थी, और फिर वह साथ में पूरी जिल्ली के दर्शन भी तो कराते हुए जाती है. ऊपर से बस स्टाफ का व्यवहार- मासा अल्लाह ! कभी हरियाणवी गलियां तो कभी अजीबोगराब हरक़तें. .... इन बस वालों से पूरी दिल्ली वाक़िफ है...यही वजह है कि आज सरकार इन्हें हटाने पर तुली है ......इसी हटाने की प्रक्रिया का भुक्त भोगी भी बना मैं. . ख़ैर दो ऑप्शन थे मेरे पास- या तो वातानुकूलित बस आ जाए या फिर नॉरमल. थोड़ी देर में दो युवक कंधे पर चमड़े का काला एक्ज्कुतिव बैग लिए बस स्टॉप पर आये. सूट- बूट में एकदम कसे हुए वो भी अपने- अपने युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार लग रहे थे. दोनों मेरे बग़ल में आ कर बैठ गए और इसके साथ ही उनसे मेरा रिश्ता जुड़ गया- रिश्ता तीन योद्धाओं का. अब उनमें से जो इमरान नाम के शख्स़ थे , बड़े ही रसिक मिज़ाज के इंसान लगे....और बड़े चटक भी. जबकि उनके साथी महापात्र जी उनसे उलट -शांत स्वभाव के और कम बोलने वाले.....दोनों ही जीवन बीमा का काम करते हैं और बताया कि ये तीन महीने उनके लिए बड़े ही उपयोगी होते हैं, इस टाइम लोग टैक्स बचाने के चक्कर में होते हैं और इसी वजह से इनकी पोलिसी बन जाती है....दोनों ही सेल्स मेनेजर थे देश की अग्रणी कंपनी में, जो दो भाइयों की है लेकिन वे अपने काम से कम और आपसी विवाद और झगडे से ज्यादा फेमस हो गए हैं.हमारे बीच एक सुंदर- सी कन्या बैठी थी- लाल स्वैटर, नीली जीन्स, चाइनीज जूते और मुंह में च्वींगम. तो जनाब इमरान जी ने अपना विज़िटिंग कार्ड लड़की को पकड़ा दिया और फटाक से पूछा- कहां पढ़ती हो? लड़की ने बताया कि वो फैशन डिजाइनिंग की स्टुडेंट है और साउथ एक्स के किसी संस्थान से तीन साल का कोर्स कर रही हैं... उनके पिता जी किसी कंपनी में मेनेजर के पद पर हैं, ये सब जानकारी इमरान ने ली और साथ में हमारे कानों तक भी आई...हमें लगा कि अब तो यह लड़की को पटा कर ही मानेगा लेकिन उसका मुंह खुलते ही हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया. लड़की से कहा गया - आप अपने पापा को बोलना की मुझे फ़ोन करे, और टैक्स बचाने के मामले में हम उनसे बात करेंगे, और उन्हें अच्छी सलाह देंगे. उसकी बीमागिरी देखकर लड़की ने हां में सिर हिला दिया और अपनी पॉकिट में बड़ी ही बेदर्दी से विजिटिंग कार्ड डाल लिया. इतने में एक ब्लूलाइन बस स्टॉप पर आकर रुकी, उसके पाछे- पीछे हमारी लो-फ्लोर भी चली आई. लेकिन ब्लू लाइन वहां खड़ी होने के कारण वो बिना रुके उसके पीछे से निकल गई.. और हम पैर पटकते रह गए... उस वक़्त बलूलाइन पर ऐसी भड़ास निकली मानो बरसों की गर्मी से राहत दिलाने इकलौता सावन आया था और ऐसे ही निकल गया. तीनों के मुंह से निकला- अब तो हम बैठते ही नहीं इस बस में.....और वो कंडक्टर बेचारा हमारी शक्लों की ओर कुछ डरी –सी मुद्रा में देख रहा था ......कन्या के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, शायद उसे बसों की ज्यादा जानकारी नहीं थी .फिर एक और ब्लू लाइन बस आई, और हमारे कोप का भाजन बनी. आखिर फैसला हुआ कि हम लो फ्लोर बस में ही जायेंगे, इमरान जी बार बार कह रहे थे- मुझे तो जल्दी नहीं कालका जी रहता हूँ और लो फ़्लोर बस में ही जाऊँगा. और हमें पूरे कॉनफिडेंस के साथ यह आश्वासन भी दिए जा रहे थे कि अभी और लो- फ्लोर बसें आएंगी लड़की ने भी कहा कि वो भी लो फ्लोर में ही जायेगी- खुन्नस जो निकालनी थी ब्लू लाइन पर... लगा कि अब तो इमरान जी इनके पूरे परिवार का बीमा करके ही जाएंगे..इस बीच हम सभी का एक दूसरे से परिचय हुआ- कौन क्या करता है कहां रहता है....इत्तिफाक से लड़की के भैया किसी न्यूज़ चैनल के कर्मचारी निकले और ....फिर कन्या ने हमसे दूरभाष संख्या मांगी और हमारा पद और नाम भी पूछा लेकिन हमने अपना और चैनल का नाम बताया, दूरभाष संख्या नहीं दी...बातचीत से सभ्य लग रही थी...और भावी योजनाओं में लड़की ने बताया की उसका अब फैशन डिजाइनिंग में इंटरस्ट नहीं रहा है शायद भविष्य में वो लाइन चेंज करे.....हमने बताया कि जो आप कर रही हैं वो भी जाया नहीं जायेगा , और आपके काम ही आएगा, लड़की के चेहरे पर कुछ आत्मविश्वास के भाव दिखे,...इस बीच हमारे आगे से तक़रीबन १०-१२ ब्लू लाइन बस निकली मगर हम किसी में नहीं चढ़े. कितने जिद्दी थे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है. मगर बस स्टॉप पर बैठे-बैठे २ घंटे बीत गए और १ बजने को हो रहा था...इसी बीच लड़की ने कहा- मेरी तो क्लास ही १ बजे की है और मुझे अभी पहुंचना था . लेकिन लगता है मुझे अब घर जाना चाहिए, कब पहुंचूंगी अब? इमरान के साथी महापात्र जिद्द करने लगे की चलो यार ब्लू लाइन पकड़ते हैं और चल पड़ते हैं, लेकिन इमरान जी थे कि- नहीं, लो फ्लोर आएगी... और हम उन पर विशवास कर बैठे....हम तो खुन्नस में थे न की कैसे ब्लू लाइन बस ने हमारी लो फ्लोर बस निकलवा दी.....
.....इस बीच वह स्टॉप जेएनयू का ढाबा हो चला था -हम और महापात्र ...राजनीति, मीडिया, देश , बीमा,अमरीका पता नहीं क्या-क्या डिस्कस कर बैठे वहां पर.....खैर महापात्र वैसे अच्छे जानकार लग रहे थे.....और इंसान भी अच्छे लगे. इस बीच कन्या ने अपने घर फ़ोन किया और बताया कि वह बस स्टॉप पर बैठी है और बस नहीं आई, और वापस घर आ रही है, और चल पड़ी.....! फिर हम तीनों बात करते रहे ....थोड़ी देर बात इमरान जी के प्रवचन शुरू हुए......बोले- सर ये लो फ्लोर बस है न वो १०:३० वाली लास्ट थी, हम रोज के यात्री हैं और हमें पता है...अब ४ बजे से पहले कोई लो फ्लोर नहीं आएगी.....uffffffffffffffff जब आपको पता था तो ऐसा क्योँ किया.....कन्या जब तक सामने थी- बस आएगी आयेगी और वह चली गई तो ४ बजे के बाद आयेगी....उसने शायद हमें 4 बजे तक बेवाकूफ़ बनाने की सोची थी पर कन्या के जाते ही अब वह भी हमारी श्रेणी में ही शामिल हो गया था... इसलिए सच्चाई बताने में ही भलाई समझी .चढ़ जाओ ब्लू लाइन बस में अब....जहाँ से कहानी शुरू हुई थी वही आ कर रुक गई. ऊपर से उस खुन्नस का क्या हुआ ?.....उस भड़ास का क्या हुआ....?मन तो ऐसा किया कि बस क्या कर दूं....कैसे इंसान होते हैं.....खैर हंसी भी आई और रोना भी, पछतावा भी और सर पकड़ के बैठना भी पड़ा.....खैर एक ब्लू लाइन बस आई, बोला चलो इस में चलते हैं में बोला नहीं एक देख लेते हिं इसे जाने दो...दूसरी फिर से ब्लू लाइन बस.....मैंने कहा चलो अब में यहाँ पर नहीं रुकना चाहता ...ढाई घंटे बैठे रहे अंत में उसी बस में....उफ़....! चलो बस में बैठे और आ गए नेहरु प्लेस ...वे भी साथ में आये, रास्ते में महिला वाली सीट खाली हुई तो इमरान जी फटाक से बैठ गए....मै और महापात्र हंस पड़े, नहीं सुधरेंगे इमरान ! मुझे दूसरी साइड सीट मिल गई एक स्कूल का छात्र उठा में उस सीट पर बैठ गया.....महापात्र को भी सीट मिल गई मेरे बगल में ही....नेहरु प्लेस आया तो उतरने पर पूछा- इमरान भाई ऐसा क्योँ किया हमारे साथ.......क्या माजरा है...खैर अब तक हम समझ चुके थे-.थ्री इडियट्स और एक लड़की हो तो.....! फिर भी वो बोले- चलो नीचे उतरते हैं फिर बताता हूं. मैंने सोचा पता नहीं क्या रह गया अब...नीचे उतरे तो इमरान ने अपने मोबाइल में नंबर दिखाया महापात्र को और कहा की बगल वाली का नंबर है , यानी बस में जिसके बगल में बैठे थे जनाब ! चीज़ पहुची हुई है ये....वहां भी अपनी बीमा की बीमारी से बाज नहीं आया.. बोले- बॉय फ्रेंड से मिलने आई है. जान न पहचान ये भी पता कर लिया ...मैने सोचा- बीमा लाइन ही ठीक है...कैसे लड़की से अन्दर की बात पूछ लेते हैं.....महापात्र बोले- अपनी आदत नहीं सुधारेगा....बोला नहीं यार फिर तो हो लिया बिज़नस , दे दिया बिज़नस ! पब्लिक डीलिंग का काम है काहे की शर्म..मन ही मन सोचा- भैया ,लगता है इसे कहीं चप्पल - थप्पड़ नहीं पड़े....या फिर जेल जाना पड़ जाए- वह भी संभव हो सकता है...ख़ुदा करे ऐसी नौबत न आये नहीं तो जेलर के पूरे परिवार का बीमा कर डालेंगे. ख़ैर हमारे बीच एक नया रिश्ता जुड़ गया था..और अब तक काफ़ी गहरा भी हो चला था...................................

रविवार, 17 जनवरी 2010

एक अच्छे राजनेता का अंत....

ज्योति बसु ....एक ऐसा नाम जो राजनीती में नेता नहीं बल्कि सच में राजनेता थे....पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के देहांत से देश की राजनीती से एक अहम् राजनेता का अंत हो गया.....दुखद है....राजनीती के लिए देश के लिए...देश को ऐसे नेता की जरुरत थी....खासकर बंगाल के लिए तो बहुत दुःख की बात है....उन्हूने जिंदगी भर गरीबूं के लिए काम किया और एक अछे राजनेता की तरह राजनीती की....अपने शरीर को मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर उन्हूने एक और मिशाल कायम की....बसु ने करीब सात साल पहले ऐलान किया था कि उनकी मौत के बाद 'गणदर्पण' नामक एनजीओ को उनकी बॉडी डोनेट कर दी जाए। ऐसे नेता को कौन नहीं याद करेगा....मगर एक सीख भी है आज के नेताओं के लिए....उनसे कुछ सीखें....तो इस देश का भला हो जायेगा....अंतिम सलाम इस राजनेता को हमारा !

एक रात सफ़दर जंग हॉस्पिटल में....



कहते हैं इंसान का कुछ पता नहीं होता कि कब क्या हो जाये ....और यही हाल हुआ मेरे साथ लेकिन इस हाल -ए -दरम्यान में बहुत कुछ सीखा भी....बात है जनवरी तारीक १० की ........ऑफिस गया,....दो दिन से सवास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था..कारन ठण्ड का ज्यादा होना दिल्ली में ....जिस वजह से ज़ुकाम और खांसी कि शिकायत कुछ ज्यादा हो रही थी....इस बीच मैंने सोचा कि चलो कुछ दवाई ले लूं ....और ली भी , उस अजीब टेबलेट ने मेरी हालत और खराब कर दी....फिर भी ऑफिस गया....ऑफिस में डेस्क पर सिर्फ तीन लोग थे ....बरिष्ठ घर पर थे उन्होंने घर पर बुलाया भी था शाम को खाने पर...लेकिन वहां भी नहीं जा सका....मेरी हालत रात ७ बजे बाद ख़राब होने लगी...लेकिन सोचा कि लास्ट बुलेटिन १२ बजे जाना है उसके बाद फ्री हो जायेंगे और फिर निकल लूँगा....लेकिन ११ बजे मुझे रहा नहीं गया...ब्रेथिंग प्रॉब्लम होने लगी क्यूंकि टेबलेट ने छाती जाम कर के रख दी थी...ट्रांसपोर्ट में फ़ोन किया राहुल को कि जल्दी घर ड्रॉप करवा दो ....उन्हूने जल्दी करके मुझे १२ बजे गाड़ी दे दी....मेरे साथ राजेश, वरुण,विवेक और एक लड़का नया था वो भी साथ आये....ऑफिस से चले थे तो सभी साथी लोगू ने कहा कि सर आपको जल्दी और सीधे घर ड्रॉप करेंगे....मैंने कहा चलो देखते हैं ...
थोड़ी दूर निकले थे तो ड्राईवर ने कहा कि सर तेल कम है इसलिए पम्प पर चलना पड़ेगा.ऐसे में बड़ा अजीब लगा कि आज ही इसका तेल- पानी भी कम होना था...खैर वो भी जरुरी था...लिया वो भी....ड्राईवर साहब तोतले बोलने वाले थे ....आधी बात समझ आये आधी बात सर से हां-ना हो रही थी....खैर साउथ एक्स आते- आते मेरी हालत और बिगड़ गयी...सफदरजंग अस्पताल के सामने पंहुचा तो ड्राईवर को बोला कि गाड़ी इमरजेंसी में ले चलो.....सभी घबराए....कि क्या हुआ? ...हालत लगता है ज्यादा ख़राब तो नहीं? ....खैर गए अमर्जेंसी में....डॉक्टर का झुण्ड अलग -अलग बैठा था... जैसा रेस्टोरेंट में होता है....२ लोग [डॉक्टर] उस टेबल में ३ उस टेबल में....कोई मरीज को देख रहा था कोई लैपटॉप में चैटिंग या मेल चेक करने में लगा हुआ था....खैर....एक टेबल पर गया बाद में पता चला कि वो हड्डीयौं का है...टूट फूट वाले मरीज़ जाते हैं उसके पास....वो बोला सामने जाओ...सामने गया तो पता चला कि वो कही और ब्यस्त था....और शक्ल से नोर्थ ईस्ट का रहने वाला लग रहा था...डॉक्टर को हेल्लो कहा और प्रॉब्लम बताई...उसने पुछा कि कहाँ गए थे ?क्या कर रहे थे....? जैसे कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो मैंने.......उसका भी सायद प्रश्न ठीक था...क्यूंकि रात के १२:३० बज रहे थे...फिर वही डॉक्टर बोला कि बगल वाली बिल्डिंग में चले जाओ...वहां फ्लू वाला डॉक्टर होगा...उसको दिखाओ....निकला बाहर....बगल वाली बिल्डिंग देखि....दरवाजा खट-खटाया तो गार्ड बहार आया और बोला क्या बात है....फिर पूछा मरीज़ कहा है....?
राजेश ने बताया कि यह है..मेरी ओर इशारा कर के.....फिर टेबल पर बैठा...डॉक्टर बोला कि अपना कोट खोलो...और स्वेटर भी ....उसने मुह में पहनने के लिए मास्क दिया....इस बीच उसने गले में प्रेस कार्ड देख लिया....पूछा प्रेस से हो ? मैंने कहाँ हाँ ! जोर्निलिस्ट हूँ रास्ट्रीय न्यूज़ चैनल में ! और ऑफिस से घर जा रहा था...बस हालत खराब हो गई आपके दर्शन के लिए आना पड़ा....अभी....उसने साड़ी बात पूछ पाच के बोला ठीक है एमर्जंसी में जाना होगा..बाहर से आओ..में अन्दर से आता हूँ ...फिर बाहर गया...फिर से वही शुरू वाला डोक्टर के पास ...इस बीच इस डोक्टर ने कुछ उस डोक्टर को बताया.....और कहा कि इनको नेबुलैज करना है....वो भी पहली बार पता चला कि यह भी होता है...फिल्मू में देखा था....फिर मुझे बैठा दिया एक बेंच में और कोने में...और मुह में एक ओक्सिजन वाला मास्क चिपका दिया....और बगल में एक सिलिंडर जिसमे से हवा और पानी कि एक छोटी सी बोतल.... जिसमे से पानी कि कुछ बूँदें टपक रही थी....मास्क मेरे नाक पर रख कर चिपका दिया ...थोड़ी देर बाद थोड़ी राहत मिली....कुछ कुछ....तक़रीबन २० मिनट तक चिपका के रखा फिर निकाल दिया और अन्दर सिस्टर के पास ले गए....सिस्टर बोली अब तक कहाँ था....डांटते हुए....गुस्सा बहुत आया..एक तो आदमी बीमार ऊपर से ये दांत रही है....मैन्नार्स नाम की कोई चीज़ भी है इसे? फिर सोचा की में तो हॉस्पिटल में हूँ....इंडिया के हॉस्पिटल में यही मैन्नार्स होता है....खैर नहीं तो ऊंची आवाज तो में भगवन की भी न सुनूँ....खैर मतलब अपना था...तकलीफ अपनी थी....इसलिए चुप रहा ....उसने इंजेक्सन निकाल कर मेरे हथेली में उलटी तरफ एक सुई घुसा दी ....भगवान् जाने कौन सी दवा थी.....खैर सरकारी अस्पताल था यकीन कर भी सकता था और नहीं भी...मन दुबिधा में था...मगर दुःख में डोक्टर भगवान् होता है...इसलिए मेरे साथ भी वही हुआ....लेकिन यहाँ लगता कि प्रेस कार्ड काम कर गया...जिस कारन थोड़े अलर्ट हो गए वे डॉक्टर....वरना हम और लोगों की हालत देख रहे थे.....फिर बताया कि फिर से एक बार और नेबुलैज़ करना होगा...चलो करेंगे भाई....उतनी देर में एक लड़की को और वही मास्क चिपका दिया...जो मुझे लगाया था....उसी के साथ मुझे भी बैठा दिया......और फिर से वही २० मिनट....राजेश जी सेवा पानी में लगे हुए थे....वो पूछ के आये डॉक्टर को कि क्या करना है आगे?....फ्लू वाले डॉक्टर ने बताया कि आपको इसके बाद ३२ नंबर कमरे में जाना है.....जो मुझे राजेश द्वारा बताया गया....राजेश को दवाई /मेडिकल कि जानकारी अछी थी....मेरी किस्मत से....भला हो उसका....मुझे घर भी छोड़ गया बाद में....खैर इस बीच मैंने कहा कि बाकी साथी को घर छोड़ दो......ड्राईवर को बोलना कि हॉस्पिटल में आ जाए..रिलीव हो गए तो ठीक है नहीं तो ऑफिस चला जायेगा....खैर २० मिनट हुए और विवेक और वरुण ने घर जाने से मना कर दिया और एक साथी घर चला गया...वे बाहर ठण्ड में ठिठुर रहे थे ...राजेश मेरे साथ ही था अन्दर...क्युओंकी एक को ही साथ रहने कि इजाजद थी......

में और राजेश दोनों गए लिफ्ट की ओर ......३२ नंबर कमरा कहा हैं....पता लगा कि तीसरी मंजिल में हैं....हमारे आगे एक सिस्टर जा रही थी...लिफ्ट का बटन दबाया उन्हूने जैसे ही लिफ्ट का दरवाजा खुला सामने से मुर्दा निकला बाहर .....एक ब्यक्ति लेटे मुर्दे को बाहर धकेल रहा था....रात के १:०० , १:३० बजे और सुन शान हॉस्पिटल में मुर्दे से आमना -सामना....हे भगवान् ! कैसे कैसे विचार दिल में ....मुर्दा निकला तो स्ट्रेचर में उसके पैर के पास एक रजिस्टर रखा हुआ था.....टेडी नज़र उसकी और देखा और इतनी देर में लिफ्ट का दरवाजा खुला और सामने गार्ड बैठा नज़र आया...सिस्टर अपने रूम में चली गई ...सायद सोने जा रही थी....सरकारी हॉस्पिटल हुआ न....सर्दी का टाइम मरीज भी कम हुए.....पहले देखते रहे कहा जाना है किस कमरे में जाना है....फिर गार्ड से पुछा भाई ३२ में जाना है....वो उठा और ले गया वार्ड के अन्दर से जहा डोक्टर बैठा हुआ था दो नर्स भी बैठी थी...देखा तो बोला मरीज बाहर और राजेश ने बात की ...उसने बाहर आ कर पीठ में चेक अप किया...पूछा कहा गया था किधर से आया....फलां ....फलां....?फिर अंगुली में कुछ रिंग जैसी डाली उसमे कुछ नम्बर दिख रहे थे....मुझे कहा कि आप पीठ मेरी और कर के खड़े रहिये..पत्रकार हुए हर चीज़ देखने पढने कि आदत हुई......फिर कहा कि नीच चले जाइये और एक्स -रे कर के लाइए..मैंने सोचा इसने पल्ला झाड लिया....और इस रात को सरकारी हॉस्पिटल में कौन एक्स रे करेगा मेरा....खैर नीचे गए राजेश आगे- आगे में पीछे पीछे.......तब तक ब्रेथिंग में थोडा आराम मिल गया था....थैंक्स नेबुलैज़ का .....नीचे गए तो सु-सु लग गई...अब टोइलेट/बाथरूम कहा मिलेगा...थोडा उधर को गए तो कुत्ते बैठे थे....फिर डर भी लगा कि कही काट न ले....राजेश बोला कर ले यार कही भी दिवार के पीछे...कौन देख रहा है.....मैंने भी सोचा कर लेना चाहिए और रही कुत्ते वाली बात तो यहाँ मेरे जैसे पता नहीं कितने आते होंगे....सु-सु करने...सुना है सु सु करते समय कुत्ता भी नहीं काटता ...सोचा पहले सु-सु कर लूं फिर देखा जायेगा......और वैसे भी कुत्ते भी जानते ही होंगे.....आदत हो गई होगी इनको भी कि सु सु करने आया है......शुक्र कि वे भौंके नहीं..... न ही पीछे भागे.....फिर चल पड़े वो एक्स रे वाला कमरा ढूँढने.....एक कमरे का दरवाजा खुला था...उसके अन्दर देखा तो एक आदमी सोया था..उसने हमारा कागज देखा तो बोला रुको....वो उठा और बगल वाले हॉल में ले गया और पुराने बटन दबाये....फिर एक जैसे रेलवे प्लात्फोर्म में वजन नापने वाली रंग बिरंगी मशीन लगी होती है वैसी थी...मगर वो रन बिरंगी नहीं थी....मैंने सोचा आये हैं एक्स रे के लिए और वजन क्योँ नाप रहा है ये...उसने मुझे उसके ऊपर खड़ा होने को कहा और में घबराते हुए खड़ा हो गया....और फिर मशीन को कहा कि टाईट पकड़ा लो..जैसे किसी को गले लगाना हो..गले लगाया..इतनी देर में उसने कहा कि चलो आधे घंटे बाद आना....और ले जाना.....एक्स रे ...जिंदगी में पहली बार करवाया था एक्स रे ....अब तक लोगो के हाथ में ले जाते हुए या फिर फिल्म में देखा था मैंने...सोचा बड़ा आसान है और बड़ी जल्दी हुआ एक्स रे ....बाहर आये राजेश बोला चल चाय पी लेते हैं........गए बाहर तो विवेक और वरुण दोनू बैठे हुए थे.....बेसर्ब्री से .....वरुण बोला सर चाय लता हूँ आपके लिए ..... वरुण मेरे लिए चाय लाया और राजेश को भी दी...वरुण ने नहीं पी....और विवेक गायब...सायद सु - सु करने चला गया था......थोड़ी देर बाद टाइम हुआ और राजेश बोला चल एक्स रे ले आते हैं ..... ...तब तक ड्राईवर भी आ गया....गाड़ी ले कर......गए अन्दर एक्स रे लिया....और वो आदमी सोया हुआ था......पूछा भैया ले जाएँ क्या? वो बोला ले जाओ....वो फिर सो गया...सरकारी हॉस्पिटल हुआ न ......ठाट ही कुछ और हैं.......खैर ऊपर गए ३२ नंबर में..डॉक्टर ने देखा ....फिर कुछ लिखा और बोला कि दवाई ले लेना तीन दिन कम से कम रेस्ट और आराम न हो तो चार दिन और ले लेना....फिर हमें रवाना करने वाला था...डॉक्टर पूछ बैठा कि क्या करते हो?......उसे पता चला कि बेचारा पत्रकार है तो इशारा किया सिस्टर को कुछ ......सिस्टर उठी और उसने एक मोटा सा इंजेक्सन मेरी हथेली में घुसा दिया ....और हम चले आये...गाड़ी में बैठे...घर तक राजेश छोड़ने आया....फिर चला गया....घर वालू को पता नहीं था कि में हॉस्पिटल से आ रहा हूँ ....

रात १० बजे के आस पास मैंने मामी को फ़ोन कर कहा था कि मेरे लिए गरम पानी रख देना....ऑफिस में अपने बरिष्ठ राम सर को मैंने एस एम् एस से सूचित कर दिया था......सबसे पहले उनको ही मैंने बताया था.....घर आया...सो थोड़ी नींद आई ....और एक हफ्ते घर से बाहर नहीं निकला.........रोज़ वही टेबलेट, सिरप, गोली गटकना !..कोशिश है ऐसा न हो दुबारा......ऑफिस से सभी बरिष्ठ और साथी लोगों ने फ़ोन पर हाल पूछा और आराम करने को कहा ........अमित सर, राम सर, रुपेश सर, सह्नावाज़ सर, निगम सर, अजीत, हासिम,तरुण, अभिषेक...राम....सभी ने अभिषेक राजेश...........धन्यवाद सभी का.....एक हफ्ते के आराम और इलाज़ के बाद फिर से संडे को ऑफिस ज्वाइन किया.....कुल मिला कर सरकारी हॉस्पिटल ने बचा लिया.........

शनिवार, 9 जनवरी 2010

ड्रामा तीन पागलों का ....





चेतन भगत ने आंखिर माफ़ी मांग ही ली....सुबह अखबार पढ़ा तो पता चला की आमिर खान से माफ़ी मांगी है...और दूसरे लोगू से माफ़ी मांगी या नहीं... उसका पता नहीं अभी....खैर इंडियन लेखक...सबसे ज्यादा इंडियन बुक, जो बिकी हो वो वाले लेखक...और पता नहीं क्या क्या....थ्री मिस्टेक ऑफ़ माय लाइफ...हो या वन नाईट @ कॉल सेंटर या फिर झगडे की जड़ वाली किताब फाइव पॉइंट सम वन.......के लेखक चेतन भगत.... ने ऐसा क्योँ किया ?किस लिए किया?.ये तो वही जाने और थोडा बहुत लोग जानते भी हैं जो भी है कही न कही अपनी फजीहत तो करा ही ली.....वे पहले से ही अपनी मार्केट बना चुके थे और उनकी किताब बिक भी रही थी....फिर भी बॉलीवुड से पंगा...वो भी आमिर जैसे टीम से ....क्या कह सकते हैं...?जो भी हो..पिछले दिनू नॉएडा में हुई प्रेस कांफेरेंस जिसमे विधु विनोद चोपड़ा मीडिया पर बिफर पड़े थे और 'शट अप' जैसा शब्द खुल्लम-खुल्ला बोल दिया था....मीडिया काफी नाराज़ हुआ इसके बाद और दुसरे दिन ही माफ़ी भी मांग ली मीडिया से , प्रेस कांफेरेंस करवा कर...हिंदुस्तान में पहले कतल कर दो फिर सॉरी बोल दो....प्रचलन पुराना है और अब यह हमारे खून में घुस चूका है....कुल मिला कर यह सब ड्रामा चेतन भगत और विधु विनोद चोपड़ा और आमिर खान जैसे ब्यक्ति से जुड़ा रहा ....और जो आमिर भेस बदल बदल कर पुरे देश में घूम रहे थे और जनता देख रही थी आमिर का परफेक्ट ड्रामा पर एक दम से नॉएडा की प्रेस कांफेरेंस ने विराम लगा दिया.....आंखिर वाद विवाद का दौर शुरू हुआ ...और यहाँ तक कह दिया गया की वे अब चेतन भगत का चेहरा देखना तक पसंद नहीं करेंगे.....फिल्म के लिए स्क्रिप्ट खरीदी या फिर वैसे ही दी या फिर जो भी समझौता हुआ ..उसके बावजूद ऐसा झगडा होना वो भी एक लेखक एक फिल्म मेकर और एक उम्दा कलाकार के बीच ऐसा झगडा होना वो भी मीडिया के सामने......देख कर शर्म आई...वजह जो भी हो दिमाग वाली बात कही रही नहीं ....कुछ भी हो...में इस विवाद के पीछे क्या बाते हैं , थी...या फिर होंगी....उस पर नहीं जाना चाहता .....जो भी है जनता को बेवकूफ बनाने की है...और दोनु को इसका फ़ायदा हुआ है....फिल्म, भी हित और किताब भी बिकेगी.....कुकी जो फिल देखेगा वो किताब कभी नहीं पढता होगा तब भी पढ़ेगा......इसकी को कहते हैं अंग्रेजी में 'कुरिओसिटी मैनिया'....जो हम लोगूँ में होती है......कुल मिलकर आमिर का बनारसी पान,साडी और शादी का ड्रामा बनाम चेतन भगत के कमरे से सीधा पर्सारण.... एक नया अध्याय लाया देश में ...की कैसे लड़ के सफलता छीनी जा सकती है !

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नए साल का पहला दिन....ऑफिस में पार्टी !

नए साल पर हमेशा की तरह ममी जी ने मुझे नए साल की बधाई दी और आशीर्वाद .....उठा तो देखा की फ़ोन में काफी मैसेज आये हैं ....शुभ काम नाए लोगूँ ने दी और मैंने उनको.... तैयार हुआ .......खीर बना रखी थी घर पर ममी ने.....बहुत स्वादिस्ट थी....और जब ३१ जनवरी की रात ३ बजे घर पंहुचा था तो गाजर का हलवा ममी ने बना रखा था...बहुत स्वादिस्ट था....थका था बहुत....१:३० बजे रात तक डेस्क पर ही थे....मुंबई, दिल्ली से लाइव पार्टी जा रही थी, नए वर्ष के अवसर पर....२ बजे ऑफिस से निकला....न्यूज़ रूम का माहौल भी अपने आप धीरे धीरे बदलने लगता है....बेशक न्यूज़ रूम में ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिलता है....बावजूद इसके एक दुसरे के साथ ....विश करके लोगूँ को खुशिया देकर सकूं फील कर लेते हैं....एक जनवरी को ऑफिस पंहुचा तो देखा की ४:३० पर पार्टी का मेल आया हुआ था...नया वर्ष पर पार्टी का आयोजन किया गया था....सभी कर्म्चारियौं को निमंत्रण था.....गए भी .....नाच, गाना, पीना [कोल्ड-ड्रिंक] ,पेस्टी.....अच्छा लगा, साथी लोगूँ को खुश देख कर.....और ख़ुशी हो तो फिजा का रंग और ही हो जाता है....ऐसा ही कैफेटेरिया में देखने को मिला...नए साल का पहला दिन पार्टी, और नाच गाने के साथ हो तो क्या कहने....वही हुआ .....शुक्रिया सभी का....और शुक्रिया पिछले साल को जो चला गया लेकिन बहुत यादे भी अपने पीछे छोड़ गया.....सफलता , असफलता , दुःख , सुख सब लगा रहता है......लेकीन इक पल अपने साथ जीना अपने साथ काम करने वालू को के साथ जीना , वाकई खूब था....बाई बाई २००९ , वेलकम २०१० ....................