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शनिवार, 29 मई 2010

आंसुओं के नमक में जो बात है

दिल्ली शहर की रोशनी को इकट्ठा किया था

फिर भी मेरा आशियान सज़ा नहीं

तूफान को फिर भी वो सह गया था

पर हवाओं से बिल्कुल भी बचा नहीं

शाम तो चमक रही है रंगों से

मगर रात के मंज़र का पता नहीं

लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा है

फिर भी अकेलेपन की कोई दवा नहीं

बहुत मशक्कत है इस ज़िंदगी के खेल में

जो उलझता है वो निकलता नहीं

जी तो लूंगा मैं इस बेबसी में भी

मगर मेरी सांसों की इसमें रज़ा नहीं

आंसुओं के नमक में जो बात है

हंसी की मिश्री में वो मज़ा नहीं

खुली हवा में घूमते हैं हम सब पर

घुटन से कोई भी निकला नहीं

रहगुज़र की तलाश में भटकते रहे हैं

पर सुकून को कोई भी ढूंढता नहीं

मुमकिन है दुनिया में लोगों से मिलना

पर खुद से मैं कभी मिला नहीं
राजेश 'प्रतिबिंब' दरियागंज,

महिला....क्या हूँ में ?


क्या हूं मैं?
किसके लिए हूं मैं? क्या मैं...मैं हूं?
क्या है मेरा नाम? क्या है मेरा अस्तित्व?
ये तो मैं हूं जिसका अस्तित्व ही बेनाम है हां किसी की बेटी,
पत्नी,
मां,
बहन हूं मैं पर क्या मैं स्वयं में मैं नहीं,
मेरा कोई अस्तित्व नहीं?
मैं जुड़ी हूं हर रिश्ते से पर मुझसे जुड़ा कोई रिश्ता नहीं आई थी
इस संसार में मैं बिना अस्तित्व के बिना अस्तित्व के ही चली जाऊंगी पर एक संदेश,
मैं इस दुनिया को बेझिझक दे जाऊंगी
यद्यपि मेरा अस्तित्व बेनाम है फिर भी तुम्हारा हर नाम मेरे अस्तित्व से जुड़ा है
यही मेरे अस्तित्व का नाम है जिसकी आज भी कोई पहचान नहीं और आज भी गुमनाम है।।
साभार दीक्षा देहरादून से

रविवार, 23 मई 2010

झुग्गी से निकला IAS हरीश चन्द्र !

झुग्गी में रहने वाला एक लड़का बना आईएएस !जी हाँ यह सच है....है न फक्र की बात..ये कारनामा कर दिखाया दिल्ली में 208 नंबर झुग्गी में रहने वाले हरीश चन्द्र ने..... सचमुच बहुत बड़ा काम कर दिखाया हरीश जी ने..न केवल अपने लिए बल्कि समाज और पूरे देश के लिए ....रिजल्ट आने के दूसरे दिन जब हरीश जी हमारे न्यूज़ रूम में आये थे, और मेरे सीट के बगल में बैठे, मेरे जूनियर ने मुझे बताया की सर ये हैं आईएएस हरीश चन्द्र...!मैंने उनसे हाथ मिलाया और बधाई दी, यूपीएससी परीक्षा में पास होने पर..और पूछा क्या विषय थे? और कैसे तैयारी की ?उन्हूने सब कुछ बताया...दिल बहुत खुश हुआ, कोई इतनी गरीबी से पढ़कर इतने ऊंचे ओहदे पर पंहुचा है...इस बीच उनका थोड़ी देर में बुलेटिन में स्टूडियो से लाइव होना था....में फिर से न्यूज़ रूम में ख़बरों में ब्यस्त था....मन बहुत खुश था की कोई सख्स जो जमीन से जुड़ा हुआ है और इस मुकाम तक पहुचा...वो भी झुग्गी में रहते हुए..आप अंदाजा लगा सकते हैं झुग्गी की जिंदगी कैसी होती है..उन्हूने बताया की ये मेरा पहला और आंखिरी प्रयास था...क्यूंकि अगले प्रयास के लिए सायद माता पिता साथ नहीं दे पाते क्यूंकि गरीबी का जिन्न जो उनके दरवाजे पर कुंडली मारे बैठा हुआ था..लेकिन कहते हैं न मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.ऊपर वाला जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है..वही हुआ..हरीश चन्द्र ने हार नहीं मानी हालातों से... और आज सर्बोच्च सीट पर बिराजमान है...में उनको देख कर एक पल तो हक्का-बक्का रह गया...लेकिन उनकी विल पॉवर देखकर गर्व भी हुआ...सबसे बड़ी बात झुग्गी से पले-बढे और इस मुकाम तक पहुचना बड़े फक्र की बात है...

दिल्ली की झुग्गी झोपडी में रहने वाले दिहाडी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर। यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाडी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाडी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।
मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें
मैंने संघर्ष की ऎसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पडती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पडता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाडी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपडी की हालत ऎसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।
मेरी हिम्मत: मां और बाबा
मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढाई पर पडा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढाई छोडने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पडेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेद्र सर
यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विष्ाय थे। विष्ाय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड है। उनका पढाने का तरीका ही कुछ ऎसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।
मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में न आए
मैंने जिंदगी के हर मोड पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थतियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को टयूशन पढाया और खुद भी पढता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।
मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान
मेरी जिंदगी में सबसे बडा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऎसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सबकुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।
मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो
मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छाशक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यो को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, 'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.. '....सच में काबिले तारीफ....!समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के लिए प्रोत्साहित करने का उम्दा उदाहरण प्रस्तुत किया है हरीश चन्द्र ने !मेरी ओर से एक बार फिर से उनको हार्दिक बधाई !
[साभार राजस्थान पत्रिका]

शनिवार, 22 मई 2010

मेंगलुरु हवाई हादसा...अपनों ने अपने खोये....

समय सुबह 6 बजकर 3 मिनट, आसमान में एयर इंडिया का एक विमान हवा के साथ बातें करते हुए मेंगलुरु हवाई अड्डे पर उतरने की तैयारी में था..... इसमें सवार 158 लोग और छः क्रू मेंबर भी सवार थे. ये सभी दुबई से अपने वतन भारत रहे थे. एक विदेशी पाइलट और एक इंडियन पाइलट इस जहाज को उड़ा रहे थे....दूसरे वतन से अपने वतन लौट आने की इंतज़ार में उनके परिजन पूरी रात नहीं सो पाए थे.... ही दुबई से उड़ने के बाद वे सभी लोग जो अपनों से मिल पाने की ख़ुशी में इंतज़ार की हद पार कर पार रहे थे..एक एक पल उनके लिए मुश्किल होती जा रही थी.....
बोइंग 737-800 एयर क्राफ्ट को छः बजकर 3 मिनट पर जैसे ही लैंड करने के लिए एटीसी से हरी झंडी मिली, हवाई जहाज नीचे रन वे की तरफ दौड़ने लगा. ..थोड़ी दूर रन वे पर पहुचते ही ये क्या ...?जहाज रन वे से बाहर जाने लगा...और कुछ सेकंड्स के अन्दर हवाई अड्डे के साथ बने गड्ढों में जा गिरा..और एक ब्लास्ट हुआ जिसमे सिर्फ आठ भाग्यशाली लोगों को छोड़ कर बाकी मौत के मुह में शमा गए. ....बताया जाता है कि लैंडिंग के वक्त प्लेन का टायर फट गया और उसकी लेफ्ट विंग में आग लगगई। पायलट प्लेन पर कंट्रोल खो बैठा। प्लेन सीधे रनवे की फेंसिंग तोड़ते हुए खाई में जा गिरा। प्लेन के परखच्चे उड़ गए और उसमें आग लग गई। इसके लिए जिम्मेदार कौन, क्योँ इतने लोगों की जान गई? कौन है असल में जिम्मेदार इस हादसे का?इसका जवाब आने वाले दिनों में सरकार को देना पड़ेगा. आंखिर ना जाने कितने परिवार तबाह हो गए...... जाने कितने लाल चले गए इस दुनिया से...

शुक्रवार, 21 मई 2010

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी



एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी

दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी

ख़ामोशी
का हासिल बही इक लम्बी सी ख़ामोशी
उन
की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी
[गुलजार की कलम से ]

नदी का हाले-बयां .....

एक नदी की बात सुनी...
इक शायर से पूछ रही थी
रोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर
मेरे
सीधी राह चलाते हैं
रोज़ ही तो मैं नाव भर कर,
पीठ पे लेकर
कितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।
रोज़ मेरे सीने पे लहरें
नाबालिग़ बच्चों के जैसे
कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

क्या ऐसा हो सकता है जब कुछ भी न हो कुछ भी नहीं...
और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँ
बस ठहरी रहूँ
और कुछ भी न हो !

जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,
मैं पड़ी रहूँ...!

[गुलजार की कलम से ]

बुधवार, 19 मई 2010

अफजल गुरु पर सरकारी राजनीती क्योँ

भारतीय लोकतंत्र का मंदिर संसद हमले का आरोपी अफजल गुरु फांसी को फांसी की सजा काफी पहले सुना दी गई थी...कोर्ट ने अपना काम कर दिया ..लेकिन अब तक हुकूमतें आपस में छुप्पन- छुपाई का खेल खेलने में लगी हुई है...फांसी अभी तक नहीं हो पाई है....अगर पुरे देश से पूछें तो लगभग सभी लोग यही कहेंगे की उसे जल्द से जल्द फांसी हो जानी चाहिए....मगर ये इस देश का दुर्भाग्य है जिस तरह से उसकी फाइल इधर-उधर की यात्रा कर रही है और केंद्र और राज्य सरकार की बीच झूलने में लगी हुई है ....उससे तो एक बात साफ़ है अफजल को फांसी देने में इन सरकारी नेताओं के मन में कही न कही सॉफ्ट कॉर्नर जरुर है..वरना ऐसी क्या मजबूरी कि इतना समय लग जाए . खैर कल जब दिल्ली की मुख्यमंत्री से मीडिया ने पूछा तो वो साफ़ जवाब नहीं दे पायी...और मामला असमंजस में ही दिखा...शाम होते होते खबर आई कि फाइल उपराज्यपाल के पास भेज दी गई है....

उपराज्यपाल ने फाइल एक घंटे के अन्दर वापस दिल्ली सरकार के पास फाइल भेज दी और पूछा स्पस्ट क्या कहना है...जैसे खबर आ रही थी.....इससे मुख्यमंत्री महोदय नाराज लग रही थी...ऐसा क्योँ? अगर चाहती होती तो क्योँ न जल्द दात्खत कर अपनी सरकार की प्रतिक्रया दे कर मामले को निपटा दें. लेकिन वही राजनीती.....सी एम् साहिबा को तो कोमन वेल्थ का भूत परेशां कर रहा है ऊपर से अफजल का जिन्न उनके सामने खड़ा हो गया है...मना करती हैं तो बुरा और हाँ करती हैं तो मुश्किल...अब ये मुश्किल क्या है ये तो वही जाने..लेकिन कुछ तो कुछ तो है...वरना इतने बड़े मुद्दे पर वो ढिलाई नहीं दिखाती.....

जिस तरह की प्रक्रिया हमारे देश में चल रही है वो ठीक नहीं है...क्यूंकि दोषी को जब सजा हो गई है...वो जल्द से जल्द और गिने चुने दिनों के अन्दर उसको सजा दे देनी चाहिए...इससे देश का मजाक बनता है...और आतंकी दुस्साहस करने में फीसे पूरी कोशिश कर सकते हैं....इससे उनका ऐसे काम करने में और विश्वास बढेगा....उनको बल मिलेगा....इससे लोगों में न सिर्फ गलत मेसेज जाएगा बल्कि सरकार कि कार्यकुशलता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है....और बिपक्ष इसका भरपूर लाभ उठाएगा...उसे एक नया मुद्दा हाथ लग जायेगा, और यह तो देश कि सुरक्ष्या का भी मामला है, और देश कि जनता इसे गंभीरता से ले सकती है....आगे आने वाले चुनावों में सत्ता पक्ष को नतीजा भुगतना पद सकता है....उस समय विकास नहीं बल्कि ठोस मुद्दे हावी रहते हैं....जनता इन नेताओं को लुटियन ज़ोन कि पहाड़ी से बहार खदेड़ देगी.

जो भी है इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार को जल्द और फांसी पर अपनी मुहर लगा देनी चाहिए. वरना दिल्ली सरकार के लिए इस मुद्दे पर आने वाले दिन परेशानी भरे हो सकते हैं. जल्द ही यह बहस भी छिड़ सकती है कि इतना लम्बा प्रोसेस क्योँ ? जब कोर्ट ने सजा दे दी तो सीधे राष्ट्रपति के पास भेजी जानी चाहिए...वो भी सिमित दिनों के अन्दर....इस तरह से सरकारी नेताओं के पास नहीं भेजी जानी चाहिए....और यह भी जरुरी हो गया है कि इतने लम्बे प्रोसेस को कम करने के लिए सरकार को जल्द ही विधेयक ला कार कानून में संसोधन लाने पर विचार करना चाहिए...क्यूंकि इसकी आवस्यकता और बढ़ गई है...देश आतंकवाद से जूझ रहा है...कबी नक्सल तो कभी माओवादी...कभी लश्कर तो कभी और उग्रावादी गुट.....अगर आतंकवाद से लड़ना है और देश में शान्ति कायम रखनी है तो सख्त कानून तो बनाना ही पड़ेगा.

रविवार, 16 मई 2010

भगदड़ में 2 की मौत और रेल मंत्री का अजीब बयान....





रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.

मृतकों और घायलों के परिवार वालों के प्रति सम्बेदना जताने के बजाय उल्टा जिम्मेदार लोगों को ही बता दिया गया है....ऐसे बोली जैसे उनकी कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही है ही नहीं है...खैर...नयी दिल्ली रेलवे स्टेसन पर जो हादसा रविवार दोपहर में हुआ वो भयानक था. एक तो सूर्य की मात..गर्मी का परा ४५ डिग्री के आस पास ऊपर से लोग घर परिवार के साथ इधर उधर जा रहे थे..ऐसे में ऐसी भगदड़ होना और फिर मौत.....! सच में निंदनीय है. रेल मंत्री ने मृतकों और घायल लोगों के खिलाफ कुछ पैसे देने की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी. जांच की घोषणा कर डाली. खुद बैठी हैं कोलकता में... दिल्ली आने की जहमत भी नहीं उठाई. ना कोई प्रेस कांफेरेंस...सिर्फ एक बाईट दे दी...जो भी है भगदड़ इसलिए हुई क्योँ की ट्रेन १२ के बजे १३ पर आई....जबकि उद्घोषणा १२ की हुई थी.....ये रेलवे की गलती नहीं तो किसकी है ?ममता बनर्जी को इसका जवाब देना चाहिए...और ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयान देने से पहले सोचना चाहिए...रेल मंत्री होने के कारण उन पर बड़ी जिम्मेदारी है..वे इसे हलके में नहीं ले सकती....रेलवे को और दुरुस्त और नियमित होने की जरुरत है...वरना विश्व के इस बड़े रेल नेटवर्क को ऐसे हादसों का सामना आगे भी करना पद सकता है .....जब हमारे संवादाता वहां पहुचे, मंजर बेहद खतरनाक था और लोग आक्रोशित थे. रात नौ बजे तक लाइव चला लेकिन न रेल मंत्री न कोई दूसरा मंत्री सामने आया. सब संडे का जश्न मनाने में मग्न थे. जिनकी जान गई जो घायल हुए जो बेहोस पड़े हुए हैं उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं....ये देश के नेताओं का हाल है....जो समाज सेवा का
दम भरते घूमते फिरते हैं और लुटियन ज़ोन के बिलों में छुपे बैठे हैं. ....

सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है


सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है
ये ज़मी दूर तक हमारी है

मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ
जिससे यारी है उससे यारी है

हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है

मैं तो अब उससे दूर हूँ शायद
जिस इमारत पे संगबारी है

नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है

फ़लसफ़ा है हयात का मुश्किल
वैसे मज़मून इख्तियारी है

रेत के घर तो बह गए नज़मी
बारिशों का खुलूस जारी है

{अख्तर नाजमी की रचना}

तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर



तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी
मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी|

रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर,
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी|

हज़ार उल्फ़त सताए लेकिन मेरे इरादों से है ये मुमकिन,
अगर
शराफ़त को तुमने छेड़ा तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी|

[ख्वाजा मीर दर्द की रचना......]

शुक्रवार, 14 मई 2010

गांव वालों ने बनाये पॉवर प्लांट के अधिकारी बंधक,पोती कालिख

एक बार फिर से ग्रामीणों का गुस्सा निजी कंपनी के अधिकारियौं पर उतरा.....यही नहीं बल्कि उन्हें सजा भी दे डाली....लोकतंत्र में ऐसा होना क्या जायज है? फिर पुलिस और कानून का क्या मतलब रह जाता है? जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ....अभी हालत तनावपूर्ण है....इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया है... रायगढ़ जिले के खरसिया विकास खंड के ग्राम दर्रामुडा में लगने वाले एक निजी पावर प्लांट एस के एस पावर ली। के विरोध में उतरे ग्रामीणों ने कल प्लांट के तीन अधिकारीयों को सुबह लगभग १० बजे से बंधक बना लिया था उन्होंने तीनो अधिकारीयों को पीटा तथा अर्धनग्न कर मुंह पर गोबर पोतकर घंटो कड़कती धूप में खड़ा कर दिया उनसे कंपनी मुर्दाबाद के नारे लगवाए और मुर्गा बनने पर मजबूर किया अधिकारयो ने कान पकड़ कर उठक बैठक भी की ।
मौके पर पंहुची पुलिस ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया पर ग्रामीण नहीं माने इस बीच ग्रामीणों ने प्लांट की कार में जमकर तोड़फोड़ की वे कलेक्टर को गाँव में आने की बात पर अड़े रहे अंततः अतरिक्त कलेक्टर श्री शर्मा के मौके पर पहुचने के बाद किसी तरह शाम ५.३० पर अधिकारियो को मुक्त कराया गया ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचे ऐ डी एम् , ऐ एस पी और एस डी ऍम को बंधक बनाने का प्रयास किया तब जाकर तमाशबीन पुलिस ने लाठी चार्ज किया और अश्रुगेस के गोले दागे उधर ग्रामीणों ने भी पत्थर बाजी की जिसमे एस डी ओ पी खरसिया का हाथ टूट गया और लगभग ६ सिपाही घायल हो गए ग्रामीणों ने कम्पनी की कार को आग के हवाले कर दिया और पुलिस के वाहनों में भी तोड़ फोड़ का प्रयास किया देर शाम गाँव पहुचे कलेक्टर ने दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की बात कही देखते ही देखते गाँव की घेराबंदी कर दी गयी।
आज सुबह से ही गिरफ्तारियो का सिलसिला चालू है अभी तक लगभग ३० ग्रामीणों को हिरासत में लिया गया है इधर गिरफ़्तारी को लेकर ग्रामीण गुस्से में है पुर गाँव फौजी छावनी में तब्दील हो गया है . प्रदुषण की मार झेल रही जनता और आपने खेती किसानी की जमींन छिनने पर नाराज ग्रामीणों का कानून अपने हाथ में लेने का यह पहला मामला है जनआक्रोश की इस बानगी को देख कर लगता है की आगामी १७-०५-२०१० को होने वाली जन सुनवाई में ग्रामीणों का विरोध खुलकर सामने आयेगा . फिर से एक बार ग्रामीणों के गुस्से के शिकार अधिकारियों को होना पड़ा है, कहीं न कहीं तो कमी जरुर रही है.....और पॉवर प्लांट निजी है इसलिए भी ग्रामीणों ने ऐसा किया है. लेकिन किसी अधिकारी के मुह पर कालिख पोतना और ऐसी सजा दे कर कानून हाथ में लेना ठीक नहीं है. ....

बुधवार, 12 मई 2010

राहुल & बिल गेट्स गाँव में.......



राहुल गाँधी और कम्प्यूटर किंग बिल गेट्स भारत के गरीब देहात में दो दिन के दौरे पर इस भरी गर्मी में अपने आप को तपा रहे हैं. एक गाँधी खानदान का सूर्य और दूसरा कम्प्यूटर का किंग ! एक भारत जैसे लोकतंत्र में प्रशिद्ध और अविवाहित नेता है तो दूसरा विश्व के दूसरे लोकतंत्र अमेरिका में जन्मा और पला, बढ़ा, सफल और औसत दर्जे का पढ़ा लिखा इंजिनियर ! दोनू ही अमेठी जैसे इलाके में इस भरी गर्मी अपने को 'न बाथ'करवाने में लगे हुए हैं, और वो भी उस इलाके में जिसके पीछे सिर्फ गाँधी परिवार का टैग लगा हुआ है.....वो इलाका इन्ही के नाम से हुंकार भरता है. ..कारण सब जानते हैं... वही से गाँधी परिवार से कोई न कोई सांसद हर बार लोकतंत्र के मंदिर में पहुचता है.

राहुल गाँधी विदेश में पढ़े लिखे हैं और अच्छी सोच रखने वाले युवा नेता हैं. अपने साथ बिल गेट्स को ले गए....इरादा क्या था कुछ समझ में आता कुछ नहीं भी....खैर पहली दफा तो यही लगता है वो कुछ न कुछ आर्थिक सहायता या फिर कोई संस्थान वहां पर खुलवाना चाहते हैं....दूसरी भाषा में कहें तो बिल गेट्स का पैसा लगवाना चाहते हैं....चलो शुक्र है...इन पचास सालों में कुछ तो अच्छा होगा अमेठी में या फिर वही गरीबी और वही दुःख भरी दास्ताँ दिखाई देगी...शायद वहां कि जनता अब विकास के इंतज़ार में भूखी बैठी है....खैर राहुल गाँधी पीआर [पब्लिक रिलेसन ]में परफेक्ट नेता बन गए हैं . उनको देख कर बिपक्षी दलों के कुछ नेता भी उन्ही के राह में चलने लगे हैं...कहीं भी गाडी रोक कर गरीब आदमी का हाथ पकड़ लो, घर में जा कर खाना खा लो,हाल चाल पूछ लो.....आधी रात में कमरे से निकल कर सीधे गाँव में घुस जाओ...खुद भी मत सोना और गाँव वालों को भी मत सोने दीजिये.....ये लोजिक समझ नहीं आया....मिलना तो दिन में भी हो सकता है ....?जहाँ तक सुरक्ष्या और खतरे वाली बात है रात में तो और भी ज्यादा है....खैर अपना अपना अंदाज है ! मगर एक बात काबिले तारीफ है राहुल कम से कम अपने इलाके में जाते तो हैं वहीं आजकल के नेता लोग चुनाव जीतने के बाद सब कुछ भूल जाते हैं....कि उनका संसदीय इलाका कौन है.....और अपने लुटियन जोने के बिल से निकलने में घबराते हैं......

बिल गेट्स ने उत्तराखंड में अपना ठिकाना बना लिया अब अगला अमेठी तो नहीं है ये देखना होगा? राहुल गाँधी भी शंका में रहेंगे तब तक जब तक मायावती कि सरकार रहेगी...क्यूंकि तब तक कोई प्रोजेक्ट बिना बहनजी के हरी झंडी से हो पाना संभव होगा या नहीं देखना वाली बात होगी...फिर भी बिल गेट्स जैसे इंसान का आना अच्छी बात है.....! बेस्ट ऑफ़ लक राहुल & बिल

मंगलवार, 11 मई 2010

आनंद बने दूसरी बार विश्व के राजा

अपने ग्रेंडमास्टर विश्वनाथ आनंद फिर बने विश्व चैंपियन ! जी हाँ पिछले कई सालों से इस सख्स ने देश का नाम रोशन किया है... देश का गौरव बढ़ाते हुए आनंद ने विश्व चेस चैंपियनशिप के फाइनल में वेसलीन टोपलोव को हराया वो भी सिर्फ 56 चालों में शिकस्त देकर खिताब पर कब्ज़ा कर डाला...
इस गेम में बारह गेम खेले जाते हैं...और इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भारतीय ग्रेंडमास्टर ने टोपलोव के 5.5 अंक के मुकाबले 6.5 अंक अर्जित कर जीत हासिल की। पहले भी आनंद ने इसे 2008 में इस खिताब को जीता था।खास बात पहले पूरे आनंद टोपलोव से हार गए थे फिर अगले मुकाबले में ड्रा खेला.... गजब की टक्कर दी क्योँकी पहले हार और फिर दिमागी रूप से मजबूत और हमेसा तेज़ी से चाल चलने वाले आनंद आंखिर कार राजा साबित हुए.....और अंत में चौथे गेम में उन्हूने बाज़ी मार ली और और एक अंक की बढ़त ले ली...

लेकिन एक बात हमेशा जहाँ में जो नाम, कवरेज,सोहरत आनंद जैसे खिलाड़ी को मिलनी चाहिए, वो नहीं मिली....आंखिर ऐसा क्योँ? वो सच्चे खिलाड़ी हैं, देश के लिए इतना नाम कमाया है उन्हूने, और एक अच्छे इंसान भी हैं...मीडिया ने भी खासकर इंडियन मीडिया ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी..अखबार में तो छाये रहे लेकिन टीवी पर सिर्फ खबर चला दी...ब्रेकिंग चला दी, और कुछ नहीं .....क्रिकेट होता तो एक एक बाल पर क्या हुआ एक्सपर्ट बैठा दिए होते.....और पता नहीं कितने इनाम दे चुके होते...कितने मीडिया वाले कैमरे ले कर पीछे पीछे भाग रहे होते....भारत की बादशाहत अब दिख रही है...रशिया अब इसमें पीछे होता दिख रहा है ....कुछ भी हो आनंद को हमारी ओर से ढेर बधाई.....!

गुरुवार, 6 मई 2010

कसाब को फांसी......!

आंखिर मिल ही गई पाकिस्तानी कसाब को फांसी की सजा....स्पेसल जज तहिलियानी ने सुनाई सजा!...अब देखना यह है कब उसे फांसी लगती है....और वो शुभ दिन कब आ पाता है?...आज का दिन बड़ा गहमा -गहमी का रहा...दो बजे ऑफिस पंहुचा तो देखा सभी चैनल में एक ही खबर चल रही थी...अब होने वाला है सजा का ऐलान ...अब कुछ ही देर में .....सो-सो .....सजा सुनाने के बाद मीडिया के लोगों की जो हालत हो रही वो देखने लायक थी..और ख़ुशी भी हो रही थी...कैसे लोगों तक खबर पहुचाते हैं....और कितनी मेहनत करनी पड़ती है...एक-एक खबर के लिए...वो सच में एक अलग शोट था.....अपने-अपने चैनल, अखबार के लिए कबर करते हुए सभी बड़े उत्सुकता और चतुर तरीके से काम कर रहे थे...अब देखना बाकी है किस दिन कसाब को फांसी दी जाती है.....मुंबई हमले वाले दिन रात्री शिफ्ट में था...अकेले था..पूरी रात कैमरा लाइव मोड में था.....और आतंकी दनादन गोलियां बरसा रहे थे....हमारी ३-४ चार यूनिट लगी हुई थी....सभी मुस्तैद थे....और ताज जलता जा रहा था...अच्छी तरह याद है....वो रात..........!

बुधवार, 5 मई 2010

टीवी पत्रकार शहीद !

एक पत्रकार की मौत हो गई.....खबर कबर करते हुए....फिर से खबर को सर्वोपरि रखते हुए इस पत्रकार ने अपनी जान गवां दी.....अजय तिवारी सहारा समय/एनसीआर के लिए काम करते थे....जब में रिपोर्टिंग करता था, उस समय हमने कई बार साथ खबर कबरेज की थी.बाद में डेस्क पर आ गया और दूसरी जगह नियुक्ति होने के कारण मुलाक़ात कभी कभार हो जाया करती थी...मगर मुझे हमेसा उन्हूने अच्छी बात बताई....खाफी तेज तरार और चतुर पत्रकार माने जाते थे....हमेसा बोलने में किसी भी विषय पर पकड़ तो थी ही साथ ही हर इंसान के साथ मिलन सार भी थे...अपने पीछे पत्नी और ढाई साल के लड़का को छोड़ कर चल दिए...राजापुरी इलाके में गत्ते की फैक्टरी में आग लग गई थी..उसी खबर को कवर करने गए थे....हमारे रिपोर्टर भी गए थे उनको भी चोट आई है....एक बार फिर से एक पत्रकार की मौत हो गई खबर कबर करते हुए....पत्रकारिता की फिर से जीत हुई...मगर एक पत्रकार की जिंदगी का अंत हो गया....इश्वर करे दिवंगत आत्मा को शांति मिले.....मेरी और से अजय भाई को श्रधान्जली !

एक बूड़ी मां का दर्द.........

एक बूड़ी मां का दर्द............
पति को कन्धा देने चार जने आये,
मेरे जने चार नहीं आये
बस !
अनिल गोयल की कलम से ....'मां यात्रा' से .....

रविवार, 2 मई 2010

आइस क्रीम का मज़ा देर रात में !

आइस क्रीम का अभी अपना ही मजा है, बिलकुल ! गर्मी के दिन और राजधानी दिल्ली की सड़कें...समय रात के ११:३० बजे.....में और मेरा पत्रकार दोस्त मंदीप चौहान जो मेरे साथ ते टीवी चैनल में कार्यरत है...मुनिरका पहुचे तो मैंने एक गोरी गुलाबी 'कसाटा' और एक काली भूरी 'चोकबार' ली...मंदीप ने चोक बार ले ली..जिसमे लकड़ी की स्टिक लगी थी....और कसाटा जो पोलीथीन के अन्दर लपेटी हुई थे फिर बाहर से रंग विरंगा कागज का डब्बा...उसे मैंने उधेड़ डाला...और थोडा थोडा लकड़ी की चम्मच के साथ चखे जा रहा था...गाडी चलती जा रही थी..हम दोनू कार में थे और रात्री शिफ्ट होने की वजह से ऑफिस जा रहे थे...ड्यूटी समय रात १२ बजे से था..मगर आइस क्रीम खाते-खाते बड़ा आनंद आया..ऊपर से दिल्ली में बिछी हुई चौड़ी चौड़ी सड़कें...और हम दोनों टेस्ट लेते हुए ऑफिस पहुचे ! वाह क्या बात है...हमारी खूब बातें निकली रास्ते भर...मुद्दे अलग- अलग थे....सबसे बड़ी बात यह रही मैंने चोक बार नहीं खाई और मंदीप ने कसाटा...क्यूंकि दोनों का टेस्ट एक दूसरे पर हावी न हो ... खैर भरी गर्मी में दिल्ली की आइस क्रीम का मजा लेने में एक और शाम गुमनाम हो गई.....और हम आगे बढ़ गए ....