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शनिवार, 23 जुलाई 2011

ये कैसा घर ?



कहते हैं जर, जोरू और ज़मीन ये तीनू ही बर्बादी के पर्यायवाची हैं ! आजकल हम देख रहे हैं सुन रहे हैं राजधानी दिल्ली के नजदीक ग्रेटर नॉएडा का हाल ! इंसान अपना घर चाहता है, अपना घर का सपना संजोये काफी लोगों ने इस इलाके में अपना पैसा लगाया की एक घर खरीदेंगे जो अपना होगा, जिसमे वे रहेंगे जिसको वे घर कह सकेंगे. लेकिन यह क्या सरकार और कोर्ट ने जो फैसला लिया उस की मार घर चाहने वाले को क्योँ पड़ी ? इस घर घर के चक्कर में लोगों का पैसा डूबता नज़र आ रहा है. पूरी की पूरी की फिल्म अगर फिल्म की भाषा में कहें तो फ्लॉप साबित हो रही है और हेरोई हेरोइन कम बल्कि सभी विलेन इस घर घर के चक्कर में दिख रहे हैं. फिल्म के इस किरदार में सरकार, कोर्ट, बिल्डर और खरीददार हैं.

देखिये अभी तो यह खेल शुरू हुआ है.....कोर्ट के फैसले पर कोई टिपण्णी नहीं करूँगा, लेकिन बिल्डर और भाई जी और बहन जी रूपी नेता गण का जो यह पाखंड है वह सच में गंभीर है ! राजधानी के नजदीक इतना बड़ा पाखंड हो सकता है तो अन्य दूर-दराज राज्यूं में बड़े घोटाले भी हो जाएँ तो वे सिर्फ राजनीतिक मुद्दे बन का रह जाते हैं, क्या फर्क पड़ता है? लेकिन दो चीज़ हैं एक बोट बैंक का खेल और दूसरा पैसे का लालच, जो ज़मीन का बलात्कार करने पर लगे हुए हैं. नेता को वोट चाहिए या फिर वह उस वोट को तुडवाना या मुडवाना चाहता है, और दूसरा किसान जो पहले ज़मीन बेच चुके हैं, और पैसे ले चुके हैं वे अब फिर से लालच में राल टपका रहे हैं? उनको करोड़ों रुपये भी दे दो उनका पेट नहीं भरने वाला है...रही बिल्डर की बात, तो वह हमेशा से पूरी तरह लाभ और लालच में काम करता है, उसके काम में कोई सामाजिक भलाई नहीं दिखती..लेकिन तबाह हो गया पैसे लगाने वाला ! उसकी क्या गलती वो किसके दरवाजे पर सर मारे? इस देश का ज़मीन के खातिर जो दोहन, शोषण हुआ है उसका यह आधुनिक तरीका है फिर वह चाहे गोरों का राज हो या फिर मुगलों का सब इस ज़मीन को बर्बाद कर चले गए और यह कुकर्म अब तक जारी है .