सोमवार, 28 सितंबर 2009

दशहरा की हार्दिक सुभकामना......


देश में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीकात्मक त्योहार दशहरा श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। शाम को विभिन्न स्थानों पर मेला गया और शाम को रावण का पुतला दहन होगा। कुछ स्थानों पर रावण के साथ ही मेघनाद एवं कुंभकर्ण का भी पुतला दहन होगा। के पुतले का दहन होगा।....इस अवसर परदिल्ली में प्रधानमंत्री और सोनिया गाँधी और अन्य नेता गन भी भाग लेंगे...हमारी ड्यूटी है इसलिए ऑफिस में हैं नज़ारा न्यूज़ रूम से दिखने को मिलेगा.....यह प्रोग्राम भी कवर करना है.....घर/गांव जाना चाहता था पिछले तेरह चौदह साल से दशेरा नही देख पाया....छुट्टी नही मिली ...क्या करे, देश वासियौं और दोस्तू को मेरी और से बहुत बहुत सुभ कामना....इश्वर करे सबको खूब सारी खुशियाँ दे......और हस साल ऐसे ही शान्ति और सफलता के साथ दसहरा मने.......

आपका अपना मनोजीत सिंह

बुधवार, 23 सितंबर 2009

सुधर जाओ दिल्ली वालो....

ग्रह मंत्री पलानीअप्पन चिताम्बरम या पी चिताम्बरम ने दिल्ली वासियौं को आखिर कार नसीहत दे ही डाली....वो भी पुलिस वालू की मौजूदगी में...."सलीके से रहो दिल्ली वालो "। हमारे देश में एक बुरी आदत है कोई भी इवेंट या खेल होने जा रहे होते हैं तो हो हल्ला जयादा और काम कम होता है। वही बात रास्त्र मंडल खेल को लेकर हो रहा है....कल यानि मंगलबार को दिल्ली में २२ नए थानू का श्री गणेश किया गया। ग्रह मंत्री ने मुख्या मंत्री और पुलिस कमिश्नर की मौजूदगी में दिल्ली के लोगूँ को नसीहत दे डाली की सलीका सीखो और बौयाहार बदलो....तुलना कर दी चीन और जर्मनी से....खैर....यह भी जानकारी दे दी की इन देशू ने क्या पर्यास किए गए थे.....ग्रह मंत्री ये भूल गए की दो सौ साल अँगरेज़ राज कर चले गए वो नही बदल पाए कुछ महिनू में कैसे बदल पाएंगे....मेरी समझ से बाहर है.....मुख्यमंत्री जी ने कह डाला की उनकी सरकार समाज के तौर तरीकू में बदलाव के लिए अभियान शुरू कर रही है ताकि लोग ज्यादा सतर्क बन सकें...ये 'सतर्क; का क्या तात्पर्य है वही जाने...गृह मंत्री ने कह दिया की शैक्षिक कार्यक्रम चलाये जाने की जरुरत है. दिल्ली पुलिस ऐसे कार्यक्रम सुनिश्चित करे जिससे सुरक्ष्य सुनिश्चित हो सके. ...पुलिस का नाम सुन कर लोगू को सांप सूंग जाता है वो क्या कार्यक्रम चलाएगी....और चलाएगी भी तो क्या सफल होगा....शक है सौ पर्तिशत...पहले अपनी इमेज तो सुधार लो...गृह मंत्री ने रेड लाइट पार करने की बात कही...जब ट्रैफिक इतना अस्त ब्यस्त होगा तो लोग तो रेड लाइट करेंगे ही....तीस मिनट का रास्ता तीन घंटे में तय होता हैं...क्या करेंगे लोग समझ सकते हैं....सबसे बड़ी बात ये बड़ी बड़ी बाते खेल शुरू होने से कुछ दिन पहले क्योँ कही जा रही हैं? वो भी दिल्ली के लोगो को....?जो अपनी बात करते हैं....और दूसरू की बात नहीं सुनते....मुख्या मंत्री पहले ही खेल के बारे में उन्हें शक शंका है.....जिस हिसाब से कम चल रहा है....कबी राज्य के हक़ की बात हो रही है तो कभी ये कमी वो कमी का बहाना कर टोपी एक दुसरे के सर पर सरकाने की कोसिस की जा रही है...बाईस नए थाने खोल दिए...इससे मुझे नहीं लगता ज्यादा लोगू को सुरक्ष्य मिल पायेगी या कानून का ठीक ढंग से पालन होगा...मुझे नहीं लगता....और ज्यादा लूट खशोट होगी...बजाये लोगू को अछि तरह से सीख देने के , कार्यक्रम चलने की , विकाश कार्य करने , उल्टे सीधे बयान बाज़ी कर अपने नंबर बनाने में लगे हुए हैं सभी....ये शर्म की बात है. गृह मंत्री के विचार उचित हो सकते हैं लेकिन औरु का क्या करे. दिल्ली तो वैसे भी अंतर रास्ट्रीय शहर है....बस थोडा अनुशाशन में रहने की जरुरत है.....वो दिल्ली वाले जल्दी सीख लेते हैं बस एक अच्छी पहल की जरुरत है......

शनिवार, 19 सितंबर 2009

कशमकश......

आल इंडिया रेडियो से लेकर अखबारों से लेकर यहाँ तक का सफर काफी उतार चदाव का रहा......मगर काफ़ी कुछ सीखने को मिला और कुछ करने की प्रेरणा भी मिली जो बहुत जरुरी टोनिक होती है किसी की जिंदगी में ...खैर...
रिपोर्टिंग से डेस्क पर हुए एक साल से ऊपर हो गया है......लगातार नौकरी करते हुए...इस दौरान कई तरह के उत्तर चढाव देखे....अपने पराये हुए पराये अपने नही हो सके..लेकिन एक सकूं तो रहा दिल में की किसी का बुरा नही किया...जिसने समझा अची बात नही समझा वो भी अची बात है...दोस्त पता नही कहा हैं...परिवार घर पर है लेकिन समय नही दे प् रहा होऊं , काम करने की आदत सी पड़ गई है...और अचा लगता भी है...में भी यही चाहता था...पर कभी लगता है श्याद कुछ ग़लत हो रहा है...दिखाई नही देता लेकिन कुछ न कुछ तो है....सोच रहा होऊं दशहरे पर घर जाने की...काफी समय हो गाय है...वादियाँ देखे हुए..अपने लोगू से बात करने का जी करता है...दूर शहर से शांत माहौल में जाने का जी करता है......जो भी है....इंतज़ार तो है कुछ अपने पण का...जॉब ऐसा है...कोई चीज़ अची नही लगती बल्कि लगता है कुछ बचा ही नही है दुनिया देखने को , करने को,जाने को ....पत्रकार की जिंदगी पता नही क्योँ प्यासी सी रहती है.....अपने आप में यह एक कभी न पुरा होने वाला प्रश्न भी है और उत्तर भी.....फ़िर कर्म में बिश्वास करता होऊं इसलिए करे जा रहे होऊं, इश्वर देखता है क्या ठीक है क्या ग़लत.....कुछ अचा करना चाहता होऊं समाज के लिए...पता नही कर पाऊँगा या नही लेकिन जो भी है...अपने आप से नाराजगी तो है...कोशिश कर रहा होऊं जल्द ही दूर हो जाए..कुछ लोग अपने हैं...और फिलहाल दूर हैं...न अता है न पता....लेकिन में उन्हें बहुत मिस करता होऊं .....पता नही दुबारा वे मिल पाएंगे या नही ....कहा होंगे किस हाल में होंगे.......पता नही....इश्वर उन्हें खूब खुसी दे..और भरपूर सफलता....कामना यही करता होऊं...

चीन की दुस्साहस ...........

'हिन्दी चीनी भाई भाई 'शायद ये शब्द हर किसी भारतीय ने सुने होंगे....लेकिंग समय के साथ ये अब 'हिन्दी चीनी बाय बाय 'ज्यादा प्रतीत हो रहे हैं...अभी हाल में चीन ने जो कदम उठाये और जिस तरीके से वह कम कर रहा है वह अपने अपने आप में आने वाले समय के लिए कूतिनितिक और रणनीतिक आधार पर खतरनाक हो सकते हैं...चीन ने नेहरू जी को बेवकूप बना कर यह नारा दिया और पीछे से हमले की तयारी कर डाली...वही दूसरी तरह चीन का इतिहास देखा जाए तो उसने हमेशा से विश्व में ऐसे देश को मदद दी है जो साम्यवाद का समर्थन करता हो ..दक्षिण कोरिया, लीबिया ,पक्सितन जैसे कई देश हैं जिन्हें चीन ने पुरी तरह से समर्थन दिया और उस इलाके में एक तरह से हालात को उथल पुथल बनाने में अपनी और से कोई कसं नही छोड़ राखी है....खैर भारत के नजरिये से देखे तो अपने आप में यह कोई नही बात नही है...कूतिनितिक स्तरपर देखे तो हमेसा से चीन ने मतलब परस्ती दिखाई है..और भारत के ख़िलाफ़ रहा है...अभी हाल ही में चीन में जो स्वेट पत्र जरी हुआ है और उसमे भारत के टुकड़े करने का अंदेशा जो सामने आया है वो आने वाला समय में बहुत घटक हो सकता है और भारत को इस बारे में जल्द सोचना होगा...सरकार चाहे जितना कह ले , मामला टालने की कोशिश कर लेकिन हकीकत से मुह नही मोडा जा सकता है .....सरकारी अधिकार्यौं की बयान बजी एक तरफ़ और वह क्या पाक रहा है वो एक तरफ़....लद्दाख,अरुणाचल,सिक्किम,उत्तरखंड,हिमांचल सभी जगह उथल पुथल सी स्थित हो रखी है...सेना हो या गुप्त चार बिभाग सभी गुपचुप तरीके से दौरे करने में लगे हुए हैं..और होना भी चैये लेकिन देश की जनता को सब कुछ पता होना चाहिए....अभी तक हम पाकिस्तान से परेशान थे और अब चीन खुले तौर पर अपनी हरकत से दक्षिण एशिया में अशांति फैलाने में कोई कसार नही छोड़ रहा है....पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने में मदद और यूध पोत दे कर वो अपनी मंशा ज़ाहिर कर भी चुका है.....भारत को अन्तार्रस्त्रिये मंच पर चीन हरकत का खुले तौर पर जवाब और परिचय देना चाइये....न की दबे जुबां से कारवाही करनी चाइये...

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

जरनैल सिंह का जूता क्या ठीक है...?



जरनैल सिंह का जूता गृह मंत्री को मरना क्या ठीक था या गलत ये बहस का विषय बन चूका है...लेकिन एक पत्रकार का ऐसी हरकत करना समाज के लिए अच संकेत नहीं है....हर इंसान की अपनी राय हो सकती है, सोच हो सकती है..वो अलग बात है..लेकिन इस तरह का ब्यौहार करना बिलकुल ठीक नहीं है...जो भी हुआ दुखद हुआ , जिस कारन हुआ वो भी दुखद है लेकिन ये विरोध करने का तरीका ठीक नहीं था.....

शनिवार, 31 जनवरी 2009

लास्ट नाईट ड्यूटी...

लास्ट नाईट :-
३१ जनवरी की रात मेरी अन्तिम शिफ्ट रात थी...पिछले ३ महीने से में रात्रि शिफ्ट में था...कम अपना खबरू से खेलना....पुरा देश विदेश से खबर मगाई, की और कुल मिलाकर ख़बर से ही जीते हैं...जौनालिस्ट की जिंदगी एक तरह से लोगूँ के लिए हो जाती है..अपने लिए कुछ नही कर पता है वो..लेकिन लोग नही समझ पते हैं इस चीज़ को...खैर...खबरू के मामले में हम किसी से पीछे नही थे...और सबसे बरी बात अच्छे लोगूँ के साथ काम करने का मौका मिला। मेरा बिभाग जो की एक तरह से बहुत ही महत्व पूर्ण बिभाग है...... और इस दौरान मैंने अपने और से किसी भी तरह से कोई ढिलाई नही बरती और कोसिस की की अपना सौ प्रतिशत दू। कईए बड़ी खबरे दी, घटित हुई ,और लाइव हुए...रिपोर्टर्स ने भी काफी सहयोग किया...और चाहे वो आदेश हो, अरविन्द, अजय,प्रभात हो या फ़िर निशाना जी सभी ने काफ़ी अच कम किया। शिफ्ट इंचार्ज धर्मेन्द्र सर बहुत ही अच्छे इंसान लगे चाहे वो प्रोफ़ेस्सिओनल्लि हो या फ़िर ब्यक्ति गत तौर पर उनका ब्यौहार काफी अच्छा लगा। कभी भी इर्रितेत नही होते हैं। हमेसा अपना बेस्ट करने की कोसिस करते हैं...उनसे काफी कुछ सीखने को मिला इस दौरान काफी कुछ सीखने को मिला....hअमेसा अच्छी ख़बर की खोज में रहते हैं और उस ख़बर को खेलते भी अची तरह हैं और प्रस्तुत भी अची तरह करते हैं....और सहयोगी भी काफी मदद गार रहे....मुंबई हमला ऐसा था जो बड़ा ही महत्व पूर्ण था और मैंने कोसिस की अच्छी तरह से अपना काम करू। अभी प्राइम टाइम में ड्यूटी लगी है इसलिए हो सकता है हेक्टिक लगे कुकी रात में जो भी काम करू शान्ति से करने को मिलता था दिन में ऐसा नही होगा। लेकिन बदलाव भी जरूरी है...अपने चैनल को अपना बेस्ट देने की कोशिश की है...और आगे भी देता रहूँगा...और आने वाला टाइम और चुनौती पूर्ण होगा...में जनता होऊं ..इस बीच ब्यक्तिगत तौर पर दुःख भी काफी झेलना पड़ा.... सोचा नही था वो हुआ...झेला...बुरा भी लगा...परिवार से भी अनबन रही ....और फ़िर सोचा की ये भी जिंदगी का हिस्सा है...इंसान जो सोचता है ग़लत नही सोचता है...उसने भी ठीक सोचा होगा...लेकिन मैंने कोई गलती नही की है...सब कुछ ऊपर भगवन के हाथ में छोड़ रखा है..जब मैंने किसी का बुरा नही किया तो मेरा क्योँ होगा..यही सोच कर खुश रहता होऊं और अपना कम करता होऊं..फ़िर भी भगवान् पर पुरा भरोसा है और इंसान पर भी जो होगा अच्छा होगा...लेकिन अपने काम में कोई कमी नही आने दी...घर से पिक रात करीब १०:३० या ११ बजे हो कर सीचे ऑफिस आना और सुबह सीधे घर जन..और फ़िर सोना यही दिन चर्या रही....इस बीच मम्मी का ओपेरेसन हुआ, भगवन के आशीर्वाद से ठीक रहा...कुछ अच्छे लोग मिले...लेकिन ज्यादा बात करने का मौका नही मिला...और न ही मिलने का...फ़िर भी अपना अपना होता है...मैंने सब कुछ छोड़ कर अपना टाइम अधिकतर काम में लगाया...इस बीच किसी को बुरा लगा हो तो माफ़ी चाहता होऊं...दिल का बुरा नही होऊं में , फ़िर भी कोई सब्द या ब्यौहार ग़लत लगा हो तो दोस्तों फ़िर से माफ़ कर देना......

सोमवार, 26 जनवरी 2009

राज पथ ने फ़िर से किया भव्य पर्दर्शन हमारी 60वीं वर्षगांठ का

सबने देखा राजपथ पर 60वीं वर्षगांठ का नज़ारा जो अपने आप में भव्य और सुंदर तो था ही साथ ही वीरता का परिचायक दिखने वाले जाम्बजू की कहानियौं से सारा देश गूंज उठा. इतिहास के साक्षी राजपथ पर सोमवार को भारतीय गणतंत्र यदि अपनी सैन्य क्षमता पर गर्वित था तो दूसरी तरफ शहीदों की स्मृति में विनीत और उदास भी। नज़ारा भारतीय गणतंत्र की 60वीं वर्षगांठ का उत्सव था जिसमें अपनी संस्कृति, अपनी सेना और अपने शहीदों पर समारोह के मुख्य अतिथि कजाखस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान एबशिवच नजरवायेव दुनिया की बड़ी शक्ति बनने की तरफ अग्रसर भारत के शक्ति प्रदर्शन को देखकर अभिभूत थे। आज राजपथ पर पहले बिखरीं यादें और फिर दिखी भारतीय सैन्य शक्ति व संस्कृति की बहुरंगी झांकी। कोहरे ने भी आख़िर अपनी हार मन ही ली और बियर जवानू के आगे वो भी नमस्तक हो गया...मुंबई हमले में शहीद जांबाजों के परिजन सम्मान के लिए मंच की तरफ बढ़े तो तमाम आंखे अपने आप नम हो गई। मुंबई एटीएस के पूर्व चीफ हेमंत करकरे, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और बटला मुठभेड़ के शहीद इंस्पेक्टर एम सी शर्मा समेत इंस्पेक्टर विजय एस सालस्कर, अन्य शहीदों के परिवारीजन जब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से अशोक चक्र सम्मान ले रहे थे . पुरा देश इसको देख कर गर्व महसूस कर रहा था की हमारी रक्ष्या करने वाले जब तक ऐसे वीर रहेंगे तब तक हमें कुछ नही हो सकता है. पुरा भारत इनकी बहादुरी को सलाम कर रहा था। इसके बाद शुरू भारतीय युद्धक क्षमताओं का नजारा। सतह से सतह पर 3000 किलोमीटर तक मार करने वाली अग्नि-3, टी-90 टैंक भीष्म, टी-72 और सतह से आकाश में मार करने वाली 'आकाश' मिसाइल हर चुनौती के लिए भारत की तैयारी को रेखांकित कर रही थीं। इजरायल से एयरबोर्न अर्ली वार्निग एवं नियंत्रक प्रणाली वाले फाल्कन राडार के साथ वायुसेना अपनी प्रस्तुति कर रही थी. रोहिणी थ्री-डी राडार के साथ यह प्रणाली भारत को एयरोस्पेस पावर बनने में मदद करेगी. वही महिलाऊ की तुक्दिया भी देखने को मिली जो कन्धा से कन्धा मिला कर चलते हुए अपनी वीरता का अहसास करा रही थी. राजपूत रेजिमेंट जय बजरंग बली का उद्घोष करते जवान आगे बर्हते नज़र आ रहे थे. वही पैराशूट रेजिमेंट के विशेष बल कमांडो तो अपने पुरे जोश खरोश के साथ आगे बर्हते चले जा रहे थे. अंत में मोटरसाइकिल सवारों ने शानदार पर्दर्शन कर यह दिखा दिया की भारत हर शेत्र में आगे रहना चाहता है.अर्द्धसैनिक बल भी अपने फ़र्ज़ और वीरता का परिचायक देने में पीछे नही रहे. इनमे सीमा सुर्क्क्ष्य बल ,केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल , केन्द्त्रिया औद्योगिक सुरक्ष्य बल,भारतीय तिब्बत बॉर्डर पुलिस और अन्य अपना पर्दर्शन करने को पीछे नही थे. ...

रविवार, 25 जनवरी 2009

क्या जीत पायेगा ऑस्कर?

कहानी हिन्दुस्तानी,पात्र हिन्दुस्तानी,लोकेशन हिन्दुस्तानी,गरीबी हिन्दुस्तानी,संगीत हिन्दुस्तानी,संगीतकार हिन्दुस्तानी,कहानी जिसने लिखी वो हिन्दुस्तानी केवल निर्देशक ब्रितानी.... डैनी लोयिड नाम है उनका ....अपने आप में सख्सियत है और एक उम्दा इंसान भी हैं। ये फ़िल्म ऑस्कर ले आए कोई शक की गुंजाइश भी नही है। अगर यह ऑस्कर जीत जाती है तो यहाँ की फ़िल्म इंडस्ट्री को काफी फायदा होगा। जो अभी तक बाहरी मुल्कू में सिर्फ़ इसलिए जनि जाती थी की पेड़ के चारू तरफ़ एक लड़का और एक लड़की नाचते हैं, उचल कूद करते हैं और कई बार कुछ लोग उनके चारू तरफ़ उनकी तरह डांस करते हैं....और लडाई ऐसी होती है जैसे रोबोट लड़ रहे हो...पता नही कौन कहा से गोली मर दे और किसको ...कुछ भी हो सकता है...इसलिए तथ्य आधारित प्रस्तुतीकरण करने में हम काफ़ी पीहे रहे हैं...इसलिए अन्तर रास्ट्रीय मंच पर पहचान की मोहताज़ रही है। खासकर अंतर्राष्ट्रीय लेवल पर। इस फ़िल्म में जो गरीबी बेचीं गई है हिंदुस्तान की वो सोचनीय है......वही इतने ऑस्कर नामांकित होने के बाद गरीबी हिन्दुस्तान की न रह कर बल्कि एक अभिशाप बन कर रह गई है.....स्लम से करोड़पति बनना या बनाना मुंबई की फितरत रही है.....और इस शहर ने पता नही अनगिनत लोगूँ को ऐसा बनवाया भी है। इसलिए मुंबई को सप्नू का शहर भी कहा जाता है। जो इंसान सपने देखता है वो कामयाब भी होता है। निर्देशक ने बख्बूबी अपना कम किया है.....विदेशी होने के बावजूद उसने विषय की गहराई को समझा है.....परखा है और फ़िर प्रस्तुत किया है....इसी का नतीजा है की वो ऑस्कर के दरवाजे पर आज दस्तक दे रही है.....क्या यह फ़िल्म जीत पायेगी ऑस्कर....हमें उम्मीद है अबकी बार ऐसा होगा। अल्लाह रखा रहमान ने जो संगीत दिया है वो बहु उम्दा है और वैसे भी हमेसा काबिले तारीफ और शानदार रहा रहा है उनका संगीत। संगीत पैदा करने में परिश्रम् करते हैं। यही उनकी सफलता का राज है। उसको महसूस करते हैं उसको जीने की कोसिस करते हैं यहाँ पर उन्हूने हिन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री को जो नया आयाम दिलवाया है उसके लिए यह देश उनका हमेसा शुक्र गुजार रहेगा, और हम दुआ करते हैं यह फ़िल्म ऑस्कर जीते ताकि आने वाला कल हिन्दुस्तान का भी हो.....

अगर ओस्कर जीत लेती है ये फ़िल्म तो रहमान और समूचे देश के लिए यह बहुत खुसी की बात होगी...और हमें उम्मीद है की ऐसा होगा......जरूर होगा.....

स्लम डौग मिल्लेनिअर ?







Kya jeet payegi OSCAR?



मंगलवार, 20 जनवरी 2009

वेलकम अमेरिकन प्रेजिडेंट

बराक ओबामा विश्व शक्ति के पहले राष्ट्रपति बन ही गए। २० जनवरी २००९ को जब हमने इस अमेरिकी रास्त्रपति की शपथ शमारोह देखा। काफ़ी अच्छा लगा । लोग कितनी रूचि ले रहे थे अपने राष्ट्रपति के बारे में। उनकी आखु में साफ़ दिख रहा था की वे क्या चाहते हैं। किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे खुसी की बात और क्या हो सकती है जब दो नेता आपस में चुनाव लड़ रहे हो और फ़िर उनमे से एक जीत ते ही उसी को वो अपनी सरकार में शामिल कर लेते हैं वो भी खास ओहदा दे कर। और ऐसा ही बराक ओबामा ने किया हिलेरी को अपनी सरकार में शामिल कर। यह बहुत नेक और दूरदर्शी इंसान की सोच हो सकती है। और अगर वह राजनेता है या बनता है तो निश्चित ही उस देश के लिए खुसी का मौका होगा। हमारे देश के नेताऊ को इस बात से सीख लेनी चैये। और इसमे शर्म वाली कोई बात नही होनी चाइये। विश्व में तरह तरह की समस्याए हैं एक तरफ़ आतंकवाद वही दूसरी तरफ़ आर्थिक मंदी दोनू ही नासूर की तरह हैं। लेकिन ये आने वाला समय कैसा निकालता है देखने वाली बात है। वही दूसरी तरफ़ अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है और लोग इसे एक नए युग की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि ओबामा के कार्यकाल के दौरान नस्ली रिश्तों में सुधार आएगा।
जहा तक नस्लवाद की बात करे तो 22 फीसदी श्वेत समस्या मानते हैं, जबकि 44 फीसदी अश्वेत इसे गंभीर मसला मानते हैं। इसी तरह नस्लीय समानता के मामले में भी श्वेत और अश्वेतों के विचार जुदा हैं। जहां पचास फीसदी अश्वेत मानते हैं कि अफ्रीकी-अमेरिकियों ने नस्लीय समानता का लक्ष्य हासिल कर लिया है या जल्दी ही कर लेंगे, जबकि 72 फीसदी श्वेतों ने कहा कि दोनों समुदायों में कोई नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।
वही हिंदुस्तानियों की हसरत क्या है देखने और सोचने वाली बात है । दुनिया भर में फैले भारतीयों सहित पूरी दुनिया ओबामा से उम्मीद लगाए बैठी है। सवाल है कि आखिर लोग ओबामा से क्या चाहते हैं। यह जानने के लिए बीबीसी व‌र्ल्ड ने एक सर्वे करवाया, जिससे पता चला कि वैश्विक आर्थिक संकट को दूर करना ओबामा की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। पेश है ओबामा से भारतीयों की उम्मीदें:
-63 फीसदी भारतीय मानते हैं कि अमेरिका का शेष विश्व के साथ रिश्ता सुधरेगा
-35 फीसदी भारतीय चाहते हैं कि जलवायु परिवर्तन को सर्वोच्च प्राथमिकता दें ओबामा
-28 फीसदी भारतीय चाहते हैं कि इजरायल-फलस्तीन संकट हल करने को दी जाए वरीयता
-27 फीसदी भारतीय चाहते हैं कि इराक से वापस आ जाए अमेरिकी फौजें
-26 फीसदी चाहते हैं कि अफगानिस्तान सरकार को मिलती रहे अमेरिकी मदद
पहले क्या करें
बीबीसी का एक सर्वे हुआ था इसमे लोगूँ की क्या सोच थी...
1-वैश्विक आर्थिक संकट का समाधान: 72 फीसदी
2-इराक से अमेरिकी फौजों की वापसी: 50 फीसदी
3-जलवायु परिवर्तन से लड़ने की जरूरत: 46 फीसदी
4-दूसरे देशों से अमेरिकी रिश्तों में सुधार:46 फीसदी
5-इजरायल-फलस्तीन संकट का हल: 43 फीसदी
जहा तक अमेरिका में अश्वेतों के संघर्ष की कहानी का है वो इस प्रकार है.
1619: अमेरिका में अफ्रीकी गुलामों का पहुंचना शुरू
1800: अमेरिका में गुलामों की संख्या 66 लाख
1861: अमेरिका में गृह युद्ध प्रारंभ
1865: गृह युद्ध खत्म, संविधान ने गुलामी प्रथा खत्म की, लेकिन नस्लभेद जारी रहा
1950-60: नस्लभेद के खिलाफ अश्वेत और प्रबुद्ध श्वेत सड़कों पर उतरे। 110 शहरों में नस्ली दंगे
1955: अश्वेत महिला रोजा पा‌र्क्स ने श्वेत के लिए बस में सीट खाली करने से इनकार किया
1963: मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने वाशिंगटन में अपना मशहूर भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा था, 'आई हैव ए ड्रीम' [मेरे पास एक सपना है]
1964: सिविल राइट्स एक्ट पर हस्ताक्षर। सभी को बराबर अधिकार। श्वेत और अश्वेतों में विवाह पर रोक हटी
1968: मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या
1989: कोलिन पावेल अमेरिकी सेना के पहले अश्वेत प्रमुख बने। बाद में उन्होंने विदेश मंत्री का भी जिम्मा संभाला
2008: बराक ओबामा राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले पहले अश्वेत बने
कल का दिन नया होगा ओबामा के लिए और एक नई सोच और ने ऑफिस के साथ नए युग में नई कार्य शैली के साथ दिखायी देंगे। हमारी शुभकामनाये उनके साथ हैं ......और तहे दिल से स्वागत भी करते हैं..लेकिन याद रखना उनके ये शब्द ..."महानता कभी आसानी से नही मिलती"....बराक ओबामा !

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

निहिलिस्म----कुछ भी नही....


Nihilism – Abandoning Values and KnowledgeNihilism derives its name from the Latin root nihil, meaning nothing, that which does not exist. This same root is found in the verb “annihilate” -- to bring to nothing, to destroy completely. Nihilism is the belief which:
labels all values as worthless, therefore, nothing can be known or communicated.
associates itself with extreme pessimism and a radical skepticism, having no loyalties. The German philosopher, Friedrich Nietzsche (1844-1900), is most often associated with nihilism. In Will to Power [notes 1883-1888], he writes, “Every belief, every considering something true, is necessarily false because there is simply no true world.” For Nietzsche, there is no objective order or structure in the world except what we give it. The objective of nihilism manifests itself in several perspectives:
Epistemological nihilism denies the possibility of knowledge and truth, and is linked to extreme skepticism.
Political nihilism advocates the prior destruction of all existing political, social, and religious orders as a prerequisite for any future improvement.
Ethical nihilism (moral nihilism) rejects the possibility of absolute moral or ethical values. Good and evil are vague, and related values are simply the result of social and emotional pressures.
Existential nihilism, the most well-known view, affirms that life has no intrinsic meaning or value.
Nihilism – A Meaningless WorldShakespeare’s Macbeth eloquently summarizes existential nihilism's perspective, distaining life:
Out, out, brief candle! Life's but a walking shadow, a poor player That struts and frets his hour upon the stage And then is heard no more; it is a tale Told by an idiot, full of sound and fury, Signifying nothing.Philosophers’ predictions of nihilism’s impact on society are grim. Existentialist, Albert Camus (1913-1960), labeled nihilism as the most disturbing problem of the 20th century. His essay, The Rebel1 paints a terrifying picture of “how metaphysical collapse often ends in total negation and the victory of nihilism, characterized by profound hatred, pathological destruction, and incalculable death.” Helmut Thielicke’s, Nihilism: Its Origin and Nature, with a Christian Answer2 warns, “Nihilism literally has only one truth to declare, namely, that ultimately Nothingness prevails and the world is meaningless."
Nihilism – Beyond NothingnessNihilism--choosing to believe in Nothingness--involves a high price. An individual may choose to “feel” rather than think, exert their “will to power” than pray, give thanks, or obey God. After an impressive career of literary and philosophical creativity, Friedrich Nietzsche lost all control of his mental faculties. Upon seeing a horse mistreated, he began sobbing uncontrollably and collapsed into a catatonic state. Nietzsche died August 25, 1900, diagnosed as utterly insane. While saying Yes to “life” but No to God, the Prophet of Nihilism missed both.

शनिवार, 10 जनवरी 2009

के एस मजिला जी का आकस्मिक देहांत....

इंसान जिंदगी में आया तो उसे एक दिन जाना भी है, यह सत्य है ! इसी कड़ी में पिछले जनवरी २००९ को मेरे बड़े नाना जिनको हम बूबू जी भी कहते हैं, स्वर्गवासी हो गए ! उनका देहांत कांदा में उनके अपने पैत्रक विल्लेज में हुआ। उनके बारे में कहू तो बहुत कुछ है, लेकिन यहाँ पर कुछ सबदु के जरिये आपके सामाने उनकी खूबिया रखने की कोसिस कर रहा होऊं। जो चीज़ हम लोगूँ ने उनसे सीखी लेकिन जो अहम् चीज़ देखने को मिली वो भी थी उनकी निडरता और बेबाक तरीके से बात को कहने की खूबी। मुझे नही लगता वो किसी से डरे जिंदगी में। क्यूंकि उन्हूने निडर जिंदगी जी है। मुझे अपना बचपन उनके नजदीक बिताने का सौभाग्य रहा, और मैंने देखा की उन्हूने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ ऐसे काम किया जो आम लोगूँ के लिए समाज के लिए काफी फैदेमंद रहे। वो एक रियल अग्ग्रेस्सिव इंसान रहे हैं। जहा तक हमारी अपनी बात ,ये पारिवारिक श्यति तो है ही साथ ही समाज,इलाके के लिए भी यह बहुत बड़ी दुःख की बात है।

क्योंकि वो साँप काटने से लेकर दम और अन्य कई बीमारियौं का सफल इलाज़ जानते थे। उसके लिए वे देशी दवाई bअनाते थे, ख़ुद मैंने कई बार जडी बूटी लाते हुए देखा है। लेकिन कभी क्या है और किस चीज़ के लिए है कभी समझने की कोशिश नही की। उनका आकस्मिक देहनत होने से मुझे बड़ा दुःख हुआ क्यूंकि उन्हूने दुःख में भी पुरे गर्व के साथ जीना सीखा। आदमी दुबारा नही आता है लेकिन उसकी यादे हमेसा के लिए रहती हैं...... एक बार जब में डेल्ही आ रहा था और उनसे मिलने के लिए गया और मैंने चरण स्पर्श किए तो वो बोले रुक थोडी देर यही पर। मैंने सोचा क्या कहेंगे पता नही। लेकिन थोडी देर बार ए तो उन्हूने मुझे २० रुपये दिए और कहा की नाती रास्ते कुछ अची चीज़ लेना मगर कोई ख़राब चीज़ मत लेना जिससे तुम्हे नुकशान ...हो। उन्हूने अपने लंबे परिवार बचू की अच्छी तरह से शादी ब्याह कर अपनी जिमीदारी निभायी। जीवन के अन्तिम दिनू तक वो खूब काम करते थे और कभी काम करने से नही हिचकते थे। में तो सिर्फ़ उनकी आत्मा के लिए दुआ कर सकता होऊं बाकि उनका आशीर्वाद हमारे सर के ऊपर रहना चैये यही कामना है.....

सोमवार, 5 जनवरी 2009

What is “GAZA”?




What is “GAZA”?

The name name “GAZA” has become huge popular in media whether it is in bulletin’s headlines or front story of any tabloid or news papers। The Gaza is common name in every household of the world. Lets look at this what it is and why it has become so popular।

Gaza strip is a narrow piece of land just 40 km long and between 5km and 10 km wide attached with Israel and Egypt to its south. Over 1.4 million Palestinians lives here. In 1993 , an accord was finalized between Israel and Palestinian political representatives in Oslo, Norway, which phased transfer of governmental authority to Palestinians was to happen. According the accord, Israel retained control of air space, territorial offshores, offshore maritime access, imports and exports and so on. Israeli forces left Gaza city and other areas in 1994 and a new Palestinian athrority led by late Yasser Arafat took over administration of the strip. However, it was not until 2005 that Israel actually removed all Israeli settlements and military bases in the Gaza Strip. By September 2005, it formally declared and end to Israeli militarily rule.


If we go to its long history we get the mid 16th century till the first world war, Gaza was part of Ottoman Empire। After the war Gaza became a part of the British mandate of Palestine. Soon after Israel declared its independence in 1948, Egypt moved in to the Gaza strip, sparking off the Arab-Israeli war of 1948. in 149, Israel and Egypt came to an agreement by which the strip was occupied by Egypt from 1949 till 1967, except for a brief occupation by Israel for four months in 1956. in1967, war broke out againbetween Egypt and Israel and thइस time Israel occupied the Gaza Strip and held on to ittill 1994.

Israel with drawn people in Gaza had to contend with the sanctions imposed by Israel। Israel’ blockade and the resulting international isolation have left them in a dire economic situation. Rafah crossing is Gaza’s sole contact with the outside world not under direct Israel. Officially goods can enter from Egypt by the Kerem Shalo crossing and from Israel via the Sufa and Karni crossings, both of which are controlled by Israeli army. This continued control has allowed the Israeli state to control the inflow and out flow of Gaza’s essential resources, including food, and often led to severe shortages. In the elections held in January 2006, Palestinians voted overwhelmingly for Hamas, the militant islamist Palestinian group. This led to Isreal , the EU and US which consider Hamas a terroirist organization cutting off aid to Gaza strip leadind to its economic collapse. Hamas does not acknowledge the existence of Israel and continues to fire short-range homemade rockets, which can reach bear by Israeli population centres, such as Sderot, less than a kilometer from Gaza’s north-east corner.

These days you can see how many peoples have been killed in this conflict. And still this un-humanitarian process is going on. No one to take care no one to think about this. Even the UN council is also tight lipped. No concrete steps has been taken yet from their side.



गुरुवार, 1 जनवरी 2009

ये कैसा "हैप्पी न्यू इयर" ?

हमें आजाद हुए आज ६० वर्ष हो चुके हैं,इस देश के लोगू को अन्ग्रेजू का हंटर अभी तक याद है. उसी हंटर का नतीजा है की हम अभी तक अपना नव वर्ष न मनाकर अन्ग्रेजू का "हैप्पी न्यू इयर " मानाने में लगे हुए हैं. ३१ दिसम्बर या फ़िर १ जनवरी को हम साल के अहम् दिन मानते हैं. जबकि इसमे ऐसा कुछ भी नही है. जैसे और दिन होते हैं वैसे ही ये भी है. और न ही कोई प्राकर्तिक बदलाव इन दिनू में देखने को दीखता है. एक सनक है अंग्रेजी कैलंडर शुरू होता है तो अँगरेज़ तो मनाते ही हैं साथ में हम भी उनके पीछे पीछे हो लेते हैं. नक़ल करने की हमारी आदत आज तक नही गई और अब तो यह हर हिन्दुस्तानी के खून में दौर्द्ता है। बात यह नही की यह त्यौहार या दिन नही मानना चैये बात है जब उनका आप लोग मन रहे हैं तो हम अपना क्योँ नही मानते हैं। किसी भी त्यौहार को मानना अच्छी बात है। खुसी किसी भी रूप में मनाई जाए उसकी कोई जगह नही ले सकता है। में यह नही कहता की यह नही होना चैये या फ़िर इसकी आलोचना कर रहा हूँ बल्कि मेरा मन्नना है की आज के युग और पढ़े लिखे भारतीय को अपने त्यौहार मानाने में क्या आप्पत्ति है। हम जितना तरक्की कर रहे हैं उतना ही अपने तौर तरीके भूलते जा रहे हैं। वही चीन, जापान, कोरिया ऐसे मुल्क है जो अपनी संस्कृति का ताना बाना बुनकर आगे जन चाहते हैं ।
अब देखिये नया साल मुबारक हो, हैप्पी न्यू इयर,सेम तो यू कहते कहते हम अपने आप दिमागी रूप से संतुष्ट करना चाहते हैं। क्या यही है हमारा तरीका बोलने का या फ़िर सुभकामना देने का? अंग्रेज्जी कैलेंडर एक जनवरी से शुरू होता है। अंग्रेजियत तो इस पर काम करती ही है और उसे काम करना भी चैये । मगर भारत जैसे पारंपरिक देश को इस पर इतना गर्व होने का क्या औचित्य है। हम ६० साल से आजाद है लेकिन आज तक इस 'हैप्पी न्यू इयर' की संस्कृति को पाले हुए है। और वो भी इतनी बुरी तरह की अपना पराया सब भूल कर। अन्गिनात पैसे फूकते हैं, पार्टी करते हैं, नाचते गाते हैं। न जाने क्या क्या कर बैठते हैं। इस दिन के लिए जबकि हिंदू कालानेंदर शुरू होता है । चैत्र के महीने में लेकिन उस दिन को कोई भारतीय इस तरह तवज्जू नही देता है। ऐसा क्योँ? जबकि हम पूजा पाठ, शादी ब्याह, हवं कोई शुभ काम हुमपने कैलेंडर को देखकर करते हैं। लेकिन उसी कैलेंडर का पहला दिन या नव वर्ष हैप्पी न्यू इयर भूल जाते हैं। ये कहा की मंशिकता है। इस मंशिकता को बदलने की जरूरत है । मैं चाहता होऊं की इस दिन को भी भारतीय अनय फेस्टिवल की तरह पूरी जोश नत्मयता से मनाये। जितना अंग्रेज़ी कैलेंडर के पहले दिन को हम मानते हैं। जिससे इस दिन का महत्व बढे और इसको उसका असली नाम मिल सके ..


रविवार, 28 दिसंबर 2008

"Story—An Embarrasing need


"Story—An Embarrasing need

There is a need for some one or something in everybody’s life. But the thing is whether you are able to get the thing or not. This need makes us do many things which we never want to do.
This is a true story about a Goan girl who wanted some one who could understand her and support her. About some years back, I had gone to Goa on a pleasure trip. There, one fine evening, I was strolling on the seashore. The sight of the sunset was wonderful as red rays of the sun covered the sky like a red sheet. On the far end there was a rock standing out from the shore as if it were trying to touch that shallow waters of the sea. On the rock sat a girl looking towards the sky giving a blank look as if she was able to see the other world.
As I went close to he, I was able to see her empty deep eyes. I tried to talk to her but could not gather the courage, so I went back to the resorts lost in the thoughts of the girl. As the night passed, I was still sitting in my armchair thinking about the girl’s eyes and her beautiful face. The knock on the door awakened me from my fantabulous dream. As I opened the door the fairy was standing in front of my. She looked like a dream I asked her to come in. she hesitated but some how with her soft and petal like foot she walked in.
she told me she was the guide I had asked for and introduced herself as Sherlie Alberque. I asked her to wait to wait as I ahd to get ready. She sat on the sofa with the blankness in her eyes again coming up. I got ready and came out to see her lost in thoughts as if trying to touch the sky while remaining on the earth. I woke her from her unknown thoughts first we went to a nearby church. There we both knelt down to pray. After a few moments I could hear her sobs. I somehow gathered the ourage and asked her the reason for the cyring and for the blankness and deepness in her yes. She stated at me as if I had committed a grave mistake by asking her. A littler tremble shook me. She very politely told me that though she did not know the reason but some how he felt that she could believe me. This was my first stepping stone.

Then started a long but pleasure trip in to her past. Her father’s name was James Alberque and her mother’s name was Susan Alberque. James was a tourist guide. He went in the morning. His returning time was known to God only. Susan used to run a tea stall. So she also had no time and unknowingly neglected her daughter. Sherlie used to feel very lonely as there was no one with whom she could play or share her feelings. Since her parents also had no time for her she needed someone with whom she could share her joys, her sorrows and who could understand her thoughts and feelings. This all happened when she was in Sir Lawrence Public School in Eleventh Class.
During that time she met a boy in her class whose name was Sebastian. He liked her. But she hated his flirting nature and his unruly activities. He even told her that he loved her. But she told him that he was not the guy she wanted and that she even hated his presence. In the same class was another boy who was of jolly nature and liked to enjoy each and ever moment of life. He managed to ask her, why was she so shy and reserved. She was so embarrassed as no one had asked her this question before. She somehow managed to change the topic. Hence grew their friendship as time passed. The name of this boy was Joseph D’costa. Though she had many friends she was close to Joseph and with his relation came the first change in Sherlie’s life. From a shy and reserved kind of girl she became a bold and jolly girl. One day while strolling on the sea shore she saw two boys who were busy trying to build some thing from sand. She watched them for some time. She went home lost in the thoughts of one of them. Day and nights she was thinking about him. After a through research she came to know that he was in her school, one year senior to her and his name was Andy Gomes. Though she met him daily she could not tell him that he was the person she needed.

Anyway as time passed she forgot hi and her schooling also came to an end. Now she was a college going teenager. In the first year of college. She mad many friends. Among them was boy called Neol. As time went by Sherlie and Neol came close and became intimate friends. For Neol it was a dream come true as he like her the very first time he saw her he even took her home and introduced her to his mother Sherlie also had full faith in Neol, but she did not love him. She saw him just as a friend. One day during holidays she came to meet Neol. During the conversation Neol came to know Sherlie’s past. She also had the habit of writing diary. Neol had read the diary without her permission. That was the end of their friendship. After some time, she asked him to leave her home. But he pulled her by hand and asked her to sit for some more time. As she was not ready, she released her hands and said goodbye to him forever.. later she came to know Neol had committed suicide by jumping into the sea. This incident shook her and she started doing things which she herself hated. Some how she came out of the trauma. Since them she has been waiting for someone. The most embarrassing and pitiful thing is that none of the people in her life were able to understand what she wanted nor did she tell any one, except Jospeh. But he was lost in the past.
After hearing her story. I got the answer for the deep blankness in her eyes.

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

'मुल्क एक हुकूमते अपनी - अपनी '


पाकिस्तान में अभी कई समानांतर हुकुमतू का जोर चल रहा है शायद वह अपनी पैदाइश के बाद पहली बार इतने बड़े संकट में है की उसे ख़ुद नही पता की उसे क्या करना है, क्या कहना है।
पाकिस्तान में राजनीतिक नेत्रत्व हमेसा से हाशिये पर रहा है। मुल्क में इस समय कई समानांतर हुक्मरानू के होने से हालत बड़े विकट दिखाए पड़ रहे हैं। हमारे देश को इस सबका खामिआजा भुगतना पड़ रहा और भारत हमेशा से ही इसकी मार झेलता आ रहा है। फिलहाल वहा पर पहली रस्थ्रपति ज़रदारी और प्रधान मंत्री गिलानी की है, दूसरी सेना प्रमुख जनरल कियानी की है, जो वास्तव में आज पकिस्तान में सबसे ताक़तवर शक्शियत है, तीसरी ताकत वे कट्टरपंथी या मज़हबी हैं, जिंहूने पाकिस्तान को तबाह कर के रख दिया है। इन सब से ऊपर आई एस आई है जो लोकतंत्र की टाँगे तोड़ने पर लगी हुई और इन सबकी लगाम अमेरिका के हाथ में है। आर्मी चीफ कियानी कुछ समय पहले आई एस आई के मुखिया हुआ करते थे लेकिन नॉर्थ वेस्ट फ्रोंतिएर में जो हालत हैं उनकी वजह से सेना और आई एस आई में बीच थोडी तकरार जरूर है। खाशकर सेना ने जब वह पर कत्तार्पन्थियू के ख़िलाफ़ जाने का मन अम्रीका सेना के साथ किया तो तबके आई एस ई और मजहबी संघठन सेना से थोडी दूरी बनाए रखे हुए हैं। hआलात बेकाबू होते जा रहे हैं। राष्ट्रपति ज़रदारी को यही नही पता की मुल्क किस सब्द का नाम है।

उनका पिछला रिकॉर्ड खंगाला जाए तो सब कुछ पता चल जाएगा। वे कितने ईमानदार, मेहनती सच्चे हैं सब जानते हैं। इसमे शंका है जैसे तैसे सौदा कर उन्हूने अपने ऊपर भरष्टाचार के अनगिनत मामलू को हटवाया ही साथ ही ये तो मुशार्फफ़ में भी बाप निकले। बेनजीर की दर्दनाक मौत नही होती तो शायद ही इनको ऐसे राष्ट्रपति की कुर्सी के दीदार होते। उनकी नियत पर हम हेशा सक कर सकते हैं इसमे दो राय नही है। फ़िर भी असी इंसान का पता नही जो सुबह का खाना खाकर कुछ और बोलेगा और दोपहर शाम का कुछ और बोल सकता है। अपना एक स्टैंड नही है। भारत की आफियत उनको हज़म नही होती है। अगर युद्ध हुआ तो दोनु मुल्कू को काफ़ी नुकशान होगा। पाकिस्तान की हालत को क्या होगी अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। अभी वहा पर लोगूँ को समय पर तनख्वाह नही मिल पाती है युद्ध के बाद क्या हश्र होगा अल्लाह जाने......

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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

पाकिस्तान:- झूठ बोले कौवा काटे


हमारे पड़ोसी देश पकिस्तान को आज़ाद हुए लगभग ६० साल हो गए हैं लेकिन आज़ादी से आज तक उसने भारत के नाक में दम कर रखा है, चाहे वो राजनीतिक बयान बाज़ी हो, दिपक्षीय वार्ता हो, या फ़िर किसी अन्य बात पर अपना पक्ष रखने की बात. मौका देखकर पलटने में वहा के हुक्मरान समय जाया नही करते . पाकिस्तान का बयान बाज़ी का स्तर बहुत ही निम्न स्तर का रहा साथ ही बहुत गैर जिम्मेदाराना बयाहार रहा है। पाकिस्तान में राजनीतिक नेत्रत्व हमेशा से ही हाशिये पर रहा है इसमे कोई शक की कोई गुंजाईश नही है।
इतनी जल्दी और तत्परता वह अन्य चीजू में नही लगाता जितनी भारत के साथ आपसी विचार विमर्श, कूटनीतिक सम्बंद्हू की बातू पर. लेकिन अहम् बात यह है की आज के समय में जब राजनीतिक के बयानू को अन्तराष्ट्रीय पटल पर बड़े ध्यान से सुना जाता हो या लिखा जाता ह. ऐसे में जब सुचना तंत्र के युग में ये बाते बहुत महत्वा रखती है. पहले ऐसा नही होता था. महीनू आम जनता तक पहुचने में लग जाते थे तब तक उस बात का कोई अर्थ नही रह जाता था. पाकिस्तान की हालत हमेशा से दुबिधा से पीड़ित मरीज़ की तरह रही है और यह वह ख़ुद भी अची तरह जनता है. प्रधानमन्त्री और रास्त्रपति दोनू ही अलग अलग बयान जारी करते हैं. भूत्पूर्ब प्रधानमन्त्री ,अन्य जनरल के बयान अलग होते हैं. ऐसे में प्रश्न यह उठता है माने तो किसकी माने और प्रमुख बात क्या माने. इस लिए उसकी हर बात पर प्रश्न चिन्ह लगा रहता है. अभी कुछ दिनू पहले की बात है भुत्पूर्ब प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ ने माना की कस्साब पाकिस्तानी है और अबुसके दो दिन बाद बयान आता है की नही ऐसा नही है. कत्तार्पंधियौं और सेना के दबाव में आकर से ऐसा कर बैठे. आई एस आई चीफ को भारत भेजने के मामले में भी ऐसा ही हुआ. ऐसे में इन लोगू पर कितना यह्कीन किया जाए. जो देश की बागडोर सँभालने की बात करते हैं, उनका यह हाल है. छोटे बचू की तरह अपने बयानू को कुछ ही पल में बदल डालते हैं.
सबसे बड़ी समस्या वह सेना की रही है फ़िर भी कत्तार्पन्थियौं जो अब सीधे सरकार पर हावी हो रहे है. सेना की वह एक तरह से सरकार चलती है. और सेना आधे से ज्यादा फैसले ख़ुद तय करती है. सबसे बड़ी बात और ख़ास यह है की सेना पकिस्तान की विदेश नीति तय करती है. हुकूमत या आम जनता तो सिर्फ़ मूकदर्शक बनी रहती है. सेना के फैसले हमेसा कठिन और ताना तनी वाले होते हैं. सेना हमेसा युद्ध की सोचती है. वैसे भी वह की सेना ४ बार मार खा चुकी है हमसे. इसी बौखलाहट में वो आज तक है. वह क्योँ भूलेगी उस मार को. नतीजा यह रहा की परोक्ष युद्ध थोरा हुआ है उसने. आई एस आई और अन्य जिहादी गुट जैसे लश्कर,जैश,इख्वान,ज़माद उल दावा हो या अन्य कोई गुट सब एक जबान बोलते हैं वो है जिहाद. यह जिहाद पता नही कौन से किताब में लिखा है की निर्दोष निह्ठे लोगू को कत्ले आम कर दो. उनकी रोज़ी रोटी इसी से चलती आई है । भारत के ख़िलाफ़ कम करने में वह पर उनको शाबाशी और ईनाम दिया जाता है. इस तरह की हर्कतू कर वो अन्तराष्ट्रीय पटल पर अपनी कई दफा बेईज्ज़ती करवा चुका है. मगर बेशर्मी की हद होती है जो पकिस्तान और उसके हुक्मारानू, सेना पर लागू कटाई नहिः होती है. वह की आवाम भी जानती है इस तथ्य को लेकिंग वो क्या करे ? आज तक वह की आवाम कत्तार्पन्थियौं, सेना,पुलिस की डर से खुलकर सामने नही आ पाई है.
बयानबाजी या कोई बक्ताब्या सरकार की तरह से आने पर उसका एक महत्व होता है. एक एक सब्द के टोल कर बोला जाता है. उसका एक मतलब होता है. एक शब्द कई लोगू के दिमाग की उपज होती है तब जाकर वह नेता तक पंहुचा है. अंत में नेता के विवेक पर आधारित होता हाही की कितना तोडे-मरोड़े उस बयान को. अधिकतर यही होता है. जो लिखा गया हो या "ब्रीफ" किया गया हो उसी को वो बोले. लेकिन पकिस्तान के हुक्मरानू के बीच ऐसा कुछ नही दीखता. खासकर भारत के साथ सम्बंद्हू को लेकर वह बिल्कुल भी भरोसेमंद नही रहा. इन सब चीजू से आपसी बिश्वास पर शक की निगाह रहती है. जिसकी कोई दावा नही होती है. अमेरिका उसको पूरी कोचिंग देता है बयान बाज़ी की कोचिंग क्योँ नही देता है. उसने अपना उल्लू सीधा कर लिया अपनी सेना को वह पर उत्तारकर. आतंकवाद के नाम पर वो किसी भी देश में घुश जाता है लेकिन अपनी जरूरातू को पुरा करने के लिए. इराक़ ,अफगानिस्तान,वियतनाम में हम उसे देख चुके हैं. वह के हुक्मरान सेना और आई एस आई के अधिकार्यौं से घिरे रहते हैं. कोई रस्त्राध्यक्ष आएगा तो हमारे देश में कुछ और भाषा बोलता है और वह जाकर कुछ और बोलता है पता नही कौन सा मंत्र पढ़ते हैं जो ऐसा जो जाता है. कुल मिलाकर बयान बाज़ी बहुत ही निचले स्तर की रही है पकिस्तान की. आज की पढ़ी लिखी आवाम को समझना चाहिए की उनके लिए क्या जरूरी है क्या नही और ऐसे हुक्मारानू को सबक सिखाना चाहिए । क्यूंकि सब अमन और विकास चाहते हैं खून खराबा नही. ..

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

“BREAD PAKODA-:I know how to make it now”

December 25th, year 2008, Day Thursday. Holy day X-Mas is being celebrated in all over the world. Nice festival. Touchy day for everyone. I had off on previous night. So I got the time to wake up early in the morning. It was around 4 o clock I guess… after that I tried to enter famous room of any home Rosoi Ghar alias Kitchen to have some blast there. I know how to make Tea but not the special one, Aumlate only boiled one not another mixture type. Today I thought to make a different . as I feel cooking is an art itself. Suddenly I felt there should be male oriented dish. That is none other than ‘Bread Pakoda’. Ooops look at this name Bread=which is important for any human being and Pakoda=don’t know the meaning but I guess its male name not female. As I cook to enjoy. Hey here not involvement of female ok…? Cooking a female is other business…ha ha ha but I shares this with my ‘shore lass’. She was laughing in installments like ha aha he ahha ha. Jab male cooking karte hain to female aise hee hastee hai I guess…isn’t? any way finally I was inside kitchen to have some Bread Pakoda. I had seen to making Bread Pakoda before to mama, Halwaee or some where else many times. So like butcher I took knife and cut 5-10 pieces of bread in Triangle shape. But the question in my mind was ringing why we cutting in triangle mode why in round or in square or any other mathematical symbol. Which I don’t know much as my “GANIT” or Math is always under cover. I got ‘0’aka zero out of 100. which is really provable for me. You know why? Because my teacher always used to tell me you got “Anda” Murgi ka Anda and now cook & have it. And I liked Andaa always. Its realy tasty and healthy for the body. Egg created special respect inky mind so when ever I got the ‘Andaas in class I was happy that at least no one got it except me its means its unique. Which always in my mind. Due to that Andaa I stopped thinking much. And I got oil in to pan in which boiling immensely. I put one piece of two cut bread pieces in the liquid of pulse meal with spices fully and put in the pan. And you know, it was fantastic Art I guess… I made around 20 pieces which were enough for family members. In between my mom was with me, she taught how to put , pour and cook… but my younger kin did not like and he perfectly deny to have it and gone outside. My father was also not happy with this great process. Only my mom was taking interest with me in this great making of Bread Pakoda. But I don’t care all these…things. I know very well what to do , how to do. I enjoy in every thing making good. Infact cooking is not in my list of hobbies. Bu its part of home activity so I respect it. In the last I made around 14-15 bread Pakodas. And you know they were superb, smart, beautiful, elegant, energetic and sexy food. Ooops isn’t? yes it is…I served to Grand Maa, Mama, Papa with other stuff. Unfortunately not for my self. I had 3 or 4 pieces of simple bread with milk and tea but not Bread Pakodas. Because I am suffering from cough and neck pain. So this was my first date with Bread Pakoda and finally I made it successfully for others not for myself…….





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