बुधवार, 2 जून 2010

नो क्रिकेट........जेंटलमैन !

खेल मंत्री एम् एस गिल का यह कहना है कि क्रिकेट टीम को एशियन गेम में नहीं भेजा जाना चाहिए, अपने आप बहुत कुछ कहता है...जिस देश में क्रिकेट धर्म जैसा माना जाता हो...और जहाँ पर जनता इस खेल के प्रति इतनी सनकी हो कि कुछ भी करने को तैयार बैठी रहती है....वहां का खेल मंत्री का ऐसा बैयाँ आना देश के शर्म की बात है ....हालांकि उनका यह निजी बयान था. जब खेल मंत्री का दिल ही मान रहा है ऐसे में कुछ न कुछ बात तो जरुर है...एशियन गेम जैसे बड़े खेल के मेले में देश की प्रतिष्ठा का सवाल रहता है..हर देश का खिलाड़ी इस मेले में अपना जी जान लगा देता है...

खेल मंत्री का यह बयान वाकई इस खेल के प्रति निष्ठा और नियति पर सवालिया निशाँ खडा कर गया है . इसमें सट्टा, फरेब,खरीद फरोख्त होने से सायद वे भी दुखी हैं...उनको भी लगता है कहीं सट्टेबाजी का जिन्न या फिर अन्य परेशानी एशियन खेल में न आये.....बीसीसीआई उनके अन्दर नहीं है, नहीं तो शायद कबका मामला बिगड़ चुका होता ......आंखिर उन्हूने अपना पल्ला यह कर झाड दिया है कि बोर्ड क्या करेगा? ये फैसला उस पर छोड़ दिया है...लेकिन लगता है इस खेल के प्रति लोगों,अधिकारियौं और यहाँ तक सरकार का भी भरोसा उठने लग गया है...जिस हिसाब से पैसा इस खेल के रंग को रंगीन कर गया उससे तो यही लगता है आने वाले दिन इस खेल के लिए सरकार को कदम उठाना पड़ सकता है....और उठाना भी चाहिए क्यूंकि टीम्स की खरीद फरोख्त, पैसा फैंकने से देश के प्रति भावना कम हुई है और खेल को नुकशान हुआ है.....खेल कोई भी बुरा नहीं होता लेकिन जिस तरह से पिछले चंद वर्षों में इसमें इतनी तब्दीली आई है, उससे लगता है आने वाले दिन शुभ संकेत ले कर नहीं आने वाले हैं...हालत यह हो गई है लोगों को अब पता नहीं है खिलाड़ी कहाँ खेल रहा है और वो है कौन?

शनिवार, 29 मई 2010

आंसुओं के नमक में जो बात है

दिल्ली शहर की रोशनी को इकट्ठा किया था

फिर भी मेरा आशियान सज़ा नहीं

तूफान को फिर भी वो सह गया था

पर हवाओं से बिल्कुल भी बचा नहीं

शाम तो चमक रही है रंगों से

मगर रात के मंज़र का पता नहीं

लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा है

फिर भी अकेलेपन की कोई दवा नहीं

बहुत मशक्कत है इस ज़िंदगी के खेल में

जो उलझता है वो निकलता नहीं

जी तो लूंगा मैं इस बेबसी में भी

मगर मेरी सांसों की इसमें रज़ा नहीं

आंसुओं के नमक में जो बात है

हंसी की मिश्री में वो मज़ा नहीं

खुली हवा में घूमते हैं हम सब पर

घुटन से कोई भी निकला नहीं

रहगुज़र की तलाश में भटकते रहे हैं

पर सुकून को कोई भी ढूंढता नहीं

मुमकिन है दुनिया में लोगों से मिलना

पर खुद से मैं कभी मिला नहीं
राजेश 'प्रतिबिंब' दरियागंज,

महिला....क्या हूँ में ?


क्या हूं मैं?
किसके लिए हूं मैं? क्या मैं...मैं हूं?
क्या है मेरा नाम? क्या है मेरा अस्तित्व?
ये तो मैं हूं जिसका अस्तित्व ही बेनाम है हां किसी की बेटी,
पत्नी,
मां,
बहन हूं मैं पर क्या मैं स्वयं में मैं नहीं,
मेरा कोई अस्तित्व नहीं?
मैं जुड़ी हूं हर रिश्ते से पर मुझसे जुड़ा कोई रिश्ता नहीं आई थी
इस संसार में मैं बिना अस्तित्व के बिना अस्तित्व के ही चली जाऊंगी पर एक संदेश,
मैं इस दुनिया को बेझिझक दे जाऊंगी
यद्यपि मेरा अस्तित्व बेनाम है फिर भी तुम्हारा हर नाम मेरे अस्तित्व से जुड़ा है
यही मेरे अस्तित्व का नाम है जिसकी आज भी कोई पहचान नहीं और आज भी गुमनाम है।।
साभार दीक्षा देहरादून से

रविवार, 23 मई 2010

झुग्गी से निकला IAS हरीश चन्द्र !

झुग्गी में रहने वाला एक लड़का बना आईएएस !जी हाँ यह सच है....है न फक्र की बात..ये कारनामा कर दिखाया दिल्ली में 208 नंबर झुग्गी में रहने वाले हरीश चन्द्र ने..... सचमुच बहुत बड़ा काम कर दिखाया हरीश जी ने..न केवल अपने लिए बल्कि समाज और पूरे देश के लिए ....रिजल्ट आने के दूसरे दिन जब हरीश जी हमारे न्यूज़ रूम में आये थे, और मेरे सीट के बगल में बैठे, मेरे जूनियर ने मुझे बताया की सर ये हैं आईएएस हरीश चन्द्र...!मैंने उनसे हाथ मिलाया और बधाई दी, यूपीएससी परीक्षा में पास होने पर..और पूछा क्या विषय थे? और कैसे तैयारी की ?उन्हूने सब कुछ बताया...दिल बहुत खुश हुआ, कोई इतनी गरीबी से पढ़कर इतने ऊंचे ओहदे पर पंहुचा है...इस बीच उनका थोड़ी देर में बुलेटिन में स्टूडियो से लाइव होना था....में फिर से न्यूज़ रूम में ख़बरों में ब्यस्त था....मन बहुत खुश था की कोई सख्स जो जमीन से जुड़ा हुआ है और इस मुकाम तक पहुचा...वो भी झुग्गी में रहते हुए..आप अंदाजा लगा सकते हैं झुग्गी की जिंदगी कैसी होती है..उन्हूने बताया की ये मेरा पहला और आंखिरी प्रयास था...क्यूंकि अगले प्रयास के लिए सायद माता पिता साथ नहीं दे पाते क्यूंकि गरीबी का जिन्न जो उनके दरवाजे पर कुंडली मारे बैठा हुआ था..लेकिन कहते हैं न मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.ऊपर वाला जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है..वही हुआ..हरीश चन्द्र ने हार नहीं मानी हालातों से... और आज सर्बोच्च सीट पर बिराजमान है...में उनको देख कर एक पल तो हक्का-बक्का रह गया...लेकिन उनकी विल पॉवर देखकर गर्व भी हुआ...सबसे बड़ी बात झुग्गी से पले-बढे और इस मुकाम तक पहुचना बड़े फक्र की बात है...

दिल्ली की झुग्गी झोपडी में रहने वाले दिहाडी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर। यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाडी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाडी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है। संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।
मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें
मैंने संघर्ष की ऎसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पडती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पडता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाडी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपडी की हालत ऎसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।
मेरी हिम्मत: मां और बाबा
मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढाने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढाई पर पडा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढाई छोडने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पडेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेद्र सर
यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विष्ाय थे। विष्ाय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड है। उनका पढाने का तरीका ही कुछ ऎसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।
मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में न आए
मैंने जिंदगी के हर मोड पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थतियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को टयूशन पढाया और खुद भी पढता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।
मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान
मेरी जिंदगी में सबसे बडा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऎसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सबकुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।
मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो
मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छाशक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यो को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, 'मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.. '....सच में काबिले तारीफ....!समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के लिए प्रोत्साहित करने का उम्दा उदाहरण प्रस्तुत किया है हरीश चन्द्र ने !मेरी ओर से एक बार फिर से उनको हार्दिक बधाई !
[साभार राजस्थान पत्रिका]

शनिवार, 22 मई 2010

मेंगलुरु हवाई हादसा...अपनों ने अपने खोये....

समय सुबह 6 बजकर 3 मिनट, आसमान में एयर इंडिया का एक विमान हवा के साथ बातें करते हुए मेंगलुरु हवाई अड्डे पर उतरने की तैयारी में था..... इसमें सवार 158 लोग और छः क्रू मेंबर भी सवार थे. ये सभी दुबई से अपने वतन भारत रहे थे. एक विदेशी पाइलट और एक इंडियन पाइलट इस जहाज को उड़ा रहे थे....दूसरे वतन से अपने वतन लौट आने की इंतज़ार में उनके परिजन पूरी रात नहीं सो पाए थे.... ही दुबई से उड़ने के बाद वे सभी लोग जो अपनों से मिल पाने की ख़ुशी में इंतज़ार की हद पार कर पार रहे थे..एक एक पल उनके लिए मुश्किल होती जा रही थी.....
बोइंग 737-800 एयर क्राफ्ट को छः बजकर 3 मिनट पर जैसे ही लैंड करने के लिए एटीसी से हरी झंडी मिली, हवाई जहाज नीचे रन वे की तरफ दौड़ने लगा. ..थोड़ी दूर रन वे पर पहुचते ही ये क्या ...?जहाज रन वे से बाहर जाने लगा...और कुछ सेकंड्स के अन्दर हवाई अड्डे के साथ बने गड्ढों में जा गिरा..और एक ब्लास्ट हुआ जिसमे सिर्फ आठ भाग्यशाली लोगों को छोड़ कर बाकी मौत के मुह में शमा गए. ....बताया जाता है कि लैंडिंग के वक्त प्लेन का टायर फट गया और उसकी लेफ्ट विंग में आग लगगई। पायलट प्लेन पर कंट्रोल खो बैठा। प्लेन सीधे रनवे की फेंसिंग तोड़ते हुए खाई में जा गिरा। प्लेन के परखच्चे उड़ गए और उसमें आग लग गई। इसके लिए जिम्मेदार कौन, क्योँ इतने लोगों की जान गई? कौन है असल में जिम्मेदार इस हादसे का?इसका जवाब आने वाले दिनों में सरकार को देना पड़ेगा. आंखिर ना जाने कितने परिवार तबाह हो गए...... जाने कितने लाल चले गए इस दुनिया से...

शुक्रवार, 21 मई 2010

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी



एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी

दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी

ख़ामोशी
का हासिल बही इक लम्बी सी ख़ामोशी
उन
की बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी
[गुलजार की कलम से ]

नदी का हाले-बयां .....

एक नदी की बात सुनी...
इक शायर से पूछ रही थी
रोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर
मेरे
सीधी राह चलाते हैं
रोज़ ही तो मैं नाव भर कर,
पीठ पे लेकर
कितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।
रोज़ मेरे सीने पे लहरें
नाबालिग़ बच्चों के जैसे
कुछ-कुछ लिखी रहती हैं।

क्या ऐसा हो सकता है जब कुछ भी न हो कुछ भी नहीं...
और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँ
बस ठहरी रहूँ
और कुछ भी न हो !

जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,
मैं पड़ी रहूँ...!

[गुलजार की कलम से ]

बुधवार, 19 मई 2010

अफजल गुरु पर सरकारी राजनीती क्योँ

भारतीय लोकतंत्र का मंदिर संसद हमले का आरोपी अफजल गुरु फांसी को फांसी की सजा काफी पहले सुना दी गई थी...कोर्ट ने अपना काम कर दिया ..लेकिन अब तक हुकूमतें आपस में छुप्पन- छुपाई का खेल खेलने में लगी हुई है...फांसी अभी तक नहीं हो पाई है....अगर पुरे देश से पूछें तो लगभग सभी लोग यही कहेंगे की उसे जल्द से जल्द फांसी हो जानी चाहिए....मगर ये इस देश का दुर्भाग्य है जिस तरह से उसकी फाइल इधर-उधर की यात्रा कर रही है और केंद्र और राज्य सरकार की बीच झूलने में लगी हुई है ....उससे तो एक बात साफ़ है अफजल को फांसी देने में इन सरकारी नेताओं के मन में कही न कही सॉफ्ट कॉर्नर जरुर है..वरना ऐसी क्या मजबूरी कि इतना समय लग जाए . खैर कल जब दिल्ली की मुख्यमंत्री से मीडिया ने पूछा तो वो साफ़ जवाब नहीं दे पायी...और मामला असमंजस में ही दिखा...शाम होते होते खबर आई कि फाइल उपराज्यपाल के पास भेज दी गई है....

उपराज्यपाल ने फाइल एक घंटे के अन्दर वापस दिल्ली सरकार के पास फाइल भेज दी और पूछा स्पस्ट क्या कहना है...जैसे खबर आ रही थी.....इससे मुख्यमंत्री महोदय नाराज लग रही थी...ऐसा क्योँ? अगर चाहती होती तो क्योँ न जल्द दात्खत कर अपनी सरकार की प्रतिक्रया दे कर मामले को निपटा दें. लेकिन वही राजनीती.....सी एम् साहिबा को तो कोमन वेल्थ का भूत परेशां कर रहा है ऊपर से अफजल का जिन्न उनके सामने खड़ा हो गया है...मना करती हैं तो बुरा और हाँ करती हैं तो मुश्किल...अब ये मुश्किल क्या है ये तो वही जाने..लेकिन कुछ तो कुछ तो है...वरना इतने बड़े मुद्दे पर वो ढिलाई नहीं दिखाती.....

जिस तरह की प्रक्रिया हमारे देश में चल रही है वो ठीक नहीं है...क्यूंकि दोषी को जब सजा हो गई है...वो जल्द से जल्द और गिने चुने दिनों के अन्दर उसको सजा दे देनी चाहिए...इससे देश का मजाक बनता है...और आतंकी दुस्साहस करने में फीसे पूरी कोशिश कर सकते हैं....इससे उनका ऐसे काम करने में और विश्वास बढेगा....उनको बल मिलेगा....इससे लोगों में न सिर्फ गलत मेसेज जाएगा बल्कि सरकार कि कार्यकुशलता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है....और बिपक्ष इसका भरपूर लाभ उठाएगा...उसे एक नया मुद्दा हाथ लग जायेगा, और यह तो देश कि सुरक्ष्या का भी मामला है, और देश कि जनता इसे गंभीरता से ले सकती है....आगे आने वाले चुनावों में सत्ता पक्ष को नतीजा भुगतना पद सकता है....उस समय विकास नहीं बल्कि ठोस मुद्दे हावी रहते हैं....जनता इन नेताओं को लुटियन ज़ोन कि पहाड़ी से बहार खदेड़ देगी.

जो भी है इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार को जल्द और फांसी पर अपनी मुहर लगा देनी चाहिए. वरना दिल्ली सरकार के लिए इस मुद्दे पर आने वाले दिन परेशानी भरे हो सकते हैं. जल्द ही यह बहस भी छिड़ सकती है कि इतना लम्बा प्रोसेस क्योँ ? जब कोर्ट ने सजा दे दी तो सीधे राष्ट्रपति के पास भेजी जानी चाहिए...वो भी सिमित दिनों के अन्दर....इस तरह से सरकारी नेताओं के पास नहीं भेजी जानी चाहिए....और यह भी जरुरी हो गया है कि इतने लम्बे प्रोसेस को कम करने के लिए सरकार को जल्द ही विधेयक ला कार कानून में संसोधन लाने पर विचार करना चाहिए...क्यूंकि इसकी आवस्यकता और बढ़ गई है...देश आतंकवाद से जूझ रहा है...कबी नक्सल तो कभी माओवादी...कभी लश्कर तो कभी और उग्रावादी गुट.....अगर आतंकवाद से लड़ना है और देश में शान्ति कायम रखनी है तो सख्त कानून तो बनाना ही पड़ेगा.

रविवार, 16 मई 2010

भगदड़ में 2 की मौत और रेल मंत्री का अजीब बयान....





रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.

मृतकों और घायलों के परिवार वालों के प्रति सम्बेदना जताने के बजाय उल्टा जिम्मेदार लोगों को ही बता दिया गया है....ऐसे बोली जैसे उनकी कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही है ही नहीं है...खैर...नयी दिल्ली रेलवे स्टेसन पर जो हादसा रविवार दोपहर में हुआ वो भयानक था. एक तो सूर्य की मात..गर्मी का परा ४५ डिग्री के आस पास ऊपर से लोग घर परिवार के साथ इधर उधर जा रहे थे..ऐसे में ऐसी भगदड़ होना और फिर मौत.....! सच में निंदनीय है. रेल मंत्री ने मृतकों और घायल लोगों के खिलाफ कुछ पैसे देने की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी. जांच की घोषणा कर डाली. खुद बैठी हैं कोलकता में... दिल्ली आने की जहमत भी नहीं उठाई. ना कोई प्रेस कांफेरेंस...सिर्फ एक बाईट दे दी...जो भी है भगदड़ इसलिए हुई क्योँ की ट्रेन १२ के बजे १३ पर आई....जबकि उद्घोषणा १२ की हुई थी.....ये रेलवे की गलती नहीं तो किसकी है ?ममता बनर्जी को इसका जवाब देना चाहिए...और ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयान देने से पहले सोचना चाहिए...रेल मंत्री होने के कारण उन पर बड़ी जिम्मेदारी है..वे इसे हलके में नहीं ले सकती....रेलवे को और दुरुस्त और नियमित होने की जरुरत है...वरना विश्व के इस बड़े रेल नेटवर्क को ऐसे हादसों का सामना आगे भी करना पद सकता है .....जब हमारे संवादाता वहां पहुचे, मंजर बेहद खतरनाक था और लोग आक्रोशित थे. रात नौ बजे तक लाइव चला लेकिन न रेल मंत्री न कोई दूसरा मंत्री सामने आया. सब संडे का जश्न मनाने में मग्न थे. जिनकी जान गई जो घायल हुए जो बेहोस पड़े हुए हैं उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं....ये देश के नेताओं का हाल है....जो समाज सेवा का
दम भरते घूमते फिरते हैं और लुटियन ज़ोन के बिलों में छुपे बैठे हैं. ....

सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है


सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है
ये ज़मी दूर तक हमारी है

मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ
जिससे यारी है उससे यारी है

हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है

मैं तो अब उससे दूर हूँ शायद
जिस इमारत पे संगबारी है

नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है

फ़लसफ़ा है हयात का मुश्किल
वैसे मज़मून इख्तियारी है

रेत के घर तो बह गए नज़मी
बारिशों का खुलूस जारी है

{अख्तर नाजमी की रचना}

तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर



तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी
मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी|

रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर,
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी|

हज़ार उल्फ़त सताए लेकिन मेरे इरादों से है ये मुमकिन,
अगर
शराफ़त को तुमने छेड़ा तो ज़िन्दगी तुम पे वार होगी|

[ख्वाजा मीर दर्द की रचना......]

शुक्रवार, 14 मई 2010

गांव वालों ने बनाये पॉवर प्लांट के अधिकारी बंधक,पोती कालिख

एक बार फिर से ग्रामीणों का गुस्सा निजी कंपनी के अधिकारियौं पर उतरा.....यही नहीं बल्कि उन्हें सजा भी दे डाली....लोकतंत्र में ऐसा होना क्या जायज है? फिर पुलिस और कानून का क्या मतलब रह जाता है? जो भी हुआ ठीक नहीं हुआ....अभी हालत तनावपूर्ण है....इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया है... रायगढ़ जिले के खरसिया विकास खंड के ग्राम दर्रामुडा में लगने वाले एक निजी पावर प्लांट एस के एस पावर ली। के विरोध में उतरे ग्रामीणों ने कल प्लांट के तीन अधिकारीयों को सुबह लगभग १० बजे से बंधक बना लिया था उन्होंने तीनो अधिकारीयों को पीटा तथा अर्धनग्न कर मुंह पर गोबर पोतकर घंटो कड़कती धूप में खड़ा कर दिया उनसे कंपनी मुर्दाबाद के नारे लगवाए और मुर्गा बनने पर मजबूर किया अधिकारयो ने कान पकड़ कर उठक बैठक भी की ।
मौके पर पंहुची पुलिस ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया पर ग्रामीण नहीं माने इस बीच ग्रामीणों ने प्लांट की कार में जमकर तोड़फोड़ की वे कलेक्टर को गाँव में आने की बात पर अड़े रहे अंततः अतरिक्त कलेक्टर श्री शर्मा के मौके पर पहुचने के बाद किसी तरह शाम ५.३० पर अधिकारियो को मुक्त कराया गया ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचे ऐ डी एम् , ऐ एस पी और एस डी ऍम को बंधक बनाने का प्रयास किया तब जाकर तमाशबीन पुलिस ने लाठी चार्ज किया और अश्रुगेस के गोले दागे उधर ग्रामीणों ने भी पत्थर बाजी की जिसमे एस डी ओ पी खरसिया का हाथ टूट गया और लगभग ६ सिपाही घायल हो गए ग्रामीणों ने कम्पनी की कार को आग के हवाले कर दिया और पुलिस के वाहनों में भी तोड़ फोड़ का प्रयास किया देर शाम गाँव पहुचे कलेक्टर ने दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की बात कही देखते ही देखते गाँव की घेराबंदी कर दी गयी।
आज सुबह से ही गिरफ्तारियो का सिलसिला चालू है अभी तक लगभग ३० ग्रामीणों को हिरासत में लिया गया है इधर गिरफ़्तारी को लेकर ग्रामीण गुस्से में है पुर गाँव फौजी छावनी में तब्दील हो गया है . प्रदुषण की मार झेल रही जनता और आपने खेती किसानी की जमींन छिनने पर नाराज ग्रामीणों का कानून अपने हाथ में लेने का यह पहला मामला है जनआक्रोश की इस बानगी को देख कर लगता है की आगामी १७-०५-२०१० को होने वाली जन सुनवाई में ग्रामीणों का विरोध खुलकर सामने आयेगा . फिर से एक बार ग्रामीणों के गुस्से के शिकार अधिकारियों को होना पड़ा है, कहीं न कहीं तो कमी जरुर रही है.....और पॉवर प्लांट निजी है इसलिए भी ग्रामीणों ने ऐसा किया है. लेकिन किसी अधिकारी के मुह पर कालिख पोतना और ऐसी सजा दे कर कानून हाथ में लेना ठीक नहीं है. ....

बुधवार, 12 मई 2010

राहुल & बिल गेट्स गाँव में.......



राहुल गाँधी और कम्प्यूटर किंग बिल गेट्स भारत के गरीब देहात में दो दिन के दौरे पर इस भरी गर्मी में अपने आप को तपा रहे हैं. एक गाँधी खानदान का सूर्य और दूसरा कम्प्यूटर का किंग ! एक भारत जैसे लोकतंत्र में प्रशिद्ध और अविवाहित नेता है तो दूसरा विश्व के दूसरे लोकतंत्र अमेरिका में जन्मा और पला, बढ़ा, सफल और औसत दर्जे का पढ़ा लिखा इंजिनियर ! दोनू ही अमेठी जैसे इलाके में इस भरी गर्मी अपने को 'न बाथ'करवाने में लगे हुए हैं, और वो भी उस इलाके में जिसके पीछे सिर्फ गाँधी परिवार का टैग लगा हुआ है.....वो इलाका इन्ही के नाम से हुंकार भरता है. ..कारण सब जानते हैं... वही से गाँधी परिवार से कोई न कोई सांसद हर बार लोकतंत्र के मंदिर में पहुचता है.

राहुल गाँधी विदेश में पढ़े लिखे हैं और अच्छी सोच रखने वाले युवा नेता हैं. अपने साथ बिल गेट्स को ले गए....इरादा क्या था कुछ समझ में आता कुछ नहीं भी....खैर पहली दफा तो यही लगता है वो कुछ न कुछ आर्थिक सहायता या फिर कोई संस्थान वहां पर खुलवाना चाहते हैं....दूसरी भाषा में कहें तो बिल गेट्स का पैसा लगवाना चाहते हैं....चलो शुक्र है...इन पचास सालों में कुछ तो अच्छा होगा अमेठी में या फिर वही गरीबी और वही दुःख भरी दास्ताँ दिखाई देगी...शायद वहां कि जनता अब विकास के इंतज़ार में भूखी बैठी है....खैर राहुल गाँधी पीआर [पब्लिक रिलेसन ]में परफेक्ट नेता बन गए हैं . उनको देख कर बिपक्षी दलों के कुछ नेता भी उन्ही के राह में चलने लगे हैं...कहीं भी गाडी रोक कर गरीब आदमी का हाथ पकड़ लो, घर में जा कर खाना खा लो,हाल चाल पूछ लो.....आधी रात में कमरे से निकल कर सीधे गाँव में घुस जाओ...खुद भी मत सोना और गाँव वालों को भी मत सोने दीजिये.....ये लोजिक समझ नहीं आया....मिलना तो दिन में भी हो सकता है ....?जहाँ तक सुरक्ष्या और खतरे वाली बात है रात में तो और भी ज्यादा है....खैर अपना अपना अंदाज है ! मगर एक बात काबिले तारीफ है राहुल कम से कम अपने इलाके में जाते तो हैं वहीं आजकल के नेता लोग चुनाव जीतने के बाद सब कुछ भूल जाते हैं....कि उनका संसदीय इलाका कौन है.....और अपने लुटियन जोने के बिल से निकलने में घबराते हैं......

बिल गेट्स ने उत्तराखंड में अपना ठिकाना बना लिया अब अगला अमेठी तो नहीं है ये देखना होगा? राहुल गाँधी भी शंका में रहेंगे तब तक जब तक मायावती कि सरकार रहेगी...क्यूंकि तब तक कोई प्रोजेक्ट बिना बहनजी के हरी झंडी से हो पाना संभव होगा या नहीं देखना वाली बात होगी...फिर भी बिल गेट्स जैसे इंसान का आना अच्छी बात है.....! बेस्ट ऑफ़ लक राहुल & बिल

मंगलवार, 11 मई 2010

आनंद बने दूसरी बार विश्व के राजा

अपने ग्रेंडमास्टर विश्वनाथ आनंद फिर बने विश्व चैंपियन ! जी हाँ पिछले कई सालों से इस सख्स ने देश का नाम रोशन किया है... देश का गौरव बढ़ाते हुए आनंद ने विश्व चेस चैंपियनशिप के फाइनल में वेसलीन टोपलोव को हराया वो भी सिर्फ 56 चालों में शिकस्त देकर खिताब पर कब्ज़ा कर डाला...
इस गेम में बारह गेम खेले जाते हैं...और इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भारतीय ग्रेंडमास्टर ने टोपलोव के 5.5 अंक के मुकाबले 6.5 अंक अर्जित कर जीत हासिल की। पहले भी आनंद ने इसे 2008 में इस खिताब को जीता था।खास बात पहले पूरे आनंद टोपलोव से हार गए थे फिर अगले मुकाबले में ड्रा खेला.... गजब की टक्कर दी क्योँकी पहले हार और फिर दिमागी रूप से मजबूत और हमेसा तेज़ी से चाल चलने वाले आनंद आंखिर कार राजा साबित हुए.....और अंत में चौथे गेम में उन्हूने बाज़ी मार ली और और एक अंक की बढ़त ले ली...

लेकिन एक बात हमेशा जहाँ में जो नाम, कवरेज,सोहरत आनंद जैसे खिलाड़ी को मिलनी चाहिए, वो नहीं मिली....आंखिर ऐसा क्योँ? वो सच्चे खिलाड़ी हैं, देश के लिए इतना नाम कमाया है उन्हूने, और एक अच्छे इंसान भी हैं...मीडिया ने भी खासकर इंडियन मीडिया ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी..अखबार में तो छाये रहे लेकिन टीवी पर सिर्फ खबर चला दी...ब्रेकिंग चला दी, और कुछ नहीं .....क्रिकेट होता तो एक एक बाल पर क्या हुआ एक्सपर्ट बैठा दिए होते.....और पता नहीं कितने इनाम दे चुके होते...कितने मीडिया वाले कैमरे ले कर पीछे पीछे भाग रहे होते....भारत की बादशाहत अब दिख रही है...रशिया अब इसमें पीछे होता दिख रहा है ....कुछ भी हो आनंद को हमारी ओर से ढेर बधाई.....!

गुरुवार, 6 मई 2010

कसाब को फांसी......!

आंखिर मिल ही गई पाकिस्तानी कसाब को फांसी की सजा....स्पेसल जज तहिलियानी ने सुनाई सजा!...अब देखना यह है कब उसे फांसी लगती है....और वो शुभ दिन कब आ पाता है?...आज का दिन बड़ा गहमा -गहमी का रहा...दो बजे ऑफिस पंहुचा तो देखा सभी चैनल में एक ही खबर चल रही थी...अब होने वाला है सजा का ऐलान ...अब कुछ ही देर में .....सो-सो .....सजा सुनाने के बाद मीडिया के लोगों की जो हालत हो रही वो देखने लायक थी..और ख़ुशी भी हो रही थी...कैसे लोगों तक खबर पहुचाते हैं....और कितनी मेहनत करनी पड़ती है...एक-एक खबर के लिए...वो सच में एक अलग शोट था.....अपने-अपने चैनल, अखबार के लिए कबर करते हुए सभी बड़े उत्सुकता और चतुर तरीके से काम कर रहे थे...अब देखना बाकी है किस दिन कसाब को फांसी दी जाती है.....मुंबई हमले वाले दिन रात्री शिफ्ट में था...अकेले था..पूरी रात कैमरा लाइव मोड में था.....और आतंकी दनादन गोलियां बरसा रहे थे....हमारी ३-४ चार यूनिट लगी हुई थी....सभी मुस्तैद थे....और ताज जलता जा रहा था...अच्छी तरह याद है....वो रात..........!

बुधवार, 5 मई 2010

टीवी पत्रकार शहीद !

एक पत्रकार की मौत हो गई.....खबर कबर करते हुए....फिर से खबर को सर्वोपरि रखते हुए इस पत्रकार ने अपनी जान गवां दी.....अजय तिवारी सहारा समय/एनसीआर के लिए काम करते थे....जब में रिपोर्टिंग करता था, उस समय हमने कई बार साथ खबर कबरेज की थी.बाद में डेस्क पर आ गया और दूसरी जगह नियुक्ति होने के कारण मुलाक़ात कभी कभार हो जाया करती थी...मगर मुझे हमेसा उन्हूने अच्छी बात बताई....खाफी तेज तरार और चतुर पत्रकार माने जाते थे....हमेसा बोलने में किसी भी विषय पर पकड़ तो थी ही साथ ही हर इंसान के साथ मिलन सार भी थे...अपने पीछे पत्नी और ढाई साल के लड़का को छोड़ कर चल दिए...राजापुरी इलाके में गत्ते की फैक्टरी में आग लग गई थी..उसी खबर को कवर करने गए थे....हमारे रिपोर्टर भी गए थे उनको भी चोट आई है....एक बार फिर से एक पत्रकार की मौत हो गई खबर कबर करते हुए....पत्रकारिता की फिर से जीत हुई...मगर एक पत्रकार की जिंदगी का अंत हो गया....इश्वर करे दिवंगत आत्मा को शांति मिले.....मेरी और से अजय भाई को श्रधान्जली !

एक बूड़ी मां का दर्द.........

एक बूड़ी मां का दर्द............
पति को कन्धा देने चार जने आये,
मेरे जने चार नहीं आये
बस !
अनिल गोयल की कलम से ....'मां यात्रा' से .....

रविवार, 2 मई 2010

आइस क्रीम का मज़ा देर रात में !

आइस क्रीम का अभी अपना ही मजा है, बिलकुल ! गर्मी के दिन और राजधानी दिल्ली की सड़कें...समय रात के ११:३० बजे.....में और मेरा पत्रकार दोस्त मंदीप चौहान जो मेरे साथ ते टीवी चैनल में कार्यरत है...मुनिरका पहुचे तो मैंने एक गोरी गुलाबी 'कसाटा' और एक काली भूरी 'चोकबार' ली...मंदीप ने चोक बार ले ली..जिसमे लकड़ी की स्टिक लगी थी....और कसाटा जो पोलीथीन के अन्दर लपेटी हुई थे फिर बाहर से रंग विरंगा कागज का डब्बा...उसे मैंने उधेड़ डाला...और थोडा थोडा लकड़ी की चम्मच के साथ चखे जा रहा था...गाडी चलती जा रही थी..हम दोनू कार में थे और रात्री शिफ्ट होने की वजह से ऑफिस जा रहे थे...ड्यूटी समय रात १२ बजे से था..मगर आइस क्रीम खाते-खाते बड़ा आनंद आया..ऊपर से दिल्ली में बिछी हुई चौड़ी चौड़ी सड़कें...और हम दोनों टेस्ट लेते हुए ऑफिस पहुचे ! वाह क्या बात है...हमारी खूब बातें निकली रास्ते भर...मुद्दे अलग- अलग थे....सबसे बड़ी बात यह रही मैंने चोक बार नहीं खाई और मंदीप ने कसाटा...क्यूंकि दोनों का टेस्ट एक दूसरे पर हावी न हो ... खैर भरी गर्मी में दिल्ली की आइस क्रीम का मजा लेने में एक और शाम गुमनाम हो गई.....और हम आगे बढ़ गए ....

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

गवायिंत का अंदाज

दिन रविवार और जगह बाहिरी दिल्ली का एक सुन्दर गाँव ! रविवार के दिन मेरा वीकली ऑफ था, सुबह में घर से निकला सीधे हमारे बरिष्ठ साथी और पत्रकार भारद्वाज जी के ऑफिस में गया.....कुछ देर बैठने के बाद वो आये और हम दोनूं एक पास ही एक गाँव की ओर चल दिए....मैंने भी सोचा चलो देख आते हैं क्या नज़ारा है वहां का? काफी समय हो गया है उस इलाके में गए हुए.... भारद्वाज जी ने बताया मुझे की किसी का कारज है....उसमे जाना है.....कारज किसी की मौत के बाद उसकी याद में कार्यक्रम किया जाता है...और गाँव और रिश्तेदारों को भोजन किया जाता है....पंडित तो होंगे ही.....खैर....पहुचे वहां तो अजीब-अजीब बातें हुई जिन्हें मैने सोचा कि आपके साथ शेयर करूँ....

गावं में पहुचे तो देख कर सामने दांग रह गए....'व्हाईट हाउस'...तक़रीबन एक हज़ार गज जमीन में बना हुआ तीन मंजिला व्हाईट हाउस...क्या डिजाइन था....उसकी एक बालकोनी कुछ महिलाएं कड़ी थी और गुफ्तुअगु में मशगूल थी....हमने गाडी बहार सड़क किनारे कड़ी की और गेट के अन्दर घुसे तो देखा सामने बड़ा टेंट लगा हुआ है और कुछ लोग नीचे बैठकर खाना खा रहे हैं, दाई और प्लाट के कुछ बुजुर्ग लोग मुढे में बैठे हैं और हाथ में शरबत के गिलास के साथ गर्मी को दूर कर रहे हैं. भरद्वाज जी सीठे वही गए,एक दो गाँव वालों को राम राम कह कर...ये क्या ? जब हमने देखा वहां बैठे बुजुर्ग शरबत नहीं बल्कि अंग्रेजी शरबत पी रहे थे. मुढे के साथ में अंग्रेजी शराब की बोतल रखी हुई थी और हाथ में प्लास्टिक के ग्लास में शरबत....जिससे किसी को बोतल भी नहीं दिखे और लोग समझेंगे कि शराब नहीं बल्कि शर्बात पी रहे हैं...हमारे जानकार एक अंकल भी उनमे से...हमें देख कर तुरंत खड़े हो गए और स्वागत किया....कहते हैं ना कि गाँव के बुजुर्ग बढे सयाने [समजदार] होते हैं वही हुआ....सभी ने शरबत कि ग्लास नीचे रख दी...एक ग्लास मुझे भी दे..मैंने भी शरबत समझ कर पी लिया, शुक्र है शराब मिक्स नहीं थी उसमे....खैर आगे गए भरद्वाज जी बोले चलो भोजन कर लिया जाये...भारद्वाज जी बोले कहाँ बैठें मैंने कहा कि नीचे बैठते हैं और खा लेते हैं, लेकिन अंकल ने कहा कुर्सी आ रही है उसमे बैठ के खायेंगे...उन्हूने आवाज दी अरे सुनिओ भाई कुर्सी लाना...दो कुर्सी आ गई, दोनू में भरद्वाज जी और में बैठ गए....एक और मंगाई गई खाना रखने के लिए जो डाइनिंग टेबल का काम कर सके....फिर एक और मंगाई जो अंकल को बैठा सके....कुल मिला कर कुसियाँ लाने और बैठने का दौर चलते रहा और हमें आंखिर कार कुर्सी मिल भी गई.

अंकल ने आवाज दी पूरी लाइओ भाई ! गरम गरम लाना ! एक आदमी भागा आया और एक टोकरी में पूरी ले आया...बोला 'ताऊ' ताती हैं, गरम नहीं हैं.......उफ्फ्फ ताती और गरम तो एक ही होते हैं...लेकिन वो आदमी सच्चा था डबल न समझ कर सिंगल दिमाग लगाने वाला...इसलिए उसने जो था वो बोल दिया...शहरी सब्द गरम को नहीं अपना पाया और न ही बोला....खैर ! अच्छा लगा ये सुन कर...अभी लोग दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग कितने सीमित विचार धारा के हैं. उनके लिए सरकार के विकास और तरकी के मायने ज्यादा नहीं हैं. ...एक प्लेट में उसने 7-8 पूरी रख दी, ताती ताती ...और फिर सीता फल कि सब्जी पूरी प्लेट भरकर...और बोरिंग आलू कि भी...इससे पहले 4 लड्डू रखे एक हट्टे कट्टे युवक ने, कहा ताऊ लाड्डो खा ले....लाड्डो भी बड़े बड़े थे..मैंने भी 2 खा दिए....देखि जाएगी.....[हरियाणा में कारज में खाने से पहले मीठा दिया जाता है और लाड्डो का प्रचलन खूब है] ..1 भरद्वाज जी ने और अंकल ने नहीं खाए...वो विदेशी सरबत में ब्यस्त में थे.....मीठा और रंगीला कर देता उनको...समझदार थे...मुझे बताया गया कि सीताफल कि सब्जी स्वादिस्ट है..खासकर तौर पर बनाने वाले को बुलाया गया है...चखी तो सच में स्वादिस्ट थी...खाना खाया हमने सब सब्जी और पूरी सहीद कर डाली पेट के अन्दर...तीनों ने..! अब पानी कहाँ मिलेगा..देखा तो आस पास कुछ नहीं ...बहार गए गेट के तो देहा सामने 3-4 ड्रम रखे हुए हैं प्लास्टिक के...और कुछ बच्चे पानी निकालने में लगे हुए हैं...वो भी प्लास्टिक कि बोतल काट कर बनाए गए बर्तन से....वाह क्या आईडिया था....

बारी थी अब उनसे मिल लिया जाए..जिन्हूने ये 'कारज' पार्टी रखी है....जी हाँ उन्हूने मुझे भी पहचान लिया...राम राम हुई दोनू तरफ से....पता लगा इन जनाब ने अपने पिता जी का जिन्दा जी कारज कर डाला....लो कर लो क्या करोगे अब ! जी हाँ जिन्दा जी...श्राद सुना है लकिन कारज .....ऊपर से मूर्ति और बनवा दी उसे प्लाट के एक कोने में....वाह...पता लगा कि 14000 पत्तल जो समां चुके हैं लोगों के पेट में बाकी और आयें, ये कोई गारंटी नहीं है.....सुनने में आई कि कोई जमीन में हाथ मार लिया....कुल मिलाकर पौ बारह ! जनाब करते क्या हैं ? लोगों को यात्रा पत्र देते हैं....बोले तो डीटीसी में कंडक्टर हैं....जी हाँ......गजब के इंसान ! पेशे से कंडक्टर.....और पार्ट टाइम प्रोपर्टी डीलर वो भी सरकारी/गैर सरकारी जमीन के....जो कहीं न बेच पाए वो ये बेच खायेंगे...और कोठी सफ़ेद रंग कि, इटालियन मार्बल से जड़ी हुई ....गाँव का ताज महल कहें तो बुरा नहीं... जो लोग देखते रह जाए.....कुल मिलाकर गवायंत कि बात ही कुछ और है...लोग गाँव में रह कर भी धन दौलत के साथ तरक्की करने में लगे हुए हैं....कुल मिलाकर गाँव का दौरा अच्छा रहा और काफी कुछ सीखने को मिला..अच्छा लगा सब कुछ देख कर.. ...

रविवार, 25 अप्रैल 2010

वी मिस ह़र........

किसी ने सच कहा है जिंदगी का पता नहीं? कब कहाँ शाम हो जाये? और किस घडी में? किस हालात में?लेकिन जिसे पता है जिंदगी का, उसे इंसान नहीं महात्मा [महान+आत्मा] कहा जाता है...और जो इस सच को गले लगा गया वो उसका अपना फैसला होता है !दुःख इस बात का और बढ़ जाता है, जब कोई अपना अजीज इस सच हो गले लगा लेता है ......और उस परिवार के लिए यह बहुत बड़ी त्रासदी होती है !

दिन शुक्रवार, समय सुबह 10 बजे के आस-पास, हर दिन की तरह घर पर सो रहा था, रात को देर से घर पहुचने के कारण सुबह उठने में देरी हो ही जाती है... मीडिया/प्रेस वालों की जिंदगी ख़बरों तक ही सीमित रह जाती है थोडा बहुत जो समय मिलता है उसमे आराम भी जरुरी है ..ये मेरी कमजोरी है कि मुझे आठ घंटे की नींद पूरी चाहिए. ...तक़रीबन दस बजे सुबह मेरे चचेरे भाई का फोन आया...भाई कहाँ हो? मैंने कहा हाँ बोल घर पर! ऑफिस जाऊँगा थोड़ी देर में, उठा नहीं था में,सोये हुए उसके फ़ोन का जवाब दे रहा था....भरे गले से आधी नींद में आँखें खुली भी नहीं थी मेरी, ....वो बोला भाई [] ने सुसाइड कर लिया है ! मेरी समझ में कुछ नहीं आया पहले, एक मिनट के लिए कुछ समझ नहीं आया क्या बोलूं न दिमाग करना काम किया...उसने फिर पूछा भाई क्या करूँ? फिर थोड़ी आँखें खुली और समझा आया तो देर हो चुकी थी.....वो बोल चूका था और में समझ चुका था......मैंने कहा की पुलिस को कॉल कर, बांकी बात में कर लूँगा, कोइस समस्या नहीं होगी...अमूमन पुलिस वाले परेशान करते हैं..शव को पीएम के लिए भेजना, फिर तरह तरह से सवाल जवाब....लेकिन कुछ संदिग्ध नहीं था इसलिए जल्द ही उन्हूने किलियर का दिया...पुलिस वाले भी अच्छे इंसान थे...सभ्य और सुशील !कुछ मीडिया का दवाब मान कर जल्द ही उन्हूने शव को परिवार के हवाले कर दिया.... शव घर के अन्दर चैन की नींद में सो रहा था ! वो कोई और नहीं बल्कि मेरी चचेरी बहन का था....सब उसे प्यार करते थे, सुन्दर थी, बहादुर थी,बुद्धिमता में किसी से कम नहीं थी और जिंदगी में कुछ कर सकने कि जद्धोजहद में जिंदगी से जूझ रही थी.....घर में बचपन से चंचल स्वभाव की थी....सबकी प्यारी लाडली बच्ची थी....भाई विदेश में है और कुछ दिन पहले ही उसके लिए उसने कुछ रुपये भिजवाये थे, ताकि उसकी आगे कि पढ़ाई और अच्छी तरह और पूरी हो और उसकी बहन अच्छी तरह से पढ़ सके. बड़ी बहन के लिए भी पैसे भिजवाये थे . पिता जी कोमल ह्रदय के और साफ़ इंसान हैं, सामाजिक रूप से लोगों कि भलाई करने वाले और हमेसा सच बोलने वाले .मेहनत में यकीन रखने वाले और अच्छे पद पर बिराजमान हैं ,लेकिन इस हादसे ने उन्हें काफी दुःख पंहुचा है, सायद उसकी कल्पना कर पाना संभव नहीं है...... मां एक अच्छे परिवार से तालुक रखने वाली गृहणी हैं, और हमेसा प्यार से बोलने वाली और सोफ्ट स्वभाव वाली महिला रही हैं जो अपने परिवार को हर संभव, हर चीज़ देने की कोशिश में रहती हैं, और दिया भी है आज तक उन्हूने.,,, छोटा भाई जितनी प्यारी वो थी उतना ही प्यारा है. बड़ी बहन भी एक बड़ी दीदी कि तरह हमेसा ना डाटने वाली और न झगडा करने वाली और चोटों कि मांग पूरी करने वाली है, और बहुत प्यारी बच्ची है.....उसकी अन्खून में आज आँसों थे.....अपनी प्यारी बहन जो खो चुकी है....पिता परेशान थे क्या गलत हुआ उनसे जो उनकी बच्ची ने ऐसा किया....मां बिलख बिलख रो पड़ रही थी....और अपने आप को नहीं संभाला जा रहा था उससे......कलेजे का टुकड़ा जो चला गया....में भी तुरंत पहुंचा....पंहुचा तो देखा ये सब मंजर !कुछ शब्द नहीं थे मेरे पास ! छोटी सी थी,जब वह हमारे घर आई थी और कुछ दिन रही थी.....उसकी चुलबुलाहट,और उलझी-सीधी बातें आज तक याद है......प्यारी बहन की तरह कोई बात होती तो पूछ लेती थी मुझे ..कहती ! भाई ये क्या है? कैसे होता है?.....तरह तरह...लेकिन कभी-कभी जिरह, तर्क-वितर्क भी कर बैठती थी......आज वो हामारी बीच नहीं है......उसका अंतिम बार देखा मासूम चेहरा जिस पर न कोई सिकन थी न ही कोई दर्द.....

मगर एक प्रश्न हमेसा दिल में खौलता रहा की ऐसा क्योँ किया उसने ?...सब कुछ होते भी ऐसा कर डाला....क्योँ ? इतना अच्छा घर, लोग,हालात सब कुछ तो ठीक था.....किसी के पास कोई जवाब नहीं ?कुछ न होते हुए भी सब कुछ कर दिया एक मिनट में......मेरी और से प्यारी श्रधान्जली और दुआ है कि उसकी आत्मा को असीम शान्ति मिले......उस बच्चे को में हमेसा मिस करूँगा............

रविवार, 18 अप्रैल 2010

शशि थरूर, सुनंदा और आईपीएल !


विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर जितने प्रसिद्ध कुछ समय पहले अंतररास्ट्रीय स्तर पर थे....आज उतनी ही बात उनके बारे में विवाद के तौर पर उभर कर सामने आई है.....कभी उल्टे -सीधे बयान दे कर मनमोहन सिंह की सरकार के नाक में दम करने वाले थरूर आज फिर से मुशीबत में हैं. लेकिन समय और विषय बदल गया है. सरकार उनके बयान बाज़ी को सहन कर गई. लेकिन लगता है अब बर्दास्त करने के मूड में नहीं है.थरूर का 'जिन्दा जिन्न' ने प्रधान मंत्री का पीछा ओबामा से मुलाक़ात करते समय भी नहीं छोड़ा. आंखिर पीएम को बयान जरी करना पड़ा अमेरिका से कि वापस देश में आकर जो भी उचित होगा.इस बात पर कार्यवाही की जाएगी.... और उसी का नतीजा है आज पीएम और सोनिया गाँधी की बैठक तो है ही साथ में कैबिनेट की कोर कमिटी की बैठक भी हो सकती है. ..और हो सकता है यह मुद्दा भी वहां पर जिन्न की तरह पीछा न छोड़े? ऐसे में कहीं थरूर इस्तीफा न पटक मारे?


लेकिन ललित मोदी का चहचहाना थरूर और सुनंदा पुष्कर के सपनों को डंक मार गया ! बिपक्ष खास कर बीजेपी ४४ डिग्री तापमान में जली- भुनी पड़ी है,और पसीने-पसीने हो कर सरकार पर हमले पर हमले किये जा रही है....साथ में अन्य दल भी कभी-कभी पत्थर सरकार पर मार देते हैं. ....वो भी सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरा करने के लिए ! खैर सब कुछ हुआ अब देखना यह है कि ललित मोदी, सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर का आगे क्या होगा? क्या थरूर को कुर्सी छोडनी पड़ेगी? क्या ललित मोदी कि टेंसन कम हो पायेगी?क्या सुनंदा पुष्कर मीडिया से पीछे छुड़ा पाएगी ?सवाल कई हैं लेकिन जवाब जरुरी है, जब आग लग ही गई है तो पता लगना चाहिए कि किसने, कहाँ और क्योँ लगाईं?

संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव से लेकर भारत में चुनाव और विदेश राज्यमंत्री का पद लेने तक उनके लिए सब कुछ बढ़िया रहा, उनके कई विवादस्पद बयान सरकार झेल गयी। बेशक वे पढ़े लिखे हैं आकर्षक हैं....लेकिन सुनंदा पुष्कर नाम की महिला का नाम जुड़ना और वो भी आईपीएल जैसे क्रिकेट को आधार बनाकर जुड़ना...भूचाल तो सरकार और मीडिया में आना स्वाभाविक है. कहावत है जर, जोरू और ज़मीन..झगडे कीजड़ रहे हैं, यहाँ पर क्रिकेट और जोड़ लो....लेकिन मेरा मानना है पब्लिक फिगर बनने के बाद थोडा पर्दा रहे तो अच्छी बात है. ऐसे में कुर्सी भी नहीं छिनेगी, पैसा भी कम लिया जायेगा और यारी दोस्ती भी सलामत रहेगी.

मगर नाम जिस तरीके से जुड़ा उस पर जरुर सवालिया निशाँ खड़े होते हैं. ...आप शादी एक दो नहीं कई करें कोई नहीं पूछेगा...किसी कोई हक़ भी नहीं है किसी की निजी जिंदगी में झाँकने का .....और होना भी नहीं चाहिए. लेकिन यहाँ पर कई तरह के 'लिंक' उग आये हैं....जैसे जम्मू & कश्मीर में रेसेप्स्निस्ट की नौकरी फिर दुबई में रही वहीं बिज़नेस किया,स्पा की मालकिन, दुबई लिंक...फिर मंत्री के साथ लिंक....और फिर सवालिए निशाँ उठे आईपीएल में एंट्री..वो भी फ्री इक्विटी /हिस्सा के मार्फ़त. ...और अगर सलाहकार भी थी तो किस बात की?और देश का दुर्भाग्य ही है वे लोग खेल के मालिक हो गए जो कभी क्रिकेट खेलते तक नहीं ...खुल्लम खुल्ला पैसा कमाओ....भाड़ में जाये खेल, देश और दुनिया... जिसने कभी क्रिकेट के मामले में कोई योगदान नहीं दिया हो....उसको सलाहकार बना दिया......खैर अंत में नौबत यहाँ तक आ गई की प्रधान मंत्री को सोनिया गाँधी से मिलना पद रहा है और सायद आज फैसला आ भी जाए? लेकिन दूसरी तरह ये भी है अगर सरकार अभी उन्हें त्यागपत्र के लिए कहती है तो विपक्ष सोचेगा कि ये उसकी जीत है. सरकार झुक गई....ऐसे में कुछ समय और मिल भी सकता है ...लेकिन खबर एक दम से आई कि सुनंदा पुष्कर ने अपनी हिस्सेदारी से हाथ कींच लिए हैं या उनके अनुसार छोड़ दी है......लेकिन ये तो आने वाला वक्त बतायेगा. ...ठीक मीटिंग से पहले ऐसा करना दिमाग का खेल लग रहा है. ..

ललित मोदी,सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर अब कुछ दिन और चलेगा मीडिया में .....मगर एक बात तय है अगर आईपीएल खेल में किसी का पैंसा लगा है या गलत लोगों का और कहाँ से लगा है? कौन हैं वो? कौन इस खेल को खिला रहे हैं? कौन लोग इसके पीछे हैं......यह जनता को जानने का हक़ भी है........बाकी मिस्टर थरूर बेस्ट ऑफ़ लक !

मैं, मेरी मछली और चोर बाज़ार.......



चोर बाज़ार ! जी हाँ चोर बाज़ार.......दिल्ली का प्रशिद्ध बाज़ार, जहा कहते थे कि आदमी भी बिक जाता था ! सामान तो दूर कि बात है....ऐसा नाम जिसको सुन कर एक बार इंसान जरुर सोचता है, जाऊं या न जाऊं ?जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए?देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए? वहां से सामान खरीदा जाये या नहीं ? ऐसे कई सवाल हैं जिनको इंसान अपने दिमाग में रख कर जद्दोजहद करता रहता है, लेकिन हर इंसान के जहन में यह ख्याल जरुरी आता है कि चलो एक बार देख लिया जाये.....

में भी जब दिल्ली विश्विद्यालय में पढता था उस समय मुझे भी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ! मेरे घर के सामने से सीधे पुरानी दिल्ली की बस जाया करती थी और बैठ गया उसमे. ...दिन इतवार था. चोर बाज़ार इतवार के दिन ही लगा करता था और अब भी लगता है, लेकिन अब स्वरुप बदल गया है जगह बदल गई है....पहले लाल किला के पीछे लगा करता था मिटटी में जहाँ पर अब हरा भरा पार्क बन गया है और अब लाल किले के सामने डामर रोड के किनारे लगा करता है..लेकिन पहले जैसा भरा और भरपूर नहीं लगता है.

में जब पहली बार गया तो देखा बस लाल किला तो पहुच गई और कंडक्टर चोर बाज़ार लाल किला वाले उतर जाओ चिल्लाने लगा...जैसे उसके सर से बोझ उतर गया है....लेकिन ये क्या ? बाहर देखा तो रोड में ३-4 लड़के बाग़ रहे हैं...फुल स्पीड में ! में दर सा गया फिर देखा डरने वाली बात क्या है मैंने कौन सा गुनाह कर दिया...दिल में दर भी था चोर बाज़ार जा रहा होऊ...कई तरह की कहानी सुन राखी थी...फिर देखा मैंने उन लड़कों के हाथ में लोकल, इम्पोर्टिड जैसे लगने वाले जूते -चप्पल थे. पुलिस वाले या फिर एमसीडी वाले उनको जहाँ तहां बेचने की परमिसन नहीं होगी..इसलिए वे जब भी दौरे पर आते हैं ये लोग सामान और अपने आप को बचाने की जुगत में भाग खड़े होते....थोडा आगे गया तो नीबू पानी और जलजीरा वाला खड़ा था....सब पी रहे थे मुझे भी प्यास लगी थी 2 गिलास गटक गया...रूपया अठन्नी ली, चवन्नी की एक गिलास ! मस्त था पानी...साड़ी घर से लाल किला तक पहुचने में जो थकान लगी और जो पांच रुपये दिए किराए सब वसूल हो गए...थोडा आगे गए तो दो तीन भिखारी दिखे एक बुढिया जिसके हाथ नहीं थे....सोचा ऐसे लोग क्योँ हो जाते हैं, लेकिन सायद वे भिखारी उसी हालात में अपने आप को ढाल लेते हैं और खुस रहते हैं...दूसरा लकड़ी की तख़्त से बना फट्टा और नीचे लोहे की बैरिंग पर बैठा हुआ है और एक औरत उसको धकेल रही है....कम वही भीख ! लेकिन मैंने नहीं दी उन्हें, क्योँ कि मुझे भिखारी नहीं लगे !लेकिन उनके कटोरे को देख कर लगा ठीक थक कम लेते हैं वो लोग! फिर आगे थोडा आगे गया तो एक बोतल में मछली बेच रहा था....बोतल 1 रुपये से लेकर 1000 तक कि थी....मुझे अछी लगी एक बोतल ली मैंने 10 रुपये कि और 4 मछली उसके अन्दर थी...

अन्दर घुसा तो देखा रंगीन टीवी जो 20000 का है और केवल 1500-2000 रुपये के बीच में लोग ले जा रहे थे...क्या था क्या नहीं .लेकिन टीवी दिख रहा था...लेकिन गारंटी कोई नहीं, कोई पर्ची नहीं सिर्फ चला कर दिखा देंगे...और ले जाओ !वाह क्या बात है...कपडे 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक बाकी मन मर्जी है, जितने में मना सको दूकान वाले को . सब जमीन पर बैठे हुए हैं. कालीन हज़ारों रुपये क़ी लेकिन इतने पैसे नहीं थे.......और कोई इरादा भी नहीं था...डम्बल बॉडी बनाने के लिए वाह ! गजब के थे...पौंड के हिसाब से मिल रहे थे..कुल मिलाकर 1-2 घंटे घूम कर देखा तो सब कुछ उपलब्ध था....रेट जितना लड़-झकड़ तय कर सको...एक और चीज़ देखि जो जानकारी के लिए अछा था....सामने ऑटो में पोलिस वाले कुछ चेक कर रहे थे.....पता लगा वो सामान चेक कर रहे हैं...सामान को, और अब ग्राहक फस गया कोई पर्ची नहीं कोई कोई रिकॉर्ड नहीं अब वो क्या जवाब दे.....कुछ सामन चोरी का भी होता था....इसलिए जो ले जा पाया अच्छी बात है जो नहीं ले जा पाया लड़ते रहो....लेकिन अब ऐसा नहीं है....
दूसरा जो सबसे अच्छी चीज़ लगी चिड़िया बिक रही थी...दुःख भी हो रहा था पिंजरे में देख कर.....आज़ाद पंछी आज़ाद न रहा! इन्दगी में पहली बार देखा कि प्रकृति का हवा का खिलौना 'चिड़िया' भी बिकती है...कबूतर....बटेर...गोरैया, तोता और पता नहीं कितनी रंग विरंगी...लोग खरीद रहे थे में देखा जा रहा था...मज़ा आ रहा था....मुझे शौक भी नहीं था ...मगर मेरे हाथ में मछली थी....बोतल के अन्दर...में भी घूम रहा था, मछली को भी चोर बाज़ार घुमा रहा था...कभी एक हाथ से पकड़ता कभी दोनू हाथों से बोतल को ...मछली कभी ऊपर कभी नीचे तैरती रहती..लाल , हरी , पीली मछली थी....ख़ुशी थी कुछ तो खरीदा मैंने...चोर बाज़ार से, पोलिस वाले ने भी नहीं पूछा?सब ठीक-ठाक !अब लगने लगी भूख क्या खाऊं? वहां के हालात देख कर खाने का मन नहीं कर रहा था, लोगों को देखू तो भूख लग रही थी....और फिर मेरे साथ मेरी मछली भी तो थी....वो भी भूखी बेचारी तैर रही थी. बाज़ार से बहार निकल आया तो देखा एक नीम के पेड़ के नीचे एक केले वाला खड़ा है, केले जमीन पर थे लेकिन थे ठीक थक...सोचा यही मंजिल है....6 केले लिए और पेट के अन्दर शहीद कर दिए...लेकिन कहते हैं न भूख बहुत खराब चीज़ होती है...में फिर से अपनी मछली को कुछ नहीं खिला पाया....पेट भर गया मेरा...लेकिन मेरी मछली फिर भी भूखी रही...पूछ भी नहीं पाया किसी से ....खौफ था दिल में...कहीं कोई पुलिस वाला पूछ न ले ?चोर बाज़ार से आ रहा था ना ?4-5 चक्कर लगाने के बाद, किताब बाज़ार देखने के बाद घर जाने का वक्त आया...और में बस के बारे में पुचा कहा मिलेगी पता लगा वहीं पर आती है...एक और गोलचा सिनेमा हाल भी देखा...पहली बार...दिल्ली का प्रशिद्ध सिनेमा हॉल हुआ करता था, और इसे अवार्ड भी मिला सबसे ज्यादा समय तक फिल्म चलाने का, सायद मुगले-ए-आज़म थी !कभी....खैर बस आई बैठा और पांच रुपये दिए यात्रा पत्र लिया कंडक्टर से और घर का रास्ता नापने लगी बस !

थोड़ी दूर पहुंचा तो देखा..एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ मेरे बगल वाली सीट पर बैठा...वो कभी मुझे देखे कभी मेरी मछली को....मैंने पूछा पकड़ोगे..उसने सर हिलाया हाँ में...और मैंने उसके हाथ में बोतल दे दी..उसके चेहरे में खुशी देखकर मुझे भी हर्ष हुआ........उसके पिता ने पूछा बेटे कहा से लाये और कितने की ? मैंने सब कुछ बताया.....फिर मैंने कहा कि ये भूखे हैं और कुछ खिला नहीं पाया बोतल खोलूं तो कही मन ना जाये...और मुझे जानकारी भी नहीं थी क्या खाते हैं....छोटा मासूम बोला इनके लिए दाने आते हैं....हमारे घर में हैं...दाने? जी हाँ उसने कहा हमारे घर में भी मछली हैं...बड़ी बड़ी....एक्वेरियम कि बात कर रहा था वो....मैंने कहा गुड ! अच है...तो तुम जानते हो....?उसके पिता ने कहा बेटा इसके लिए चारा होता है...और बाज़ार में मिलता है....ओह्ह ! मैंने कहा मुझे तो जानकारी नहीं है....और नदी में ऐसी ही रहते हैं यहाँ पर भी ऐसे ही रहती होगी....या फिर रोटी चांवल खाती होगी.वो दे देंगे.....मैंने देखा बच्चे ने हाथ में बड़े प्यार से बोतल पकड़ रखी थी...मैंने कहा छोटे आप रख लो इसे, आप जानते भी हैं पालना और खिलाना ! मुझे जानकारी भी ,कहीं मर जाएँगी ! आपके पास सुरक्षित तो रहेंगी. उसके पिता ने फटक से मना किया, लेकिन मैंने कहा अंकल एक ही बात है , बच्चा तो खुश रहेगा ...मगर वादा कीजिये? आप जिन्दा रखेंगे और सेफ रखेंगे और भूखा नहीं रखेंगे...मेरी मछली को....उन्हूने कहा नहीं रखेंगे.....मेरे घर में दो एक्वेरियम पहले से हैं ,आप चिंता न करें ! थोड़ी देर बाद उनका बस स्टॉप आ आया और वो दोनू उतर गए...मेरी मछली लेकर....!छोटा बच्चा मुझे हाथ से टा-टा करता रहा ...और बस आगे चलती रही.....

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

उत्तराखंड सरकार के तीन वर्ष !

उत्तराखंड सरकार के तीन वर्ष पुरे हुए ! अच्छा लगा!चलो किसी सरकार के आधे से ज्यादा तीन साल पूरे तो हुए?वरना जमाना ऐसा है कौन किसका साथ देता है? पता नहीं कौन नेता किधर लुढ़क जाये....?वैसे भी मिली जुली हुकूमत का जमाना है....पता नहीं कब किसकी लुटिया डूब जाये?पता नहीं चल पाता है....पिछले दिनों मैंने अखबार में बड़े-बड़े फुल पेज के सरकारी रंगीन इश्तिहार देखे, लेकिन अभी शंका हे कि सरकार अगले दो साल में क्या अच्छा कर पायेगी..?

देखा जाये तो अभी तक विकास के नाम पर राज्य को बेचा ही है, राज्य से कुछ न कुछ लिया ही है, दिया कुछ नहीं ...बड़े बड़े उद्योग घराने आये,उद्योगपति आये लेकिन सब फोटो खिंचवा कर और प्रेस कांफेरेंस कर बड़ी-बड़ी बाते कर चले गए....हुआ कुछ नहीं , रोजगार आम आदमी कुछ नहीं मिला...अभी भी लोग दिल्ली या अन्य महानगरों में भाग रहे हैं...जबकि शिक्षित प्रदेश में गिना जाने लगा है...सबसे अच्छे स्कूल उत्तराखंड में है, इनमे शेरवूड,सैंट जोसेफ, विरला विद्या निकेतन , दून, डोन बोस्को और ना जाने कितने...लेकिन राज्य के नहीं बल्कि बाहर के आसामी लोगों के बच्चे इनमे पढ़ते हैं....राज्य का आम आदमी का बच्चा क्योँ नहीं या फिर कुछ तो बच्चे पढ़े....क्या वे नहीं पढ़ा सकते यहाँ पर...लेकिन ऐसा नहीं ऐसा क्योँ ?

कहते हैं जब ब्यापारी आता है तो उसका चेहरा बड़ा मासूम होता है, और बड़ी बड़ी बातें करता है लुभावनी !लेकिन सिर्फ अपने नफे के लिए. लोगों का खून चूस कर वे अपना काम करते हैं...उदाहरण ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर आज तक सब उसी ढर्रे पर चल रहे हैं....कर्मचारी को नौकरी ठेके दार के द्वारा दी जाती है कंपनी के द्वारा नहीं..राज्य में हेवी-वेट नेता भी हुए लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कर पाए...मैदान में रह गए, पहाड़ में नहीं घुस सके न घुसहा सके उधोगपति को..तिवारी जी जैसे लोगों ने कुछ किया लेकिन रसिक पर्वृति और अपने खाषम खास को पुरुस्कृत करना [सरकारी और गैर सरकारी] उनकी खास अदा रही है....और जिंदगी भर उन्हूने हरीश रावत जैसे नेता को कमजोर बनाने में अपना राजनीतिक टार्गेट बनाये रखा, जिस कारन उन्हें अपने अंतिम दिनों थू-थू जैसे नौबत सहनी पड़ी....चाहे वो नैनीताल हो हल्द्वानी हो या फिर आंध्र प्रदेश...., और नौकरशाहों को जिस तरीके से थोपा गया वो राज्य के लोग आज तक पचा तक नहीं पाए...नहीं तो एक समय था जब यही तिवारी जी प्रधान मंत्री पद के दावेदार थे..शुक्र है ऐसा नहीं हुआ वरना इंडियन सार्कोज़ी साबित होते ......दूसरी तरफ खंडूरी जी सेना के अधिकारी रहे हैं, लेकिन उन्हें भी पता नहीं देहरादून आते आते पता नहीं क्या हो गया....की फैसला लेने में देरी क्योँ कर गए....जो सेना में तुरंत फैसले लेता था यहाँ आ कर वह भी चुप हो गए...और कुछ फैसले लिए भी तो वो नौकरशाह या अन्य लोगों को पसंद नहीं आया..कुल मिलाकर पहाड़ और मैदान में अंतर ही नहीं समझ पाए...भगत सिंह कोश्यारी जी के लिए मुश्किल यह रही की संघ को भी देखना हुआ और और संघ और पार्टी के उन लोगों को भी देखना था और जो जनरल खंडूरी को पसंद नहीं करते थे....और आंखिर में लुटिया डूब ही गई.....सदन में पहुंचे तब वे शांत हुए....अब देखना है बर्तमान मुख्यमंत्री डॉक्टर निशंक क्या कर पाते हैं.....फिर चाहे वो हिंदुजा को लाये, टाटा को लायें या फिर अन्य उधोगपति को...या फिर उर्जा प्रदेश,हरित प्रदेश,देव भूमि या अन्य प्रदेश नारा दें.....वहीं दूसरी तरफ संत समाज भी नाराज लग रहा है निशंक से...,मगर एक बात अच्छी हुई वह है, कुम्भ का होना...अब देखना यह है अब आने वाले सालों में क्या कर पाते हैं....क्यूंकि अंतिम सालों को जनता याद रखती है....और चुनाव से पहले क्या हुआ क्या नहीं इसका लेखा जोखा अखबारों में रंगीन इस्तहार से नहीं बल्कि जनता अपनी आँखों के इस्तहार से तय करेगी...अब असली परीक्षा की घडी निशंक की होगी ?

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

आंखिर निकाह कर ही डाला ?

आंखिर शादी हो ही गई, 15 अप्रेल को होनी थी, लेकिन तीन चार दिन पहले १२ अप्रेल को ही निपटा डाली . जल्दी निकाह के कारण कई हैं, रहे भी होंगे, हो भी सकते थे, और थे भी, हैं भी और आगे रहेंगे भी.......कुल मिलाकर बला मोल ले ही ली !मियाँ ने पैसे और खूबसूरती के लालच में अपने को हलाल तो करवा ही डाला. अब आगे टेनिस की बाल की तरह इधर - उधर पटकते नज़र आयेंगे.....बाकी इनकी सलामती की दुआ एक बार हम भी कर ही देंगे....

अब रह गया पार्ट नंबर दो ! यहाँ से आंखिर रुखसत हो ही गई इंडिया की सानिया मिर्ज़ा . अब पाकिस्तान में दावतों का दौर शुरू होगा. सुना है प्रधानमंत्री भी गिफ्ट भेज रहे हैं, सट्टेबाज खिलाड़ी और हिन्दुस्तानी खिलाड़ी को? खैर निकाह हो गया अल्लाह का शुक्र है ! शांति तो हुई, मीडिया भी अपने ठिकाने में आया, नहीं तो उन्ही के ठिकाने पर टिक गया था...जैसे शादी इनकी नहीं मीडिया की हो रही हो...खैर अब थोडा सकूं तो रहेगा...अब भूचाल पकिस्तान में आएगा, जब तक सानिया और शोएब वहां रहेंगे तब तक मीडिया उनका पीछा नहीं छोड़ेगा, बाकी आवाम अपनी हरकत तो करेगी ही....फिलहाल वहां पर तालिबान का बम फूटे या अमेरिका का ड्रोन हमला हो.....यही चलने की उम्मीद है...मगर एक बात सबको माननी पड़ेगी ताक आंखिर मीडिया नहीं होता तो नहीं हो पाता.

लाल जोड़े में दुल्हन हमेसा सुन्दर लग ही जाती है, सानिया के मामले में भी ऐसा ही है.....घूंघट लम्बा था इसलिए सच कहू तो पहचान में ही नहीं आ रही थी....चेहरा घूंघट में छुप के रह गया.....मगर मीडिया में जिस तरह से उठा - पटक वाला खेल हुआ, और जितने जूठ और सच के नारे लगाए गए...ऐसा हुआ ऐसा नहीं हुआ.....सब को देखते हुए लगता है आगे बच्चे होंगे तो भी सायद मीडिया का रोल बहुत महत्वपूर्ण होगा.................?बस ये देखने की बात है कि कौन कितना झूठ बोलता है हमारा मतलब है..........?

बस देखते रहिये आगे-आगे होता है क्या?

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

पैसे की शादी....

मामला देखा जाये तो सब पैसे का लगता है? दिल के बजाय इस स्टोरी में दिमाग की खपत ज्यादा हुई है...ऐसा लगता है! खैर अचानक शादी हो रही है करके, खबर आई लेकिन वो भी फुस्स ! जरुरी कागजात न होने से वो भी नहीं हो सकी....कुल मिलाकर 'फर्स्ट अटेम्प्ट फ़ैल' !और जो तलाक दिया था उसमे भी पिता का नाम कुछ और लिख डाला...लो कर लो जो करना है..आंखिर हीरो जो है....मनमानी तो चलेगी हीरो की न?अच्छी बात है किसी की शादी होना....लेकिन जिस फजीहत और कश-म-कश के दरम्यान ऐसा हुआ वो भी एक कहानी है और सब जानते हैं क्या हुआ क्या नहीं ....लेकिन इस सब में एक बात तो तय है वो है सानिया जितनी बड़ी स्टार रही है इस देश की और टेनिस की उस सोच में जरुर कमी आई है और देश में उनकी टीआरपी कम हुई है..जितने चाहने वाले थे उतने ही इस मसले से खफा होने वाले भी हो गए हैं.....दूसरा पहलु सबसे सुखद जो रहा वो था उस लड़की आयशा सिदिकी का जो पहली पत्नी थी....जैसा वो दावा कर रही थी ...उसे उसका हक़ मिल गया...और जो बाद में कबूल भी किया शादी का और मजबूरन तलाक भी देना पड़ा...इससे एक बात तो देखने को मिली लोग कैसे कैसे साफ़ जूठ बोल जाते हैं....चाहे उनका जीजा क्योँ ना हो जो लम्बी लम्बी प्रेस कांफेरेंस कर सब जूठा होने का दावा थोक रहा था.....वो भी चुप है....दुबक के रह गया......अब क्या हुआ मियां जी....?खैर जो हुआ अच्छा हुआ...शादी कितनी चल पायेगी वक्त बतायेगा...हमारी ओर से शुभ कामना दोनों को!.....लेकिन मीडिया कितना खूंखार बना रहता है, ये वक्त वक्त बतायेगा....फिलहाल पाकिस्तान हो या फिर इंडिया दोनू ही देश का मीडिया बौखलाए बैठा है इन दोनू से ....और अभी तो उस 'एक्स मिर्ज़ा साहब ' की जबान खुलनी बांकी है.....जो कभी मिस मिर्ज़ा के करीबी हुआ करते थे.......?

स्टोरी अच्छी है हीरो की दूसरी शादी हो रही है, हेरोइन भी पहली सगाई तोडकर प्रेमी के साथ निकाह करने जा रही है,विलेन भी है....लेकिन इसमें विलेन कोई पुरुष नहीं बल्कि एक महिला है...जो शहर की रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखती है और एक अच्छे अंतररास्ट्रीय पाठशाला में शिक्षिका थी....जो हीरो की पहली पत्नी भी थी, और उसने हीरो से रोप पीट कर मीडिया को सहारा बनाकर तलाक ले डाला वो भी तब जब उसे उसका पति नहीं मिला, जो सीमा पार रहता था और गोरों के खेल बाल-बैट [क्रिकेट]का सट्टेबाज खिलाड़ी भी है..उसके अलावा चोट खाए हुए और भी कई किरदार हैं! एक साहब तो विदेश पढ़ाई करने चल दिए....एक हीरो का ही अपना जीजा बताया जा रहा है....जो पता नहीं क्या क्या बोलता फिर रहा है...और बोलते-बोलते इंडिया पहुच गया...उसके अलावा सीमा पार भी महिलायें भी हैं जो हीरो के करीबी मानी जाती थी...वो भी छाती पीट रही है...बाकी पता नहीं कितने पढ़ाई छोड़ चले गए हैं...कुछ दुआ में मस्त हैं तो कुछ दारू के साथ ब्यस्त हैं...कुल मिलाकर कहानी अच्छी है....अब देखना यह है की हीरो और हेरोइन की शादी कब तक हो पाती है और फिर हीरो हेरोइन को अपने वतन ले जाता है या फिर किसी दुसरे मुल्क में...जहाँ वो खेल के शहंशाह बन कर खूब 'रियाल' कमा सकें....

अब देखते रहिये आगे-आगे होता है क्या ?

मंगलवार, 30 मार्च 2010

शादी सानिया की.....

टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ शादी की तैयारी जोर-शोर से शुरू हो गई है। मंगलवार को सानिया ने मां के साथ दिल्ली पहुंचकर पूरे परिवार के लिए पाकिस्तान का वीजा हासिल किया। रात में अपने शहर लौटने के बाद सानिया ने कहा कि हैदराबाद में शादी होगी और उसके बाद लाहौर में भी रिसेप्शन होगा।

सानिया से जब लाहौर में दावत की तारीख के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। वैसे, बताया जा रहा है कि निकाह 11 अप्रैल को हैदराबाद में होगा। लाहौर में 16 या 17 अप्रैल को दावत दी जाएगी।

शादी के बाद भविष्य की योजनाओं के बारे में सानिया ने कहा कि मैं और शोएब, दुबई में रहेंगे। सानिया के मुताबिक, शोएब के पास दुबई में घर और वहां की नागरिकता पहले से ही है। शोएब के बारे में पूछे गए सवाल पर टेनिस खिलाड़ी ने कहा कि मैं उन्हें सात सालों से जानती हूं।


जब उनसे पूछा गया कि शादी के बाद भारत-पाक मैच के दौरान किसका समर्थन करेंगी, तो उन्होंने कहा कि भारत के साथ-साथ अपने पति को चीयर करूंगी। उन्होंने कहा कि वह अपनी भारतीय नागरिकता नहीं छोड़ेंगी और 2012 ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी।

इससे पहले दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग से वीजा हासिल करने के बाद सानिया की मां नसीमा मिर्जा ने कहा, 'हम खुश हैं। हमें वीजा मिल गया है... तो हम पाकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे।' सानिया ने खुद शादी के बारे में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, 'मैं किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगी।' नसीमा ने कहा कि उनका परिवार सानिया के फैसले से खुश है। उन्होंने कहा, 'हम उसके साथ हैं और उसके सुखी भविष्य की कामना करते हैं।' सानिया की मां ने टेनिस स्टार की बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा के साथ सगाई के बारे में बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले में जो कुछ हुआ मैं उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहती। हम अब आगे के बारे में सोच रहे हैं।

अब देखते रहिये क्या-क्या तमाशा होता है....इस शादी में ?
[साभार नवभारत टाइम्स]

रविवार, 21 मार्च 2010

किन्नर भी बनेंगे पेंसनर !

GOOD NEWS FOR THE EUNUCHS.नाच-गाकर गुजर-बसर करने वाले राजधानी के किन्नरों को अब पेंशन मिलेगी। MCD ने फैसला लिया है कि राजधानी में रहने वाले लगभग साढ़े तीन लाख किन्नर हर महीने एक हजार रुपये पेंशन पाने के हकदार हैं। एमसीडी की इस योजना से आर्थिक तंगी से गुजर रहे विशेषकर बुजुर्ग किन्नरों को सहारा मिलेगा।

सालों से कोशिश की जा रही थी कि दिल्ली के किन्नरों से कोई काम लिया जाए ताकि वे अपने पारंपरिक नाच-गाने के काम से छुटकारा पा सकें। एमसीडी ने विचार भी किया था कि किन्नरों को प्रॉपर्टी टैक्स की उगाही के काम में लगाया जाए, लेकिन बात जम नहीं पाई। अब एमसीडी ने उन्हें पेंशन देने का निर्णय लिया है। इसे लेकर निगम की पिछली बैठक में एमसीडी की महिला कल्याण एवं बाल विकास समिति ने प्रस्ताव पेश किया था, जिसे मंजूर कर लिया गया है।
[साभार-नवभारत टाइम्स]

रविवार, 7 मार्च 2010

मासूम की क्या गलती थी...?

उल्फत में अवाम हुआ तो क्या हुआ,
अपने वतन को संभालना तो सब को आता है,
मगर अपने ही गैर हुए तो इसमें कौन क्या करे ....
क्योँ नहीं जवाब देती हुकूमत? क्योँ नहीं करती कोई मुख्त्लिब शियाशी कोशिश....क्या बिगाड़ा था उस मासूम ने ? जिसन अभी दीन और दुनिया का मतलब भी ना पता हो....जिसे अपने पराये का अहसास न हो...फिर भी ऐसा सब कुछ हुआ जिसे देख कर सुन कर कम से कम इंसानियत को एक बार तो शर्म शार होना ही पड़ेगा....जिसके मां बाप साथ समुन्दर पार कमाने-खाने निकले थे, और जो अपनी जिंदगी के कुछ हसीं पलों को अपने बचे हुए जिंदगी के साथ बिताने की जद्दोजहद दिन रात कर रहे थे...उनका नूर अब इस जिंदगी में नहीं रहा....!

खबर मीडिया /अखबारों से सबको मिली, देखी पढ़ी सबने....लेकिन हुकूमत की पर्तिक्रिया शून्य....हमारी हुकूमत ने तो न उनके राजदूत को बुलाया ना अपने आप कोई बात की...शर्म की बात है बयान बाज़ी सिर्फ मीडिया द्वारा ही होने लगी और कुछ नहीं.....ऐसा सब कुछ होना विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपने आप में बहुत कुछ कहता है और दर्शाता भी है......सामाजिक ताना बाना को देखें तो दोनू मुल्कों की अपनी अलग शियासत, संस्कृति,और रहन सहन है. मगर एक सभ्य समाज में क्या ऐसा होना अच्छी बात है? लोगों का रहना-सहना, मिलना जुलना बेशक अलग हो लेकिन स्वरुप तो वही होगा....वो तो नहीं बदल सकता....सोच तो कहीं ना कहीं मानवता पर टिकती है...? फिर ऐसा क्योँ ? क्योँ इंसान कभी कभी इतना दरिंदा हो जाता है....क्या बिगाड़ा ठोस मासूम ने...?जिसने अभी पूरी तरह से दुनिया भी नहीं देखि थी...यह बात ना केवल उस देश के लिए बल्कि हमारे देश में भी ऐसे ही ना जाने कितने हादसे होते हैं....और रोज रोज ऐसे घटना होना शर्मनाक है...वाकई शर्मनाक! मासूम गुर्शन सिंह चन्ना के कतल के मामले में एक भारतीय आदमी पकड़ा गया है जो अपने माता पिता के साथ छुटियाँ मनाने गया था....ऑस्ट्रेलिया और पंजाब का रहने वाला था. इसकी जितनी भत्सर्ना की जाए कम है और जिसने किया है उसको तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिसे दुनिया देखे.

Дели: правительство Индии вводит запрет на 59 китайских приложений, включая работу Tiktok в Индии, в том числе UC Brozer

-Collab на Facebook может заменить Tik Tok, может скоро запустить Collab в Индии -Решение заставило китайские технологические компании сд...