बुधवार, 28 अप्रैल 2010

गवायिंत का अंदाज

दिन रविवार और जगह बाहिरी दिल्ली का एक सुन्दर गाँव ! रविवार के दिन मेरा वीकली ऑफ था, सुबह में घर से निकला सीधे हमारे बरिष्ठ साथी और पत्रकार भारद्वाज जी के ऑफिस में गया.....कुछ देर बैठने के बाद वो आये और हम दोनूं एक पास ही एक गाँव की ओर चल दिए....मैंने भी सोचा चलो देख आते हैं क्या नज़ारा है वहां का? काफी समय हो गया है उस इलाके में गए हुए.... भारद्वाज जी ने बताया मुझे की किसी का कारज है....उसमे जाना है.....कारज किसी की मौत के बाद उसकी याद में कार्यक्रम किया जाता है...और गाँव और रिश्तेदारों को भोजन किया जाता है....पंडित तो होंगे ही.....खैर....पहुचे वहां तो अजीब-अजीब बातें हुई जिन्हें मैने सोचा कि आपके साथ शेयर करूँ....

गावं में पहुचे तो देख कर सामने दांग रह गए....'व्हाईट हाउस'...तक़रीबन एक हज़ार गज जमीन में बना हुआ तीन मंजिला व्हाईट हाउस...क्या डिजाइन था....उसकी एक बालकोनी कुछ महिलाएं कड़ी थी और गुफ्तुअगु में मशगूल थी....हमने गाडी बहार सड़क किनारे कड़ी की और गेट के अन्दर घुसे तो देखा सामने बड़ा टेंट लगा हुआ है और कुछ लोग नीचे बैठकर खाना खा रहे हैं, दाई और प्लाट के कुछ बुजुर्ग लोग मुढे में बैठे हैं और हाथ में शरबत के गिलास के साथ गर्मी को दूर कर रहे हैं. भरद्वाज जी सीठे वही गए,एक दो गाँव वालों को राम राम कह कर...ये क्या ? जब हमने देखा वहां बैठे बुजुर्ग शरबत नहीं बल्कि अंग्रेजी शरबत पी रहे थे. मुढे के साथ में अंग्रेजी शराब की बोतल रखी हुई थी और हाथ में प्लास्टिक के ग्लास में शरबत....जिससे किसी को बोतल भी नहीं दिखे और लोग समझेंगे कि शराब नहीं बल्कि शर्बात पी रहे हैं...हमारे जानकार एक अंकल भी उनमे से...हमें देख कर तुरंत खड़े हो गए और स्वागत किया....कहते हैं ना कि गाँव के बुजुर्ग बढे सयाने [समजदार] होते हैं वही हुआ....सभी ने शरबत कि ग्लास नीचे रख दी...एक ग्लास मुझे भी दे..मैंने भी शरबत समझ कर पी लिया, शुक्र है शराब मिक्स नहीं थी उसमे....खैर आगे गए भरद्वाज जी बोले चलो भोजन कर लिया जाये...भारद्वाज जी बोले कहाँ बैठें मैंने कहा कि नीचे बैठते हैं और खा लेते हैं, लेकिन अंकल ने कहा कुर्सी आ रही है उसमे बैठ के खायेंगे...उन्हूने आवाज दी अरे सुनिओ भाई कुर्सी लाना...दो कुर्सी आ गई, दोनू में भरद्वाज जी और में बैठ गए....एक और मंगाई गई खाना रखने के लिए जो डाइनिंग टेबल का काम कर सके....फिर एक और मंगाई जो अंकल को बैठा सके....कुल मिला कर कुसियाँ लाने और बैठने का दौर चलते रहा और हमें आंखिर कार कुर्सी मिल भी गई.

अंकल ने आवाज दी पूरी लाइओ भाई ! गरम गरम लाना ! एक आदमी भागा आया और एक टोकरी में पूरी ले आया...बोला 'ताऊ' ताती हैं, गरम नहीं हैं.......उफ्फ्फ ताती और गरम तो एक ही होते हैं...लेकिन वो आदमी सच्चा था डबल न समझ कर सिंगल दिमाग लगाने वाला...इसलिए उसने जो था वो बोल दिया...शहरी सब्द गरम को नहीं अपना पाया और न ही बोला....खैर ! अच्छा लगा ये सुन कर...अभी लोग दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग कितने सीमित विचार धारा के हैं. उनके लिए सरकार के विकास और तरकी के मायने ज्यादा नहीं हैं. ...एक प्लेट में उसने 7-8 पूरी रख दी, ताती ताती ...और फिर सीता फल कि सब्जी पूरी प्लेट भरकर...और बोरिंग आलू कि भी...इससे पहले 4 लड्डू रखे एक हट्टे कट्टे युवक ने, कहा ताऊ लाड्डो खा ले....लाड्डो भी बड़े बड़े थे..मैंने भी 2 खा दिए....देखि जाएगी.....[हरियाणा में कारज में खाने से पहले मीठा दिया जाता है और लाड्डो का प्रचलन खूब है] ..1 भरद्वाज जी ने और अंकल ने नहीं खाए...वो विदेशी सरबत में ब्यस्त में थे.....मीठा और रंगीला कर देता उनको...समझदार थे...मुझे बताया गया कि सीताफल कि सब्जी स्वादिस्ट है..खासकर तौर पर बनाने वाले को बुलाया गया है...चखी तो सच में स्वादिस्ट थी...खाना खाया हमने सब सब्जी और पूरी सहीद कर डाली पेट के अन्दर...तीनों ने..! अब पानी कहाँ मिलेगा..देखा तो आस पास कुछ नहीं ...बहार गए गेट के तो देहा सामने 3-4 ड्रम रखे हुए हैं प्लास्टिक के...और कुछ बच्चे पानी निकालने में लगे हुए हैं...वो भी प्लास्टिक कि बोतल काट कर बनाए गए बर्तन से....वाह क्या आईडिया था....

बारी थी अब उनसे मिल लिया जाए..जिन्हूने ये 'कारज' पार्टी रखी है....जी हाँ उन्हूने मुझे भी पहचान लिया...राम राम हुई दोनू तरफ से....पता लगा इन जनाब ने अपने पिता जी का जिन्दा जी कारज कर डाला....लो कर लो क्या करोगे अब ! जी हाँ जिन्दा जी...श्राद सुना है लकिन कारज .....ऊपर से मूर्ति और बनवा दी उसे प्लाट के एक कोने में....वाह...पता लगा कि 14000 पत्तल जो समां चुके हैं लोगों के पेट में बाकी और आयें, ये कोई गारंटी नहीं है.....सुनने में आई कि कोई जमीन में हाथ मार लिया....कुल मिलाकर पौ बारह ! जनाब करते क्या हैं ? लोगों को यात्रा पत्र देते हैं....बोले तो डीटीसी में कंडक्टर हैं....जी हाँ......गजब के इंसान ! पेशे से कंडक्टर.....और पार्ट टाइम प्रोपर्टी डीलर वो भी सरकारी/गैर सरकारी जमीन के....जो कहीं न बेच पाए वो ये बेच खायेंगे...और कोठी सफ़ेद रंग कि, इटालियन मार्बल से जड़ी हुई ....गाँव का ताज महल कहें तो बुरा नहीं... जो लोग देखते रह जाए.....कुल मिलाकर गवायंत कि बात ही कुछ और है...लोग गाँव में रह कर भी धन दौलत के साथ तरक्की करने में लगे हुए हैं....कुल मिलाकर गाँव का दौरा अच्छा रहा और काफी कुछ सीखने को मिला..अच्छा लगा सब कुछ देख कर.. ...

रविवार, 25 अप्रैल 2010

वी मिस ह़र........

किसी ने सच कहा है जिंदगी का पता नहीं? कब कहाँ शाम हो जाये? और किस घडी में? किस हालात में?लेकिन जिसे पता है जिंदगी का, उसे इंसान नहीं महात्मा [महान+आत्मा] कहा जाता है...और जो इस सच को गले लगा गया वो उसका अपना फैसला होता है !दुःख इस बात का और बढ़ जाता है, जब कोई अपना अजीज इस सच हो गले लगा लेता है ......और उस परिवार के लिए यह बहुत बड़ी त्रासदी होती है !

दिन शुक्रवार, समय सुबह 10 बजे के आस-पास, हर दिन की तरह घर पर सो रहा था, रात को देर से घर पहुचने के कारण सुबह उठने में देरी हो ही जाती है... मीडिया/प्रेस वालों की जिंदगी ख़बरों तक ही सीमित रह जाती है थोडा बहुत जो समय मिलता है उसमे आराम भी जरुरी है ..ये मेरी कमजोरी है कि मुझे आठ घंटे की नींद पूरी चाहिए. ...तक़रीबन दस बजे सुबह मेरे चचेरे भाई का फोन आया...भाई कहाँ हो? मैंने कहा हाँ बोल घर पर! ऑफिस जाऊँगा थोड़ी देर में, उठा नहीं था में,सोये हुए उसके फ़ोन का जवाब दे रहा था....भरे गले से आधी नींद में आँखें खुली भी नहीं थी मेरी, ....वो बोला भाई [] ने सुसाइड कर लिया है ! मेरी समझ में कुछ नहीं आया पहले, एक मिनट के लिए कुछ समझ नहीं आया क्या बोलूं न दिमाग करना काम किया...उसने फिर पूछा भाई क्या करूँ? फिर थोड़ी आँखें खुली और समझा आया तो देर हो चुकी थी.....वो बोल चूका था और में समझ चुका था......मैंने कहा की पुलिस को कॉल कर, बांकी बात में कर लूँगा, कोइस समस्या नहीं होगी...अमूमन पुलिस वाले परेशान करते हैं..शव को पीएम के लिए भेजना, फिर तरह तरह से सवाल जवाब....लेकिन कुछ संदिग्ध नहीं था इसलिए जल्द ही उन्हूने किलियर का दिया...पुलिस वाले भी अच्छे इंसान थे...सभ्य और सुशील !कुछ मीडिया का दवाब मान कर जल्द ही उन्हूने शव को परिवार के हवाले कर दिया.... शव घर के अन्दर चैन की नींद में सो रहा था ! वो कोई और नहीं बल्कि मेरी चचेरी बहन का था....सब उसे प्यार करते थे, सुन्दर थी, बहादुर थी,बुद्धिमता में किसी से कम नहीं थी और जिंदगी में कुछ कर सकने कि जद्धोजहद में जिंदगी से जूझ रही थी.....घर में बचपन से चंचल स्वभाव की थी....सबकी प्यारी लाडली बच्ची थी....भाई विदेश में है और कुछ दिन पहले ही उसके लिए उसने कुछ रुपये भिजवाये थे, ताकि उसकी आगे कि पढ़ाई और अच्छी तरह और पूरी हो और उसकी बहन अच्छी तरह से पढ़ सके. बड़ी बहन के लिए भी पैसे भिजवाये थे . पिता जी कोमल ह्रदय के और साफ़ इंसान हैं, सामाजिक रूप से लोगों कि भलाई करने वाले और हमेसा सच बोलने वाले .मेहनत में यकीन रखने वाले और अच्छे पद पर बिराजमान हैं ,लेकिन इस हादसे ने उन्हें काफी दुःख पंहुचा है, सायद उसकी कल्पना कर पाना संभव नहीं है...... मां एक अच्छे परिवार से तालुक रखने वाली गृहणी हैं, और हमेसा प्यार से बोलने वाली और सोफ्ट स्वभाव वाली महिला रही हैं जो अपने परिवार को हर संभव, हर चीज़ देने की कोशिश में रहती हैं, और दिया भी है आज तक उन्हूने.,,, छोटा भाई जितनी प्यारी वो थी उतना ही प्यारा है. बड़ी बहन भी एक बड़ी दीदी कि तरह हमेसा ना डाटने वाली और न झगडा करने वाली और चोटों कि मांग पूरी करने वाली है, और बहुत प्यारी बच्ची है.....उसकी अन्खून में आज आँसों थे.....अपनी प्यारी बहन जो खो चुकी है....पिता परेशान थे क्या गलत हुआ उनसे जो उनकी बच्ची ने ऐसा किया....मां बिलख बिलख रो पड़ रही थी....और अपने आप को नहीं संभाला जा रहा था उससे......कलेजे का टुकड़ा जो चला गया....में भी तुरंत पहुंचा....पंहुचा तो देखा ये सब मंजर !कुछ शब्द नहीं थे मेरे पास ! छोटी सी थी,जब वह हमारे घर आई थी और कुछ दिन रही थी.....उसकी चुलबुलाहट,और उलझी-सीधी बातें आज तक याद है......प्यारी बहन की तरह कोई बात होती तो पूछ लेती थी मुझे ..कहती ! भाई ये क्या है? कैसे होता है?.....तरह तरह...लेकिन कभी-कभी जिरह, तर्क-वितर्क भी कर बैठती थी......आज वो हामारी बीच नहीं है......उसका अंतिम बार देखा मासूम चेहरा जिस पर न कोई सिकन थी न ही कोई दर्द.....

मगर एक प्रश्न हमेसा दिल में खौलता रहा की ऐसा क्योँ किया उसने ?...सब कुछ होते भी ऐसा कर डाला....क्योँ ? इतना अच्छा घर, लोग,हालात सब कुछ तो ठीक था.....किसी के पास कोई जवाब नहीं ?कुछ न होते हुए भी सब कुछ कर दिया एक मिनट में......मेरी और से प्यारी श्रधान्जली और दुआ है कि उसकी आत्मा को असीम शान्ति मिले......उस बच्चे को में हमेसा मिस करूँगा............

रविवार, 18 अप्रैल 2010

शशि थरूर, सुनंदा और आईपीएल !


विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर जितने प्रसिद्ध कुछ समय पहले अंतररास्ट्रीय स्तर पर थे....आज उतनी ही बात उनके बारे में विवाद के तौर पर उभर कर सामने आई है.....कभी उल्टे -सीधे बयान दे कर मनमोहन सिंह की सरकार के नाक में दम करने वाले थरूर आज फिर से मुशीबत में हैं. लेकिन समय और विषय बदल गया है. सरकार उनके बयान बाज़ी को सहन कर गई. लेकिन लगता है अब बर्दास्त करने के मूड में नहीं है.थरूर का 'जिन्दा जिन्न' ने प्रधान मंत्री का पीछा ओबामा से मुलाक़ात करते समय भी नहीं छोड़ा. आंखिर पीएम को बयान जरी करना पड़ा अमेरिका से कि वापस देश में आकर जो भी उचित होगा.इस बात पर कार्यवाही की जाएगी.... और उसी का नतीजा है आज पीएम और सोनिया गाँधी की बैठक तो है ही साथ में कैबिनेट की कोर कमिटी की बैठक भी हो सकती है. ..और हो सकता है यह मुद्दा भी वहां पर जिन्न की तरह पीछा न छोड़े? ऐसे में कहीं थरूर इस्तीफा न पटक मारे?


लेकिन ललित मोदी का चहचहाना थरूर और सुनंदा पुष्कर के सपनों को डंक मार गया ! बिपक्ष खास कर बीजेपी ४४ डिग्री तापमान में जली- भुनी पड़ी है,और पसीने-पसीने हो कर सरकार पर हमले पर हमले किये जा रही है....साथ में अन्य दल भी कभी-कभी पत्थर सरकार पर मार देते हैं. ....वो भी सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरा करने के लिए ! खैर सब कुछ हुआ अब देखना यह है कि ललित मोदी, सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर का आगे क्या होगा? क्या थरूर को कुर्सी छोडनी पड़ेगी? क्या ललित मोदी कि टेंसन कम हो पायेगी?क्या सुनंदा पुष्कर मीडिया से पीछे छुड़ा पाएगी ?सवाल कई हैं लेकिन जवाब जरुरी है, जब आग लग ही गई है तो पता लगना चाहिए कि किसने, कहाँ और क्योँ लगाईं?

संयुक्त राष्ट्र महासचिव का चुनाव से लेकर भारत में चुनाव और विदेश राज्यमंत्री का पद लेने तक उनके लिए सब कुछ बढ़िया रहा, उनके कई विवादस्पद बयान सरकार झेल गयी। बेशक वे पढ़े लिखे हैं आकर्षक हैं....लेकिन सुनंदा पुष्कर नाम की महिला का नाम जुड़ना और वो भी आईपीएल जैसे क्रिकेट को आधार बनाकर जुड़ना...भूचाल तो सरकार और मीडिया में आना स्वाभाविक है. कहावत है जर, जोरू और ज़मीन..झगडे कीजड़ रहे हैं, यहाँ पर क्रिकेट और जोड़ लो....लेकिन मेरा मानना है पब्लिक फिगर बनने के बाद थोडा पर्दा रहे तो अच्छी बात है. ऐसे में कुर्सी भी नहीं छिनेगी, पैसा भी कम लिया जायेगा और यारी दोस्ती भी सलामत रहेगी.

मगर नाम जिस तरीके से जुड़ा उस पर जरुर सवालिया निशाँ खड़े होते हैं. ...आप शादी एक दो नहीं कई करें कोई नहीं पूछेगा...किसी कोई हक़ भी नहीं है किसी की निजी जिंदगी में झाँकने का .....और होना भी नहीं चाहिए. लेकिन यहाँ पर कई तरह के 'लिंक' उग आये हैं....जैसे जम्मू & कश्मीर में रेसेप्स्निस्ट की नौकरी फिर दुबई में रही वहीं बिज़नेस किया,स्पा की मालकिन, दुबई लिंक...फिर मंत्री के साथ लिंक....और फिर सवालिए निशाँ उठे आईपीएल में एंट्री..वो भी फ्री इक्विटी /हिस्सा के मार्फ़त. ...और अगर सलाहकार भी थी तो किस बात की?और देश का दुर्भाग्य ही है वे लोग खेल के मालिक हो गए जो कभी क्रिकेट खेलते तक नहीं ...खुल्लम खुल्ला पैसा कमाओ....भाड़ में जाये खेल, देश और दुनिया... जिसने कभी क्रिकेट के मामले में कोई योगदान नहीं दिया हो....उसको सलाहकार बना दिया......खैर अंत में नौबत यहाँ तक आ गई की प्रधान मंत्री को सोनिया गाँधी से मिलना पद रहा है और सायद आज फैसला आ भी जाए? लेकिन दूसरी तरह ये भी है अगर सरकार अभी उन्हें त्यागपत्र के लिए कहती है तो विपक्ष सोचेगा कि ये उसकी जीत है. सरकार झुक गई....ऐसे में कुछ समय और मिल भी सकता है ...लेकिन खबर एक दम से आई कि सुनंदा पुष्कर ने अपनी हिस्सेदारी से हाथ कींच लिए हैं या उनके अनुसार छोड़ दी है......लेकिन ये तो आने वाला वक्त बतायेगा. ...ठीक मीटिंग से पहले ऐसा करना दिमाग का खेल लग रहा है. ..

ललित मोदी,सुनंदा पुष्कर और शशि थरूर अब कुछ दिन और चलेगा मीडिया में .....मगर एक बात तय है अगर आईपीएल खेल में किसी का पैंसा लगा है या गलत लोगों का और कहाँ से लगा है? कौन हैं वो? कौन इस खेल को खिला रहे हैं? कौन लोग इसके पीछे हैं......यह जनता को जानने का हक़ भी है........बाकी मिस्टर थरूर बेस्ट ऑफ़ लक !

मैं, मेरी मछली और चोर बाज़ार.......



चोर बाज़ार ! जी हाँ चोर बाज़ार.......दिल्ली का प्रशिद्ध बाज़ार, जहा कहते थे कि आदमी भी बिक जाता था ! सामान तो दूर कि बात है....ऐसा नाम जिसको सुन कर एक बार इंसान जरुर सोचता है, जाऊं या न जाऊं ?जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए?देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए? वहां से सामान खरीदा जाये या नहीं ? ऐसे कई सवाल हैं जिनको इंसान अपने दिमाग में रख कर जद्दोजहद करता रहता है, लेकिन हर इंसान के जहन में यह ख्याल जरुरी आता है कि चलो एक बार देख लिया जाये.....

में भी जब दिल्ली विश्विद्यालय में पढता था उस समय मुझे भी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ! मेरे घर के सामने से सीधे पुरानी दिल्ली की बस जाया करती थी और बैठ गया उसमे. ...दिन इतवार था. चोर बाज़ार इतवार के दिन ही लगा करता था और अब भी लगता है, लेकिन अब स्वरुप बदल गया है जगह बदल गई है....पहले लाल किला के पीछे लगा करता था मिटटी में जहाँ पर अब हरा भरा पार्क बन गया है और अब लाल किले के सामने डामर रोड के किनारे लगा करता है..लेकिन पहले जैसा भरा और भरपूर नहीं लगता है.

में जब पहली बार गया तो देखा बस लाल किला तो पहुच गई और कंडक्टर चोर बाज़ार लाल किला वाले उतर जाओ चिल्लाने लगा...जैसे उसके सर से बोझ उतर गया है....लेकिन ये क्या ? बाहर देखा तो रोड में ३-4 लड़के बाग़ रहे हैं...फुल स्पीड में ! में दर सा गया फिर देखा डरने वाली बात क्या है मैंने कौन सा गुनाह कर दिया...दिल में दर भी था चोर बाज़ार जा रहा होऊ...कई तरह की कहानी सुन राखी थी...फिर देखा मैंने उन लड़कों के हाथ में लोकल, इम्पोर्टिड जैसे लगने वाले जूते -चप्पल थे. पुलिस वाले या फिर एमसीडी वाले उनको जहाँ तहां बेचने की परमिसन नहीं होगी..इसलिए वे जब भी दौरे पर आते हैं ये लोग सामान और अपने आप को बचाने की जुगत में भाग खड़े होते....थोडा आगे गया तो नीबू पानी और जलजीरा वाला खड़ा था....सब पी रहे थे मुझे भी प्यास लगी थी 2 गिलास गटक गया...रूपया अठन्नी ली, चवन्नी की एक गिलास ! मस्त था पानी...साड़ी घर से लाल किला तक पहुचने में जो थकान लगी और जो पांच रुपये दिए किराए सब वसूल हो गए...थोडा आगे गए तो दो तीन भिखारी दिखे एक बुढिया जिसके हाथ नहीं थे....सोचा ऐसे लोग क्योँ हो जाते हैं, लेकिन सायद वे भिखारी उसी हालात में अपने आप को ढाल लेते हैं और खुस रहते हैं...दूसरा लकड़ी की तख़्त से बना फट्टा और नीचे लोहे की बैरिंग पर बैठा हुआ है और एक औरत उसको धकेल रही है....कम वही भीख ! लेकिन मैंने नहीं दी उन्हें, क्योँ कि मुझे भिखारी नहीं लगे !लेकिन उनके कटोरे को देख कर लगा ठीक थक कम लेते हैं वो लोग! फिर आगे थोडा आगे गया तो एक बोतल में मछली बेच रहा था....बोतल 1 रुपये से लेकर 1000 तक कि थी....मुझे अछी लगी एक बोतल ली मैंने 10 रुपये कि और 4 मछली उसके अन्दर थी...

अन्दर घुसा तो देखा रंगीन टीवी जो 20000 का है और केवल 1500-2000 रुपये के बीच में लोग ले जा रहे थे...क्या था क्या नहीं .लेकिन टीवी दिख रहा था...लेकिन गारंटी कोई नहीं, कोई पर्ची नहीं सिर्फ चला कर दिखा देंगे...और ले जाओ !वाह क्या बात है...कपडे 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक बाकी मन मर्जी है, जितने में मना सको दूकान वाले को . सब जमीन पर बैठे हुए हैं. कालीन हज़ारों रुपये क़ी लेकिन इतने पैसे नहीं थे.......और कोई इरादा भी नहीं था...डम्बल बॉडी बनाने के लिए वाह ! गजब के थे...पौंड के हिसाब से मिल रहे थे..कुल मिलाकर 1-2 घंटे घूम कर देखा तो सब कुछ उपलब्ध था....रेट जितना लड़-झकड़ तय कर सको...एक और चीज़ देखि जो जानकारी के लिए अछा था....सामने ऑटो में पोलिस वाले कुछ चेक कर रहे थे.....पता लगा वो सामान चेक कर रहे हैं...सामान को, और अब ग्राहक फस गया कोई पर्ची नहीं कोई कोई रिकॉर्ड नहीं अब वो क्या जवाब दे.....कुछ सामन चोरी का भी होता था....इसलिए जो ले जा पाया अच्छी बात है जो नहीं ले जा पाया लड़ते रहो....लेकिन अब ऐसा नहीं है....
दूसरा जो सबसे अच्छी चीज़ लगी चिड़िया बिक रही थी...दुःख भी हो रहा था पिंजरे में देख कर.....आज़ाद पंछी आज़ाद न रहा! इन्दगी में पहली बार देखा कि प्रकृति का हवा का खिलौना 'चिड़िया' भी बिकती है...कबूतर....बटेर...गोरैया, तोता और पता नहीं कितनी रंग विरंगी...लोग खरीद रहे थे में देखा जा रहा था...मज़ा आ रहा था....मुझे शौक भी नहीं था ...मगर मेरे हाथ में मछली थी....बोतल के अन्दर...में भी घूम रहा था, मछली को भी चोर बाज़ार घुमा रहा था...कभी एक हाथ से पकड़ता कभी दोनू हाथों से बोतल को ...मछली कभी ऊपर कभी नीचे तैरती रहती..लाल , हरी , पीली मछली थी....ख़ुशी थी कुछ तो खरीदा मैंने...चोर बाज़ार से, पोलिस वाले ने भी नहीं पूछा?सब ठीक-ठाक !अब लगने लगी भूख क्या खाऊं? वहां के हालात देख कर खाने का मन नहीं कर रहा था, लोगों को देखू तो भूख लग रही थी....और फिर मेरे साथ मेरी मछली भी तो थी....वो भी भूखी बेचारी तैर रही थी. बाज़ार से बहार निकल आया तो देखा एक नीम के पेड़ के नीचे एक केले वाला खड़ा है, केले जमीन पर थे लेकिन थे ठीक थक...सोचा यही मंजिल है....6 केले लिए और पेट के अन्दर शहीद कर दिए...लेकिन कहते हैं न भूख बहुत खराब चीज़ होती है...में फिर से अपनी मछली को कुछ नहीं खिला पाया....पेट भर गया मेरा...लेकिन मेरी मछली फिर भी भूखी रही...पूछ भी नहीं पाया किसी से ....खौफ था दिल में...कहीं कोई पुलिस वाला पूछ न ले ?चोर बाज़ार से आ रहा था ना ?4-5 चक्कर लगाने के बाद, किताब बाज़ार देखने के बाद घर जाने का वक्त आया...और में बस के बारे में पुचा कहा मिलेगी पता लगा वहीं पर आती है...एक और गोलचा सिनेमा हाल भी देखा...पहली बार...दिल्ली का प्रशिद्ध सिनेमा हॉल हुआ करता था, और इसे अवार्ड भी मिला सबसे ज्यादा समय तक फिल्म चलाने का, सायद मुगले-ए-आज़म थी !कभी....खैर बस आई बैठा और पांच रुपये दिए यात्रा पत्र लिया कंडक्टर से और घर का रास्ता नापने लगी बस !

थोड़ी दूर पहुंचा तो देखा..एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ मेरे बगल वाली सीट पर बैठा...वो कभी मुझे देखे कभी मेरी मछली को....मैंने पूछा पकड़ोगे..उसने सर हिलाया हाँ में...और मैंने उसके हाथ में बोतल दे दी..उसके चेहरे में खुशी देखकर मुझे भी हर्ष हुआ........उसके पिता ने पूछा बेटे कहा से लाये और कितने की ? मैंने सब कुछ बताया.....फिर मैंने कहा कि ये भूखे हैं और कुछ खिला नहीं पाया बोतल खोलूं तो कही मन ना जाये...और मुझे जानकारी भी नहीं थी क्या खाते हैं....छोटा मासूम बोला इनके लिए दाने आते हैं....हमारे घर में हैं...दाने? जी हाँ उसने कहा हमारे घर में भी मछली हैं...बड़ी बड़ी....एक्वेरियम कि बात कर रहा था वो....मैंने कहा गुड ! अच है...तो तुम जानते हो....?उसके पिता ने कहा बेटा इसके लिए चारा होता है...और बाज़ार में मिलता है....ओह्ह ! मैंने कहा मुझे तो जानकारी नहीं है....और नदी में ऐसी ही रहते हैं यहाँ पर भी ऐसे ही रहती होगी....या फिर रोटी चांवल खाती होगी.वो दे देंगे.....मैंने देखा बच्चे ने हाथ में बड़े प्यार से बोतल पकड़ रखी थी...मैंने कहा छोटे आप रख लो इसे, आप जानते भी हैं पालना और खिलाना ! मुझे जानकारी भी ,कहीं मर जाएँगी ! आपके पास सुरक्षित तो रहेंगी. उसके पिता ने फटक से मना किया, लेकिन मैंने कहा अंकल एक ही बात है , बच्चा तो खुश रहेगा ...मगर वादा कीजिये? आप जिन्दा रखेंगे और सेफ रखेंगे और भूखा नहीं रखेंगे...मेरी मछली को....उन्हूने कहा नहीं रखेंगे.....मेरे घर में दो एक्वेरियम पहले से हैं ,आप चिंता न करें ! थोड़ी देर बाद उनका बस स्टॉप आ आया और वो दोनू उतर गए...मेरी मछली लेकर....!छोटा बच्चा मुझे हाथ से टा-टा करता रहा ...और बस आगे चलती रही.....

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

उत्तराखंड सरकार के तीन वर्ष !

उत्तराखंड सरकार के तीन वर्ष पुरे हुए ! अच्छा लगा!चलो किसी सरकार के आधे से ज्यादा तीन साल पूरे तो हुए?वरना जमाना ऐसा है कौन किसका साथ देता है? पता नहीं कौन नेता किधर लुढ़क जाये....?वैसे भी मिली जुली हुकूमत का जमाना है....पता नहीं कब किसकी लुटिया डूब जाये?पता नहीं चल पाता है....पिछले दिनों मैंने अखबार में बड़े-बड़े फुल पेज के सरकारी रंगीन इश्तिहार देखे, लेकिन अभी शंका हे कि सरकार अगले दो साल में क्या अच्छा कर पायेगी..?

देखा जाये तो अभी तक विकास के नाम पर राज्य को बेचा ही है, राज्य से कुछ न कुछ लिया ही है, दिया कुछ नहीं ...बड़े बड़े उद्योग घराने आये,उद्योगपति आये लेकिन सब फोटो खिंचवा कर और प्रेस कांफेरेंस कर बड़ी-बड़ी बाते कर चले गए....हुआ कुछ नहीं , रोजगार आम आदमी कुछ नहीं मिला...अभी भी लोग दिल्ली या अन्य महानगरों में भाग रहे हैं...जबकि शिक्षित प्रदेश में गिना जाने लगा है...सबसे अच्छे स्कूल उत्तराखंड में है, इनमे शेरवूड,सैंट जोसेफ, विरला विद्या निकेतन , दून, डोन बोस्को और ना जाने कितने...लेकिन राज्य के नहीं बल्कि बाहर के आसामी लोगों के बच्चे इनमे पढ़ते हैं....राज्य का आम आदमी का बच्चा क्योँ नहीं या फिर कुछ तो बच्चे पढ़े....क्या वे नहीं पढ़ा सकते यहाँ पर...लेकिन ऐसा नहीं ऐसा क्योँ ?

कहते हैं जब ब्यापारी आता है तो उसका चेहरा बड़ा मासूम होता है, और बड़ी बड़ी बातें करता है लुभावनी !लेकिन सिर्फ अपने नफे के लिए. लोगों का खून चूस कर वे अपना काम करते हैं...उदाहरण ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर आज तक सब उसी ढर्रे पर चल रहे हैं....कर्मचारी को नौकरी ठेके दार के द्वारा दी जाती है कंपनी के द्वारा नहीं..राज्य में हेवी-वेट नेता भी हुए लेकिन ज्यादा कुछ नहीं कर पाए...मैदान में रह गए, पहाड़ में नहीं घुस सके न घुसहा सके उधोगपति को..तिवारी जी जैसे लोगों ने कुछ किया लेकिन रसिक पर्वृति और अपने खाषम खास को पुरुस्कृत करना [सरकारी और गैर सरकारी] उनकी खास अदा रही है....और जिंदगी भर उन्हूने हरीश रावत जैसे नेता को कमजोर बनाने में अपना राजनीतिक टार्गेट बनाये रखा, जिस कारन उन्हें अपने अंतिम दिनों थू-थू जैसे नौबत सहनी पड़ी....चाहे वो नैनीताल हो हल्द्वानी हो या फिर आंध्र प्रदेश...., और नौकरशाहों को जिस तरीके से थोपा गया वो राज्य के लोग आज तक पचा तक नहीं पाए...नहीं तो एक समय था जब यही तिवारी जी प्रधान मंत्री पद के दावेदार थे..शुक्र है ऐसा नहीं हुआ वरना इंडियन सार्कोज़ी साबित होते ......दूसरी तरफ खंडूरी जी सेना के अधिकारी रहे हैं, लेकिन उन्हें भी पता नहीं देहरादून आते आते पता नहीं क्या हो गया....की फैसला लेने में देरी क्योँ कर गए....जो सेना में तुरंत फैसले लेता था यहाँ आ कर वह भी चुप हो गए...और कुछ फैसले लिए भी तो वो नौकरशाह या अन्य लोगों को पसंद नहीं आया..कुल मिलाकर पहाड़ और मैदान में अंतर ही नहीं समझ पाए...भगत सिंह कोश्यारी जी के लिए मुश्किल यह रही की संघ को भी देखना हुआ और और संघ और पार्टी के उन लोगों को भी देखना था और जो जनरल खंडूरी को पसंद नहीं करते थे....और आंखिर में लुटिया डूब ही गई.....सदन में पहुंचे तब वे शांत हुए....अब देखना है बर्तमान मुख्यमंत्री डॉक्टर निशंक क्या कर पाते हैं.....फिर चाहे वो हिंदुजा को लाये, टाटा को लायें या फिर अन्य उधोगपति को...या फिर उर्जा प्रदेश,हरित प्रदेश,देव भूमि या अन्य प्रदेश नारा दें.....वहीं दूसरी तरफ संत समाज भी नाराज लग रहा है निशंक से...,मगर एक बात अच्छी हुई वह है, कुम्भ का होना...अब देखना यह है अब आने वाले सालों में क्या कर पाते हैं....क्यूंकि अंतिम सालों को जनता याद रखती है....और चुनाव से पहले क्या हुआ क्या नहीं इसका लेखा जोखा अखबारों में रंगीन इस्तहार से नहीं बल्कि जनता अपनी आँखों के इस्तहार से तय करेगी...अब असली परीक्षा की घडी निशंक की होगी ?

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

आंखिर निकाह कर ही डाला ?

आंखिर शादी हो ही गई, 15 अप्रेल को होनी थी, लेकिन तीन चार दिन पहले १२ अप्रेल को ही निपटा डाली . जल्दी निकाह के कारण कई हैं, रहे भी होंगे, हो भी सकते थे, और थे भी, हैं भी और आगे रहेंगे भी.......कुल मिलाकर बला मोल ले ही ली !मियाँ ने पैसे और खूबसूरती के लालच में अपने को हलाल तो करवा ही डाला. अब आगे टेनिस की बाल की तरह इधर - उधर पटकते नज़र आयेंगे.....बाकी इनकी सलामती की दुआ एक बार हम भी कर ही देंगे....

अब रह गया पार्ट नंबर दो ! यहाँ से आंखिर रुखसत हो ही गई इंडिया की सानिया मिर्ज़ा . अब पाकिस्तान में दावतों का दौर शुरू होगा. सुना है प्रधानमंत्री भी गिफ्ट भेज रहे हैं, सट्टेबाज खिलाड़ी और हिन्दुस्तानी खिलाड़ी को? खैर निकाह हो गया अल्लाह का शुक्र है ! शांति तो हुई, मीडिया भी अपने ठिकाने में आया, नहीं तो उन्ही के ठिकाने पर टिक गया था...जैसे शादी इनकी नहीं मीडिया की हो रही हो...खैर अब थोडा सकूं तो रहेगा...अब भूचाल पकिस्तान में आएगा, जब तक सानिया और शोएब वहां रहेंगे तब तक मीडिया उनका पीछा नहीं छोड़ेगा, बाकी आवाम अपनी हरकत तो करेगी ही....फिलहाल वहां पर तालिबान का बम फूटे या अमेरिका का ड्रोन हमला हो.....यही चलने की उम्मीद है...मगर एक बात सबको माननी पड़ेगी ताक आंखिर मीडिया नहीं होता तो नहीं हो पाता.

लाल जोड़े में दुल्हन हमेसा सुन्दर लग ही जाती है, सानिया के मामले में भी ऐसा ही है.....घूंघट लम्बा था इसलिए सच कहू तो पहचान में ही नहीं आ रही थी....चेहरा घूंघट में छुप के रह गया.....मगर मीडिया में जिस तरह से उठा - पटक वाला खेल हुआ, और जितने जूठ और सच के नारे लगाए गए...ऐसा हुआ ऐसा नहीं हुआ.....सब को देखते हुए लगता है आगे बच्चे होंगे तो भी सायद मीडिया का रोल बहुत महत्वपूर्ण होगा.................?बस ये देखने की बात है कि कौन कितना झूठ बोलता है हमारा मतलब है..........?

बस देखते रहिये आगे-आगे होता है क्या?

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

पैसे की शादी....

मामला देखा जाये तो सब पैसे का लगता है? दिल के बजाय इस स्टोरी में दिमाग की खपत ज्यादा हुई है...ऐसा लगता है! खैर अचानक शादी हो रही है करके, खबर आई लेकिन वो भी फुस्स ! जरुरी कागजात न होने से वो भी नहीं हो सकी....कुल मिलाकर 'फर्स्ट अटेम्प्ट फ़ैल' !और जो तलाक दिया था उसमे भी पिता का नाम कुछ और लिख डाला...लो कर लो जो करना है..आंखिर हीरो जो है....मनमानी तो चलेगी हीरो की न?अच्छी बात है किसी की शादी होना....लेकिन जिस फजीहत और कश-म-कश के दरम्यान ऐसा हुआ वो भी एक कहानी है और सब जानते हैं क्या हुआ क्या नहीं ....लेकिन इस सब में एक बात तो तय है वो है सानिया जितनी बड़ी स्टार रही है इस देश की और टेनिस की उस सोच में जरुर कमी आई है और देश में उनकी टीआरपी कम हुई है..जितने चाहने वाले थे उतने ही इस मसले से खफा होने वाले भी हो गए हैं.....दूसरा पहलु सबसे सुखद जो रहा वो था उस लड़की आयशा सिदिकी का जो पहली पत्नी थी....जैसा वो दावा कर रही थी ...उसे उसका हक़ मिल गया...और जो बाद में कबूल भी किया शादी का और मजबूरन तलाक भी देना पड़ा...इससे एक बात तो देखने को मिली लोग कैसे कैसे साफ़ जूठ बोल जाते हैं....चाहे उनका जीजा क्योँ ना हो जो लम्बी लम्बी प्रेस कांफेरेंस कर सब जूठा होने का दावा थोक रहा था.....वो भी चुप है....दुबक के रह गया......अब क्या हुआ मियां जी....?खैर जो हुआ अच्छा हुआ...शादी कितनी चल पायेगी वक्त बतायेगा...हमारी ओर से शुभ कामना दोनों को!.....लेकिन मीडिया कितना खूंखार बना रहता है, ये वक्त वक्त बतायेगा....फिलहाल पाकिस्तान हो या फिर इंडिया दोनू ही देश का मीडिया बौखलाए बैठा है इन दोनू से ....और अभी तो उस 'एक्स मिर्ज़ा साहब ' की जबान खुलनी बांकी है.....जो कभी मिस मिर्ज़ा के करीबी हुआ करते थे.......?

स्टोरी अच्छी है हीरो की दूसरी शादी हो रही है, हेरोइन भी पहली सगाई तोडकर प्रेमी के साथ निकाह करने जा रही है,विलेन भी है....लेकिन इसमें विलेन कोई पुरुष नहीं बल्कि एक महिला है...जो शहर की रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखती है और एक अच्छे अंतररास्ट्रीय पाठशाला में शिक्षिका थी....जो हीरो की पहली पत्नी भी थी, और उसने हीरो से रोप पीट कर मीडिया को सहारा बनाकर तलाक ले डाला वो भी तब जब उसे उसका पति नहीं मिला, जो सीमा पार रहता था और गोरों के खेल बाल-बैट [क्रिकेट]का सट्टेबाज खिलाड़ी भी है..उसके अलावा चोट खाए हुए और भी कई किरदार हैं! एक साहब तो विदेश पढ़ाई करने चल दिए....एक हीरो का ही अपना जीजा बताया जा रहा है....जो पता नहीं क्या क्या बोलता फिर रहा है...और बोलते-बोलते इंडिया पहुच गया...उसके अलावा सीमा पार भी महिलायें भी हैं जो हीरो के करीबी मानी जाती थी...वो भी छाती पीट रही है...बाकी पता नहीं कितने पढ़ाई छोड़ चले गए हैं...कुछ दुआ में मस्त हैं तो कुछ दारू के साथ ब्यस्त हैं...कुल मिलाकर कहानी अच्छी है....अब देखना यह है की हीरो और हेरोइन की शादी कब तक हो पाती है और फिर हीरो हेरोइन को अपने वतन ले जाता है या फिर किसी दुसरे मुल्क में...जहाँ वो खेल के शहंशाह बन कर खूब 'रियाल' कमा सकें....

अब देखते रहिये आगे-आगे होता है क्या ?

मंगलवार, 30 मार्च 2010

शादी सानिया की.....

टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ शादी की तैयारी जोर-शोर से शुरू हो गई है। मंगलवार को सानिया ने मां के साथ दिल्ली पहुंचकर पूरे परिवार के लिए पाकिस्तान का वीजा हासिल किया। रात में अपने शहर लौटने के बाद सानिया ने कहा कि हैदराबाद में शादी होगी और उसके बाद लाहौर में भी रिसेप्शन होगा।

सानिया से जब लाहौर में दावत की तारीख के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। वैसे, बताया जा रहा है कि निकाह 11 अप्रैल को हैदराबाद में होगा। लाहौर में 16 या 17 अप्रैल को दावत दी जाएगी।

शादी के बाद भविष्य की योजनाओं के बारे में सानिया ने कहा कि मैं और शोएब, दुबई में रहेंगे। सानिया के मुताबिक, शोएब के पास दुबई में घर और वहां की नागरिकता पहले से ही है। शोएब के बारे में पूछे गए सवाल पर टेनिस खिलाड़ी ने कहा कि मैं उन्हें सात सालों से जानती हूं।


जब उनसे पूछा गया कि शादी के बाद भारत-पाक मैच के दौरान किसका समर्थन करेंगी, तो उन्होंने कहा कि भारत के साथ-साथ अपने पति को चीयर करूंगी। उन्होंने कहा कि वह अपनी भारतीय नागरिकता नहीं छोड़ेंगी और 2012 ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी।

इससे पहले दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग से वीजा हासिल करने के बाद सानिया की मां नसीमा मिर्जा ने कहा, 'हम खुश हैं। हमें वीजा मिल गया है... तो हम पाकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे।' सानिया ने खुद शादी के बारे में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, 'मैं किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगी।' नसीमा ने कहा कि उनका परिवार सानिया के फैसले से खुश है। उन्होंने कहा, 'हम उसके साथ हैं और उसके सुखी भविष्य की कामना करते हैं।' सानिया की मां ने टेनिस स्टार की बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा के साथ सगाई के बारे में बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले में जो कुछ हुआ मैं उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहती। हम अब आगे के बारे में सोच रहे हैं।

अब देखते रहिये क्या-क्या तमाशा होता है....इस शादी में ?
[साभार नवभारत टाइम्स]

रविवार, 21 मार्च 2010

किन्नर भी बनेंगे पेंसनर !

GOOD NEWS FOR THE EUNUCHS.नाच-गाकर गुजर-बसर करने वाले राजधानी के किन्नरों को अब पेंशन मिलेगी। MCD ने फैसला लिया है कि राजधानी में रहने वाले लगभग साढ़े तीन लाख किन्नर हर महीने एक हजार रुपये पेंशन पाने के हकदार हैं। एमसीडी की इस योजना से आर्थिक तंगी से गुजर रहे विशेषकर बुजुर्ग किन्नरों को सहारा मिलेगा।

सालों से कोशिश की जा रही थी कि दिल्ली के किन्नरों से कोई काम लिया जाए ताकि वे अपने पारंपरिक नाच-गाने के काम से छुटकारा पा सकें। एमसीडी ने विचार भी किया था कि किन्नरों को प्रॉपर्टी टैक्स की उगाही के काम में लगाया जाए, लेकिन बात जम नहीं पाई। अब एमसीडी ने उन्हें पेंशन देने का निर्णय लिया है। इसे लेकर निगम की पिछली बैठक में एमसीडी की महिला कल्याण एवं बाल विकास समिति ने प्रस्ताव पेश किया था, जिसे मंजूर कर लिया गया है।
[साभार-नवभारत टाइम्स]

रविवार, 7 मार्च 2010

मासूम की क्या गलती थी...?

उल्फत में अवाम हुआ तो क्या हुआ,
अपने वतन को संभालना तो सब को आता है,
मगर अपने ही गैर हुए तो इसमें कौन क्या करे ....
क्योँ नहीं जवाब देती हुकूमत? क्योँ नहीं करती कोई मुख्त्लिब शियाशी कोशिश....क्या बिगाड़ा था उस मासूम ने ? जिसन अभी दीन और दुनिया का मतलब भी ना पता हो....जिसे अपने पराये का अहसास न हो...फिर भी ऐसा सब कुछ हुआ जिसे देख कर सुन कर कम से कम इंसानियत को एक बार तो शर्म शार होना ही पड़ेगा....जिसके मां बाप साथ समुन्दर पार कमाने-खाने निकले थे, और जो अपनी जिंदगी के कुछ हसीं पलों को अपने बचे हुए जिंदगी के साथ बिताने की जद्दोजहद दिन रात कर रहे थे...उनका नूर अब इस जिंदगी में नहीं रहा....!

खबर मीडिया /अखबारों से सबको मिली, देखी पढ़ी सबने....लेकिन हुकूमत की पर्तिक्रिया शून्य....हमारी हुकूमत ने तो न उनके राजदूत को बुलाया ना अपने आप कोई बात की...शर्म की बात है बयान बाज़ी सिर्फ मीडिया द्वारा ही होने लगी और कुछ नहीं.....ऐसा सब कुछ होना विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपने आप में बहुत कुछ कहता है और दर्शाता भी है......सामाजिक ताना बाना को देखें तो दोनू मुल्कों की अपनी अलग शियासत, संस्कृति,और रहन सहन है. मगर एक सभ्य समाज में क्या ऐसा होना अच्छी बात है? लोगों का रहना-सहना, मिलना जुलना बेशक अलग हो लेकिन स्वरुप तो वही होगा....वो तो नहीं बदल सकता....सोच तो कहीं ना कहीं मानवता पर टिकती है...? फिर ऐसा क्योँ ? क्योँ इंसान कभी कभी इतना दरिंदा हो जाता है....क्या बिगाड़ा ठोस मासूम ने...?जिसने अभी पूरी तरह से दुनिया भी नहीं देखि थी...यह बात ना केवल उस देश के लिए बल्कि हमारे देश में भी ऐसे ही ना जाने कितने हादसे होते हैं....और रोज रोज ऐसे घटना होना शर्मनाक है...वाकई शर्मनाक! मासूम गुर्शन सिंह चन्ना के कतल के मामले में एक भारतीय आदमी पकड़ा गया है जो अपने माता पिता के साथ छुटियाँ मनाने गया था....ऑस्ट्रेलिया और पंजाब का रहने वाला था. इसकी जितनी भत्सर्ना की जाए कम है और जिसने किया है उसको तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिसे दुनिया देखे.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

होली की आपको हार्दिक सुभकामना....





रंग का त्यौहार 'होली' के मंगल अवसर पर आप सभी को बहुत-बहुत गुलाल, अबीर, रंग,गुजिया के साथ हार्दिक बधाई ! इश्वर करे सभी को खुशियाँ और प्यार और सफलता मिले.....

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

बजट-२०१० ,आंकड़ों का झुनझुना ...



बजट --नाम सुन कर हर नौकरी पेशे वाला इंसान एक बार तो सतर्क हो हो ही जाता है....चाहे वो घर का , दुकान का हो या अपना निजी पाकिट का जो महीने भर के लिए होता है या फिर देश का.......वही बजट आज प्रणव डा ने संसद में टिपिकल बंगाली अंदाज में दिया....जैसे कोई बंगाली महिला आगे आगे और पति उसके पीछे-पीछे जोर जोर से चिल्ला कर , झल्ला कर पैर पटक कर चलता है उसी तरह से प्रणव दा ने भी इस बजट को पेश किया.....

परंपरा के अनुसार बिपक्ष ने विरोध किया...स्वरुप अलग था....लेकिन चेहरे वही पुराने जाने-पहचाने....खैर काम की बात यह की मिला क्या ? देखा जाए तो जी दी पी थोडा बहुत बढ़ा है तो प्रणव दा भी चौड़े हो गए और ऐलान कर डाला आम आदमी का बजट है...लेकिन दूर दराज गाँव के किसी गरीब से पूछा जाए तो पता चल जाएगी असलियत.....अंत में कुछ नहीं दिया तो कुछ नही लिया लेकिन धीरे धीरे लेंगे वाली कहावत यहाँ भी चरितार्थ हुई....और तेल के दाम बड़ा डाले....वो भी बजट वाली रात से ही....कुछ नहीं तो तेल के दाम बढ़ा दो....पता नहीं सरकार क्या सोच के बैठी है.....अब तो गाड़िया भी सेकंड हैण्ड 5000 से लेकर 20000 तक मिल जाती हैं...अगर चलती का नाम गाडी की बात करें तो ! और अगर गाडी चलेगी तो तेल भी भरा जायेगा.....और तेल का सरकार ने तेल निकाल लिया है...साथ में आम आदमी भी पिस रहा है.....


प्रणव दा ने भी ठीक सोचा और ठीक कहा की में साफ़ कहता हूँ, हो भी क्योँ नहीं....सियासत नाम ही चीज़ ऐसी है....पहले बिहार और फिर ४ राज्यौं में चुनाव का जिन्न प्रणव दा को याद है....और अभी तो दो ही साल हुए हैं ना ....आगे देखिये क्या क्या होता है....बिहार में तो कांग्रेस अपनी सब कुछ लगाने को तैयार बैठी है ...जिसकी सैलरी नहीं बढ़ेगी वो क्या करेगा.....ये उन लोगों से पूछो..और ये रेसेस्सन जैसे जिन्न का क्या होगा ?कुल मिलाकर कहें तो एक बार फिर से आंकड़ों का झुनझुना सरकार ने पकड़ा दिया है लोगों के हाथ और बजाते रहो पूरे वर्ष !

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

सचिन का विश्व रिकॉर्ड...गजब की पारी !

क्या शॉट है ....क्या स्टेट ड्राइव मारा है.....मज़ा आ गया.....श्याद ही कोई विश्व में ऐसा होगा जो सचिन के शॉटस पर ये बातें नहीं कहता हो.....२४ फ़रवरी का दिन भी ऐसा ही था...जब सचिन ने विश्व रिकॉर्ड तो तोडा ही साथ ही अजेय भी रहे मतलब नोट आउट २०० रन बना कर ! साथ ही दक्षिण अफ्रीका से सिरीज़ भी जीत ली....पहला मैच बड़ा क्लोज़ रहा...लेकिन ग्वालिअर में सचिन ने गजब की पारी खेल देश को ख़ुशी दे दी. वहीं ममता दीदी का रेल बजट धरा का धरा रह गया.....सब जगह सचिन ही सचिन ही रहा....दूसरी बड़ी खबर पाकिस्तान के विदेश सचिव के पैर भारत में टिके.....और मुलाकातों का दौर चला, लेकिन वे भी मुलाकातों तक ही सीमित रह गए....और उनसे कुछ उम्मीद भी सचिन के आगे सब फीके पद गए....कुल मिलाकर कहें तो सचिन बनाम ममता रहा यह दिन..... सचिन जितने अच्छे खिलाड़ी हैं उतने ही अच्छे इंसान भी....जो किसी भी इंसान को महान बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है वो है 'एक अच्छा इंसान बनना' .सचिन में वो गुण मौजूद है इसलिए वो इस मुकाम तक पहुचे हैं आज....लेकिन उन जैसा खिलाड़ी को यह मुकाम बहुत पहले ही पा लेना चाहिए था, और वर्ल्ड रिकॉर्ड और कोई तोड़ता तो और मजा आता फिर सचिन उस वर्ल्ड रिकॉर्ड को तोड़ते...और सचिन के वर्ल्ड रिकॉर्ड को फोल्लो करते.....मानता हूँ इच्छाएं असीमित होती हैं लेकिन खेल में इतना होना जायज भी है.

सचिन ने ग्वालियर की वीर भूमि में अपनी वीरता विश्व रिकॉर्ड बना कर दिखाई. जिसमे उन्होंने २०० रन बनाये और नोट आउट रहे. साथ ही इंडियन कैप्टेन महेंद्र सिंह धोनी ने भी गजब के हाथ दिखाए. दिखाते भी क्योँ नहीं सामने सचिन जो थे. . उन्हूने दिखा दिया 'ही इज जीनियस' ! हमारी ओर से सचिन रमेश तेंदुलकर को बहुत-बहुत बधाई ! ...में न्यूज़ रूम में था और मुंबई, दिल्ली से लाइव ले रहा था रेलवे बजट पर अचानक सब कुछ छोड़ कर सचिन पर 'फोकस' होना पड़ा ! एक दम से ताजगी आ गई जबकि तब तक हम थक चुक थे, और खबर नीरस हो रही थी क्यूंकि वही बजट का डंका पीट रहे थे,ये ऐसा हुआ वो ऐसा हुआ...ऐसा होना चाहिए...ब्लाह ब्लाह ब्लाह....जैसे ही २०० रन बनाए हमने भी न्यूज़ रूम में खुशी मनाई, एक कैमरा न्यूज़ रूम लगा दिया गया और लाइव सभी लोग खुसी मनाते हुए 'लाइव' गया.....कुल मिलाकर ममता का रेल बजट फीका कर दिया सचिन के दोहरे शतक ने...ममता बनर्जी का भी लाइव हुआ लेकिन वो मज़ा नहीं आया जो सचिन के दोहरे शतक को देखने में आया. ...सचिन से अब अगले तीसरे शतक के इंतज़ार में .....!

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

Enigmatic personality……is no more….!


Enigmatic personality……is no more….!



Well….. ! It was socking news for me and my close friends….18th feb. was the day when I was in news room, suddenly a line flashed on the TV screen, as a bottom line Breaking….O No….. I was stunned to see that Nirmal Da is no more…..what a setback to all NSDians and those who love theater and for artist fraternity. I still remember when I was in Akashvaani {All India Radio}, I met him through my close friend…We went to All India Radio Canteen, after meeting Danish Sir who was Co-ordinator of FM-II[Now FM Gold]. We had a good chat and ordered 3 place of rice & rajma with lots of ‘Salad’.He asked what’s my future plan…That time I was not impressed with him and thinking that he is just from NSD and doing something related to acting …As I used to visit Mandi House for play, I have special attachment for that place. After meeting 20 minutes I had to enter in to the Studio for the night show….it was my 4th or 5th programme on air. Earlier I was doing with Delhi-D & other channels. He studied in Almora & Nainital, as he hails from Nainital city, a beautiful city in the heart of Central Himalaya.
Later on he moved to London and attached with some Artistic Groups, after that he got first big break from Sekhar Kapur in ‘BANDIT QUEEN’ played character role of Vikram Mallah. Later on he was part of many films & Albums….We will miss him on screen as I liked his long hairs….his dialogue delivery & presentation most of his presence of mind…We will miss him ….Last Salute to Nirmal da…….!

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

निर्मल दा का जाना दुख की बात...........

निर्मल पाण्डेय आज दुनिया से अलविदा कह चुके हैं....उन्हें मुंबई में हार्ट अटैक आया और इश्वर ने एक इंसान को अपने पास बुला लिया...उन्हें हम निर्मल दा भी कहते थे...एक अच्छा इंसान और कलाकार नहीं रहा...उनका जाना ना सिर्फ मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लिए बल्कि देश ने होनहार एक्टर खो दिया है....अकस्मात् उनका जाना अपने आप में दुःख की खबर है...नैनीताल में उनके घर पर कोई नहीं था....सब लोग मुंबई निकल चुके थे, उनके रिश्तेदार अब नैनीताल में घर पर इकठे होने शुरू हो गए हैं...निर्मल दा ने 'विक्रम मल्लाह' के किरदार को अच्छी तरह निभाया......बैंडिट क्वीन में....दायरा के लिए उन्हूने बेस्ट एक्टर वैलेंती अवार्ड जीता फ़्रांस में ..और गोड मदर में भी उन्हूने अच्छी भूमिका निभाई.....एन एस डी से पास आउट होने के बाद वे लन्दन गए, वहां पर ग्रुप के साथ काम किया....हार्ट अटैक से उनका मुंबई में देहांत हो गया ...और कुमाओं के लोगों के लिए यह बहुत बड़े दुःख की बात है......शानदार कलाकार और इंसान को खोने का दुःख रहेगा...और उनकी अलग अदा को भी हमेशा याद रखा जायेगा......

हमारी ओर से अंतिम सलाम निर्मल दा को ....!


उनके खास साथी मशहूर अभिनेता मनोज वाजपेई जी का ब्लॉग पढ़ा, उन्हूने अपने विचार और संवेदना प्रकट की है यहाँ उनका ब्लॉग में लिखा डाल रहा हूँ !

बहुत याद आओगे निर्मल तुम
Posted: 19 Feb 2010 08:46 PM PST
मेरे दोस्त स्वर्गीय श्री निर्मल पांडे को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उसके परिवार को इस परिस्थिति से उबरने की शक्ति दे। जब मुझे अचानक एक एसमएस आया, अपने प्रिय मित्र अनिल चौधरी का कि निर्मल का देहांत हो गया तो कुछ देर के लिए मैं सुन्न बैठा हुआ था। और फिर आंखों से आंसू निकल पड़े। मन बेचैन हो उठा। फिर लगातार अनिल चौधरी के साथ संपर्क बनाए रखा। आगे की जानकारी के लिए। मैं अपनी सारी मीटिंग्स खत्म करता जा रहा था, लेकिन मन में कुछ और ही चलता जा रहा था। सारी यादें और वो सारे पल जो निर्मल के साथ बिताए थे, मन में उमड़ने लगे।

मुझे अभी भी याद है उसका एक नाटक-राउंड हेड पीक हेड। इस नाटक में उसने अनूठा अभिनय किया था। मुझे अभी भी याद है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाहर नीम के पेड़ तले एक दूसरे की टांग खींचते रहना। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं विक्रम मल्लाह के रोल के लिए चुना गया था, तब मुझे सिर्फ यही डर था कि कहीं निर्मल पांडे शेखर कपूर से न मिल ले। क्योंकि अगर वो मिला तो निश्चित तौर पर मुझसे यह रोल छिन जाएगा। वो दिखने में इतना सुंदर था। हुआ वही। जब शेखर से निर्मल मिला तो मुझे उस रोल से हटाकर मान सिंह का रोल दे दिया गया और निर्मल को विक्रम का रोल दे दिया गाय। शेखर ने उसके बारे में कहा कि वो ईसामसीह जैसा दिखता है।

वो था भी इतने सुंदर व्यक्तित्व का मालिक। उस पर दिल हीरे जैसा। बड़े शहर की कोई भी काली छाया उसके दिल को छू नहीं पाई थी। नैनीताल के पहाड़ से आया था। और उस कमाल के व्यक्ति की कमजोरी यही थी कि वो यहां पहाड़ को खोजता रहा। शायद ये हाल हम सभी का है,जो छोटी जगहों से आए हैं। लेकिन, निर्मल कुछ ज्यादा सोचता था इन सबके बारे में। ये शहर की मारधाड़, काटाकाटी उसे पसंद नहीं आती थी।

कुछ दिनों से संपर्क टूटा हुआ था। वो अपने जीवन में रमा था। हम सभी अपने जीवन में अलग अलग व्यस्त थे। जब मैंने उसका पार्थिव शरीर कूपर हॉस्पीटल में देखा तो मैं फफक फफक कर रो पड़ा। कोशिश ये करते हुए कि कोई मुझे देखे नहीं। मैं बस किसी तरीके से वहां से निकल जाना चाहता था। क्योंकि उस दृश्य़ ने विचलित कर दिया था। और सबसे दुख की बात यह है कि इस खबर को मैं कहीं भी नहीं देखता हूं। एक ऐसे व्यक्ति का देहांत हुआ है, जो ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद एक हवा के झोंके की तरह आया था। जिसे इस इंडस्ट्री ने सिर आंखों पर बैठाने की कोशिश की थी। लेकिन आज वो ही इंडस्ट्री उसके देहांत की खबर से बेखबर है। बड़ा अजीब है ये सब।

वो चिड़ियों से बातें करता था बैंडिट क्वीन की शूटिंग के दौरान। वो चिड़िया की आवाज के साथ गुनगुनाता था और मुझसे कहता था- मनोज सभी सुर इनकी आवाज में है। इसके बाद वो सारेगामा के सुर निकालकर दिखाता था। और घंटो बैठा रहता था चिड़ियों से बातें करते हुए और सामने तालाब के पानी को देखते हुए। ऐसा लगता था मानो नैनीताल का ताल उसे नजर आ रहा है।

मेरे दोस्त निर्मल तुम बहुत याद आ रहे हो। तुम्हारे साथ बिताए कई पल याद आ रहे हैं। ये उम्र नहीं थी जाने की। लेकिन तुम जहां भी रहो तुम्हें शांति मिले, खुशी मिले। मेरी यही दुआ है ईश्वर से।

तुम्हारा और आपका
मनोज बाजपेयी

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

गोरे के कारण ड्राईवर पिटा !



कभी कभी जिंदगी में ऐसा हो जाता है जिसके कारन आप हंसी का पात्र भी बन जाते हैं और गुस्सा भी आता है वो भी अपने ऊपर ! और जिस कारन आपके साथ ऐसा हुआ उसके ऊपर भी.....मगर सबसे खास बात आप कर कुछ नहीं सकते हैं...ऐसी ही घटना हमारे एक ड्राईवर के साथ हुई...जो हमें ड्रॉप करने आता है...बड़ा बातूनी है....कुछ भी बात कर लो सब जवाब उसके पास.....जवान लड़का है, पिता पुलिस में, माता जी पंजाब में, खुद टैक्शी चलाता है और उड़ाता है.....लड्कियौं का पुजारी है.....एक दिन मुझे ड्रॉप करने आया ..बोला सर आज पिट गया में.......! मैंने पुचा कैसे और तू पिट गया यकीन नहीं हो रहा है...बोला ऐसा ही हुआ.....दरसल वो दिन में एक गोरे के की गाडी चलता है...बोले तो उसकी गाडी दिन में एक अमरीकन अधिकारी के यहाँ लगी हुई है....और रात को मीडिया की गाडी चलता है....गोरे के बच्चे भी आये हैं....उनको लेकर अंसल प्लाज़ा मार्किट ले गया....गोरा और उसकी बीबी तो चली गई अन्दर....और उनका एक गोद वाला गोरा भी साथ में ले गए...और रह गया दूसरा गोरा बोले तो दूसरा लड़का...उसकी उम्र होगी तक़रीबन ६-७ साल....अब वो अंग्रेजी बोले ये ड्राईवर साहब कुछ सब्द समझते हैं या फिर इशारे इशारे में बोलना समझना होता है....जैसे वेट...गो.......थैंक्स ! ये साहब अपनी लाल कार को अंसल प्लाज़ा के बहार कड़ी कर गोरे परिवार के इंतज़ार में छोटे गोरे के साथ बैठे थे.....इस बीच इनको नींद आ गई...गोरे का बचे ने देखा मिस्टर.......आर यू स्लीपिंग ? ओ आल राईट ...स्लीप स्लीप....! बोल के अंग्रेजी गाने सुनने लग गया.......इस बीच जोर से चिल्लाया गोरे का बच्चा ! इंडियन गर्ल्स आर सो सेक्सी...........ऐसा चिल्लाया की सामने से आ रही दो सुन्दर लड्कियौं ने इन परवचनों को सुन लिया....फिर क्या था....साइड मिरर के पास आ कर इन जनाब को बहार निकाला और जड़ दिए दो थप्पड़ ! धाड़ धाड़ .......! ये जनाब एक तो नींद में थे ऊपर से लड़की ने बाहर निकलने को कह कर ये नसीहत दे डाली थप्पड़ के साथ ....की छोटे बच्चे को बिगाड़ते हुए आपको शर्म नहीं आती....सब देख रहे थे....इनको तो जैसे सांप सूंग गया.....क्या करते ....लड़की पर हाथ उठाते या फिर अपनी सफारी देते ....इनती देर में काम हो चूका था.....और गोरे का बच्चा हँसे जा रहे था.....अन्दर बैठे बैठे.....! थोड़ी देर में गोरा और उसका परिवार आया और छोटे गोरे ने सारी बात बड़े मज़े से बताई .....मोम ! धाड़ धाड़ टू मिस्टर ....! आई लाइक इट....आई लाइक इट....! फिर गोरी की पत्नी ने माफ़ी मांगी....और अपने छोटे गोरे की विशेषता बताई इन सब्दों में...ही इज वैरी नौटी ! वैरी नौटी ! अब इन जनाब को क्या मालूम की नौटी के चक्कर में जिंदगी में पहली बार लड्कियौं से पिट गए.....वो भी अंसल प्लाज़ा जैसे जगह में...!मेरी हंसी भी आ रही थी और सिम्पथी भी थी हमारे ड्राईवर के लिए.......

अमरीका में हनुमान जी का मज़ाक...?



अमरीकी बाज़ार में हिन्दुओं के बलशाली भगवान् बजरंगी बली के हनुमान की मूर्ति का पर्योग खिलोने के रूप में किया जा रहा है, निश्चित रूप से करोड़ों हिन्दू इससे आहत हुए हैं....और अमेरिका का यह घटिया प्रचार जान बूझ कर किया जा रहा है...उसे पता है ये हिन्दू देवता हैं....वह अपने बाज़ार में हनुमान जी को खिलोने के रूप में बेच रहा है.....जो गलत है......! नेवेदा शहर में इस बारे में एक बयान भी जारी किया गया है...यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ़ हिन्दुइज्म की ओर से यह बयान दिया गया है और इसको अनुचित बताया है...साथ ही मांग की है इनका कमर्शल यूज़ गलत है.....आजकल के सूचना क्रांति के युग में सबको पता है कौन क्या है क्या नहीं ....जिस कंपनी ने बनाया है उसको भी नोटिस जाना चाहिए और उसे हिन्दुओं से माफ़ी मांगनी चाहिए..... ऐसा क्योँ होता है हिन्दू देवी - देवता ही मज़ाक का पात्र बनते हैं....अन्य धर्मों पर इतनी आसानी से हाथ नहीं डालते....?अमेरिका की अपनी संस्कृति तो है नहीं ...दूसरों की संस्कृति से खिलवाड़ करना अपना कर्म समझता है.....भारत सरकार को इस पर उचित कार्यवाही कर अमरीका की सरकार से जल्द से जल्द बात करनी चाहिए और इस पर कंपनी को तुरंत माफ़ी मांगनी चाहिए.....और हनुमान जी का ऐसा कोमर्सिअल पर्योग बंद करना चाहिए.......

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

मेरा वेलेटाइन डे .....

१३ तारीक शाम न्यूज़ रूम में बैठा था....अचानक खबर आई की पुणे में बम बिस्फोट हो गया है....फेमस जगह जर्मन बेकरी में....जहाँ विदेशी बड़ी संख्या में आते-जाते हैं...लग गई....हर तरफ अफरा तफरी का माहौल, पुलिस , पर्शासन, खुफिया एजंसियां सभी जैसे रात की नींद से जागे.....और टीमें रवाना हुई...कोई मुंबई से कोई दिल्ली से...सारा देश और मीडिया की नज़र वहीं पर लग लगी...हमने भी कवरेज करने के लिए अपने रिपोर्टर को भेजा ....थोड़ी देर में स्क्रीन पर मंजर देखा तो विसुअल्स बड़े सोचनीय थे....बहुत दुःख हुआ...देखकर कितने मासूम मौत के घात उतार दिए गए..सबसे पहले उन लोगों को श्रधांजलि !और इश्वर उनके परिवारों को दुःख सहन करने की ताकत दे !
कहते हैं पत्राकारिता में फीलिंग्स को कण्ट्रोल करके रखना पड़ता है....और इनको आड़े नहीं आने देना चाहिए अपने काम में.....मैंने भी इतने साल रिपोर्टिंग में रह कर यही सीखा था, एक बार फिर से देश पर हमला हुआ...अमन और चैन के दुश्मन फिर से इस सुन्दर देश को अपने कारनामों से लहू-लुहान करने में लगे हैं.....इन सबके खिलाफ पूरे देश को एक जुट खड़ा होना पड़ेगा.अगले दिन १४ फ़रवरी को Velentine Day था इसलिए हम भी प्लान कर रहे थे कैसे कैसे खबर आएँगी, और क्या क्या चलाना चाहिए...सब बम विस्फोट ने सत्यानाश कर दिया....खैर लाइव भी हुए....खबर भी चली.....रात १ बजे ऑफिस से निकले...सुबह जल्दी आने पड़ेगा करके......घर पंहुचा रात 2 बजे...बिस्तर में गिरते ही नीद की बेहोशी छा गई ......ये सोच के की सुबह जल्द उठ के ऑफिस जाऊंगा....सुबह नीद खुली ११ बजे..फटा फट उठा और नहाया धोया, देखा तो कोई भी कमीज में प्रेस नहीं थी..हे भगवान् ! अब क्या होगा...छोटा भाई को ऑफिस के काम से चंडीगढ़ जाना था इसलिए उसकी कमीज नहीं पहन सकता था....क्यूंकि पता नहीं कौन सी ले जाये और कौन सी नहीं ...और मामी जी ने पहले कह रखा था की उसके कपडे मत पैरना.....जल्दी से नहाया, तैयार हुआ और फटाफट कमीज में उलटी सीढ़ी प्रेस की...प्रेस वाले को कपडे देने का समय न मिलने के कारन ऐसा हुआ....तब तक मामी जी ने नास्ता तैयार कर दिया था.....तैयार भी होते रहा और नास्ता भी करता था....चल दिया ऑफिस के लिए...ऑफिस पंहुचा १ बजे.......इस बीच रास्ते में देखा और ख्याल आया की आज तो वेलंटाइन डे है.....चलो देखते हैं क्या फिज़ा देखने को मिलेगी....कहते हैं दिल्ली दिल वालों की होती है..लेकिन 'दिल के दिन' दिल वाले गिने चुने ही दिखे...दिल्ली की सड़कों पर.....देखा तो महिपालपुर चौक खाली...फूल वाले खाली बैठे थे......फिर वसंत विहार..वहाँ भी वही हाल....मुनिरका वही हालत...आर के पुरम फिर वही सीन ......और अंत में दिल्ली में सबसे ज्यादा फूल बिकने वाली सरकारी ग्रामीण जगह 'दिल्ली हाट'.....वहां पर भी शांति...कोई लड़का नहीं कोई लड़की नहीं.....साउथ एक्स आया तो कुछ दिखा ....एक गुलाब लिए लड़का साउथ एक्स में दिखा....सोचा चलो इसने इज्जत रख दी...वेलेंटाइन बाबा की .....मगर लगा लड़की फूल ले या न ले....कहते हैं सबसे ज्यादा ६० फीसदी लड़के फूल खरीदते हैं और बांकी लड़कियां या अन्य.....लेकिन न लड़के दिखे न लड़कियां.....मसला वही ..... सन्डे ! फूल वाले फूलों को देखकर मुश्कारा जरुर रहे थे....मगर कितने पैसे का फूल है ..यह प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा सका.....इस साल २०१० में सबसे ज्यादा रास्ट्रीय पर्व सन्डे के दिन ही हैं....मीडिया वालों को छोड़ कर बाकी को नुकशान होने वाला है....मीडिया को कोई फरक नहीं पड़ता है.....क्यूंकि इनके लिए कोई दिन कोई फेस्टिवल नहीं होता है...ये लोग दुनिया को दिखाते तो हैं लेकिन अपने लिए कुछ नहीं कर पाते है.....खैर काम तो काम है ! ऑफिस में काम स्मूथ चल रहा था..इस बीच हमारे बरिष्ठ मान्यवर ने कहा की शाम का खाना आज ऑफिस में होगा....और घर का बना होगा.....इस महान काम में लगा दिया हमारे सहयोगी अजीत और हमारे बरिष्ठ अजय जी, जो हमेशा मदद के लिए तत्पर रहते हैं....और शान्ति और चालाकी से काम करने में यकीन करते हैं....खैर दिन बीता......शाम बीती...और अंत में समय आ गया खाने का....हमारे मान्यवर बरिष्ठ ने कहा की चलो कैफेटेरिया में बैठते हैं ...सभी चले गए वरुण रह गया था...उसको मैंने कहा की चला जा फिर आ जाना...डेस्क पर कोई नहीं है....वैसे बुलेटिन नहीं था...सन्डे होने के कारन ! इसलिए थोडा समय मिला गया...और अंत में सब मिले कैफेटेरिया में ....जो पहली मंजिल पर है.....और हमारा न्यूज़ रूम बेस-मेंट में .राम सर, रुपेश सर, अजय सर, अजीत, वरुण, जीतेन्द्र और अभिषेक जो बाद में आया और आजकल नाईट वाच मैन की भूमिका में है.... और उसी समय पंजाब से लौटा हुआ था....और आउट पुट से राजीव जी...कैफेटेरिया में गया तो देखा की पूरा टेबल तरह तरह के ब्यंजनों से भरा हुआ था...कोई खड़े खड़े कोई बैठे सब लपेटने में लगे हुए थे....और साथ में खाने का मज़ा भी कुछ और ही होता है....मज़ा आ गया..... पनीर, दाल मखनी , हाथ से बनी कोमल रोटी, सब्जी, अचार.......वाह ! मज़ा आ गया....वाह.! सभी ने पेट भर के खाना खाया....!
कुल मिलाकर वेलंटाइन डे शानदार रहा....! अब जून का इंतज़ार है ...क्यूंकि दूसरा वेलेंटाइन डे 12 तारीक ब्राज़ील में मनाया जाता है.....14 फ़रवरी को पूरे विश्व में और १२ जून को ब्राज़ील वाले पागल होते हैं ....उस दिन फूल और गिफ्ट एक दुसरे को देते हैं प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी या अन्य लोग.........ब्राजील मनायेगा तो हम भी मना लेंगे.....वैसे भी हम हिन्दुस्तानी दूसरों का फेस्टिवल बड़े चाव से ....शौक से...और गर्व से मनाते हैं.....है की नहीं ......? एक बार फिर से सब को हैप्पी वेलेंटाइन डे......2010 !

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

खोज जारी है......

खोज जारी है…......कभी कभी वापस अपने वादियूं में जाने का दिल करता है....वो गाँव का सुन्दर कल कल करती नदी का किनारा, वो हरे भरे खेत, वो कल कल करता शीशे जैसा साफ़ सुन्दर पानी, जिसमे न सरकार का बिल का डर है न ही कोई समय का लफड़ा, मीठे मीठे फल जिन्हें बंदरों की तरह तोड़ने में अपना अलग ही आनंद आता था, वहीं जाने का मन करता है, ना पर्दूषण ना ही खाने पीने का डर , प्रकर्ति की गोद में, प्रकर्ति के लिए और प्रकर्ति के लोगून के द्वारा......काश .....!एक दिन ...सिर्फ एक दिन वो भी बड़ी मशक्कत के बाद...... हफ्ते भर की इकलौती छुट्टी होती है,बाहर के इतने काम होते हैं की घर में रुक नहीं पाता हूँ ममी जी पैर पटकती रह जाती है कि कभी घर पर नहीं रुकता ये लड़का....दिन का खाना खाए घर पर मुद्दत हो गई है....खैर सिस्टर के घर गया था बूढ़ी सास का देहांत हो गया था.....काफी लोग मिले, वहा आये हुए थे.... अच्छा समय निकला छोटी भांजी के साथ ,बात करते हुए ,खेलते हुए....प्यारी प्यारी सी बात, छोटे बच्चे करते हैं...कहते हैं ना भगवान् का रूप होते हैं बच्चे...सच कहा है....अच्छा लगा। पहली बार कुछ अलग तरह के लोगू से मिलना अछा लगा....उसके बाद पुरानी जगह गए जहां कभी काम करते थे, कई पत्रकार मिले वहां, पुराने दिनूं की याद ताज़ा हो गई, जब कभी आकाशवाणी जाया करते थे... इनके साथ काम किया और बहुत अच्छा समय निकला।लगातार जद्दोजहद रहती है हर पल मीडिया में। जब तक आप अपने न्यूज़ रूम में पहुंचते हैं, आप मानसिक रुप से पूरी तरह तैयार हो चुके होते हैं। अगले दिन के लिए आपको फ़िट भी रहना है, और आज का काम भी पूरा करना है, परफेक्ट तरीके से । पूरा दिन थकाने वाला होता है। खाने-पीने की सुध नहीं रहती। फिर भी करना तो है। क्योंकि यही सोचा था कि यही काम करेंगे। और कितने लोग हैं दुनिया में, जो वो करना चाहते थे, वही कर रहे हैं? मैं अपने आप को इस बारे में बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मैं आज जीवन के ऐसे दौर से गुज़र रहा हूँ, जहाँ पर मुझे दिल्ली से निकलना ज़्यादा अच्छा लगता है। छोटे शहरों में काम करना ज़्यादा अच्छा लगता है। लोगों से ज़्यादा-से-ज़्यादा मिलना मुझे बहुत अच्छा लगता है। बड़े शहर अब रास नहीं आते हैं। लेकिन हमारा काम पूरी तरह से दिल्ली और नॉएडा में होने की वजह से कहीं-न-कहीं एक मजबूरी भी है बड़े शहर में रहने की। बहरहाल, मेरी शांति और सुकून की जद्धोजहद और खोज जारी है..... और मैं भी आशा करता हूँ कि इसका रास्ता भी मिल ही जाएगा…

शनिवार, 23 जनवरी 2010

दिल्ली की ठण्ड और शमशान घाट....

जनवरी का महिना और ठण्ड न हो ऐसा कैसे हो सकता है और इस ठण्ड का मंजर क्या होगा....अंदाजा लगाए तो दिल्ली के निगम बोध घाट से ज्यादा उपयुक्त जगह और क्या हो सकती है.....निगम बोध घाट जी हाँ ऐसी जगह जहाँ पर हिन्दू लोग अंतिम संस्कार करने आते हैं....में भी गया था चौहान जी की माता जी के अंतिम संस्कार में भाग लेने.... न्यूज़ रूम में था रात घर से फ़ोन आया की चौहान जी की माता का देहांत हो गया है सुबह अंतिम संस्कार होगा ....रात ऑफिस से घर देर पंहुचा.. जिस वजह से सुबह जल्दी नहीं उठ सका और थोडा देर हो गई शमशान पहुचने में. फिर भी जब तक पंहुचा तब तक मृतक का पार्थिव शरीर अग्नि के हवाले कर दिया गया था. बस अग्नि ने मृतक शरीर को अपनी आगोश में लगभग पूरी तरह ले लिया था ......मंजर देखा था चौकाने वाला ! कम से कम ३०-४० मुर्दे एक साथ.....हे भगवान्....! जहाँ देखो मुर्दे ही मुर्दे .....खैर पहली बार नहीं जा रहा था इसलिए कोई डर या फिर सहम की बात नहीं थी लेकिन इतने सारे मुर्दे देख कर निश्चित ही मन में कई सवाल उठे....... अंतिम सत्य भी वही है....सभी ने यही आना है....एक दिन ! चौहान जी का परिवार मेरी कजन सिस्टर का परिवार है. खैर गया तो देखा यमुना नदी किनारे मुर्दे ही मुर्दे जल रहे हैं....अधिकतर इनमे से बुजुर्ग थे जो ठण्ड के कारन परलोक सिधार गए. अम्मा जी की उम्र भी 80 के ऊपर थी. लेकिन इस बार की ठण्ड वो भी नहीं सह सकी और जिंदगी को अलविदा कह दिया1. रिकॉर्ड मेन-टेन करने वाले से पुछा तो बोला कि सर आज तो अधिक तर बूढ़े ही आये हैं, और अब तक 4३ मुर्दे आ चुके हैं..........जबकि उस टाइम बजा था शाम तक पता नहीं क्या होगा..?और कितने मुर्दे आयेंगे? बगल में बिजली से जलाने वाला बड़ा सा हाल था वहां पर भी भीड़ लगी हुई थी. मन ही मन सोचा मरने वालूँ कि भी कमी नहीं है इस दुनिया में....खैर ये सब इश्वर कि मर्जी है कौन कब किधर जायेगा...मुर्दे जलाने के लिए लकडियाँ देखी तो कची थी, और मुर्दे के ऊपर कोई चीनी तो कोई घी कोई वही बैठे एक लाला जैसे इंसान से लकड़ी के बॉक्स के पतले फट्टे खरीद रहा था, जो चंडी लूट रहा था एक लड़की का बॉक्स का मतलब 3०० रुपये, जो पेटी सेब या फिर फ्रूट कि होती है. ये हाल हैं शाम शान घाटों का. ....मुह में पान चबाये सर में पंडित जी वाला लाल कपडा लपेगे हुए ऐसे लग रहा था जैसे वही इस शमशान घाट का प्रधान हो, और हो भी क्या पता.....मगर वहां का मंजर देख कर दिल दुखी जरुर हुआ, अंतिम संस्कार कि जगह भी इतनी बुरी तरह बिकी हुई है जहां देखो ब्यापार ही ब्यापार ...इंसान को मर कर भी चैन नहीं मिलना...अंतिम संस्कार करने वाले पण्डे तो ऐसे लग रहे थे जैसे मवाली, और इतनी बुरी तरह से काम कर रहे थे जैसे उनमे होड़ लगी है मंदी में कौन कितनी जल्दी सब्जी बेचता है या फिर ग्राहक को पकड़ता है....और जलने के बाद उस राख को एक तसले में दाल कर यमुना के नाले जैसे गंदे पानी में डूबा कर चांटा है और उसमे कुछ सोना या फिर कुछ कीमती चीज़ मिलती है तो उसको मुह में दाल लेता है.....हे भगवान् ! इंसान कैसे कैसे काम करता है.....जवान युवक जिनकी उम्र 15-25 साल की बीच है वो ऐसा कम करने में लगे हुए हैं....काम तो चलो जैसा भी है लेकिन जिस तरीके से कर रहे थे वो अजीब था.....सच में मंज़र बड़ा खतरनाक था वो ..... एक इंसान मरे इंसान के शरीर को जलाकर,बहाकर,हिलाकर.... कैसे - कैसे अपना पेट भरता है.....वो भी यमुना किनारे....राजधानी दिल्ली हाल ये है.....ठण्ड में इससे खतरनाक मंजर और कही का नहीं हो सकता है.....

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

थ्री ईडियट्स और एक कन्या....





जगह- द्वारका सेक्टर चार का राजापुरी बस स्टॉप, समय- सुबह के दस बज के चालीस मिनट के आस पास . मैं ऑफिस जा रहा था, हालांकि ड्यूटी ३ बजे से थी, लेकिन कुछ ज़रूरी काम करना था तो सोचा कि जल्दी पहुंचा जाये और वैसे भी दिल्ली में आफिस जाना रोज़ किसी युद्घ पर जाने से कम थोड़े ही है- तीन घंटे भीड़, धुआं और धक्के से लड़ते हुए जाना और उतनी ही जद्दोजहद करके वापिस आना . नेहरु प्लेस के लिए द्वारका-नजफगढ़ की हॉट-फेब्रेट बस नंबर ७६४ की इंतज़ार में खड़ा था, क्यूंकि इस टाइम बस में भीड़ नहीं होती और सीट आराम से मिल जाती है. जैसे ही मैं बस स्टॉप पर पहुंचा...वहां दो तीन लोग और थे. लो फ्लोर बस में जाने का मूड था- ब्लू लाइन के झूले सहने की हिम्मत नहीं थी, और फिर वह साथ में पूरी जिल्ली के दर्शन भी तो कराते हुए जाती है. ऊपर से बस स्टाफ का व्यवहार- मासा अल्लाह ! कभी हरियाणवी गलियां तो कभी अजीबोगराब हरक़तें. .... इन बस वालों से पूरी दिल्ली वाक़िफ है...यही वजह है कि आज सरकार इन्हें हटाने पर तुली है ......इसी हटाने की प्रक्रिया का भुक्त भोगी भी बना मैं. . ख़ैर दो ऑप्शन थे मेरे पास- या तो वातानुकूलित बस आ जाए या फिर नॉरमल. थोड़ी देर में दो युवक कंधे पर चमड़े का काला एक्ज्कुतिव बैग लिए बस स्टॉप पर आये. सूट- बूट में एकदम कसे हुए वो भी अपने- अपने युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार लग रहे थे. दोनों मेरे बग़ल में आ कर बैठ गए और इसके साथ ही उनसे मेरा रिश्ता जुड़ गया- रिश्ता तीन योद्धाओं का. अब उनमें से जो इमरान नाम के शख्स़ थे , बड़े ही रसिक मिज़ाज के इंसान लगे....और बड़े चटक भी. जबकि उनके साथी महापात्र जी उनसे उलट -शांत स्वभाव के और कम बोलने वाले.....दोनों ही जीवन बीमा का काम करते हैं और बताया कि ये तीन महीने उनके लिए बड़े ही उपयोगी होते हैं, इस टाइम लोग टैक्स बचाने के चक्कर में होते हैं और इसी वजह से इनकी पोलिसी बन जाती है....दोनों ही सेल्स मेनेजर थे देश की अग्रणी कंपनी में, जो दो भाइयों की है लेकिन वे अपने काम से कम और आपसी विवाद और झगडे से ज्यादा फेमस हो गए हैं.हमारे बीच एक सुंदर- सी कन्या बैठी थी- लाल स्वैटर, नीली जीन्स, चाइनीज जूते और मुंह में च्वींगम. तो जनाब इमरान जी ने अपना विज़िटिंग कार्ड लड़की को पकड़ा दिया और फटाक से पूछा- कहां पढ़ती हो? लड़की ने बताया कि वो फैशन डिजाइनिंग की स्टुडेंट है और साउथ एक्स के किसी संस्थान से तीन साल का कोर्स कर रही हैं... उनके पिता जी किसी कंपनी में मेनेजर के पद पर हैं, ये सब जानकारी इमरान ने ली और साथ में हमारे कानों तक भी आई...हमें लगा कि अब तो यह लड़की को पटा कर ही मानेगा लेकिन उसका मुंह खुलते ही हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया. लड़की से कहा गया - आप अपने पापा को बोलना की मुझे फ़ोन करे, और टैक्स बचाने के मामले में हम उनसे बात करेंगे, और उन्हें अच्छी सलाह देंगे. उसकी बीमागिरी देखकर लड़की ने हां में सिर हिला दिया और अपनी पॉकिट में बड़ी ही बेदर्दी से विजिटिंग कार्ड डाल लिया. इतने में एक ब्लूलाइन बस स्टॉप पर आकर रुकी, उसके पाछे- पीछे हमारी लो-फ्लोर भी चली आई. लेकिन ब्लू लाइन वहां खड़ी होने के कारण वो बिना रुके उसके पीछे से निकल गई.. और हम पैर पटकते रह गए... उस वक़्त बलूलाइन पर ऐसी भड़ास निकली मानो बरसों की गर्मी से राहत दिलाने इकलौता सावन आया था और ऐसे ही निकल गया. तीनों के मुंह से निकला- अब तो हम बैठते ही नहीं इस बस में.....और वो कंडक्टर बेचारा हमारी शक्लों की ओर कुछ डरी –सी मुद्रा में देख रहा था ......कन्या के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, शायद उसे बसों की ज्यादा जानकारी नहीं थी .फिर एक और ब्लू लाइन बस आई, और हमारे कोप का भाजन बनी. आखिर फैसला हुआ कि हम लो फ्लोर बस में ही जायेंगे, इमरान जी बार बार कह रहे थे- मुझे तो जल्दी नहीं कालका जी रहता हूँ और लो फ़्लोर बस में ही जाऊँगा. और हमें पूरे कॉनफिडेंस के साथ यह आश्वासन भी दिए जा रहे थे कि अभी और लो- फ्लोर बसें आएंगी लड़की ने भी कहा कि वो भी लो फ्लोर में ही जायेगी- खुन्नस जो निकालनी थी ब्लू लाइन पर... लगा कि अब तो इमरान जी इनके पूरे परिवार का बीमा करके ही जाएंगे..इस बीच हम सभी का एक दूसरे से परिचय हुआ- कौन क्या करता है कहां रहता है....इत्तिफाक से लड़की के भैया किसी न्यूज़ चैनल के कर्मचारी निकले और ....फिर कन्या ने हमसे दूरभाष संख्या मांगी और हमारा पद और नाम भी पूछा लेकिन हमने अपना और चैनल का नाम बताया, दूरभाष संख्या नहीं दी...बातचीत से सभ्य लग रही थी...और भावी योजनाओं में लड़की ने बताया की उसका अब फैशन डिजाइनिंग में इंटरस्ट नहीं रहा है शायद भविष्य में वो लाइन चेंज करे.....हमने बताया कि जो आप कर रही हैं वो भी जाया नहीं जायेगा , और आपके काम ही आएगा, लड़की के चेहरे पर कुछ आत्मविश्वास के भाव दिखे,...इस बीच हमारे आगे से तक़रीबन १०-१२ ब्लू लाइन बस निकली मगर हम किसी में नहीं चढ़े. कितने जिद्दी थे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है. मगर बस स्टॉप पर बैठे-बैठे २ घंटे बीत गए और १ बजने को हो रहा था...इसी बीच लड़की ने कहा- मेरी तो क्लास ही १ बजे की है और मुझे अभी पहुंचना था . लेकिन लगता है मुझे अब घर जाना चाहिए, कब पहुंचूंगी अब? इमरान के साथी महापात्र जिद्द करने लगे की चलो यार ब्लू लाइन पकड़ते हैं और चल पड़ते हैं, लेकिन इमरान जी थे कि- नहीं, लो फ्लोर आएगी... और हम उन पर विशवास कर बैठे....हम तो खुन्नस में थे न की कैसे ब्लू लाइन बस ने हमारी लो फ्लोर बस निकलवा दी.....
.....इस बीच वह स्टॉप जेएनयू का ढाबा हो चला था -हम और महापात्र ...राजनीति, मीडिया, देश , बीमा,अमरीका पता नहीं क्या-क्या डिस्कस कर बैठे वहां पर.....खैर महापात्र वैसे अच्छे जानकार लग रहे थे.....और इंसान भी अच्छे लगे. इस बीच कन्या ने अपने घर फ़ोन किया और बताया कि वह बस स्टॉप पर बैठी है और बस नहीं आई, और वापस घर आ रही है, और चल पड़ी.....! फिर हम तीनों बात करते रहे ....थोड़ी देर बात इमरान जी के प्रवचन शुरू हुए......बोले- सर ये लो फ्लोर बस है न वो १०:३० वाली लास्ट थी, हम रोज के यात्री हैं और हमें पता है...अब ४ बजे से पहले कोई लो फ्लोर नहीं आएगी.....uffffffffffffffff जब आपको पता था तो ऐसा क्योँ किया.....कन्या जब तक सामने थी- बस आएगी आयेगी और वह चली गई तो ४ बजे के बाद आयेगी....उसने शायद हमें 4 बजे तक बेवाकूफ़ बनाने की सोची थी पर कन्या के जाते ही अब वह भी हमारी श्रेणी में ही शामिल हो गया था... इसलिए सच्चाई बताने में ही भलाई समझी .चढ़ जाओ ब्लू लाइन बस में अब....जहाँ से कहानी शुरू हुई थी वही आ कर रुक गई. ऊपर से उस खुन्नस का क्या हुआ ?.....उस भड़ास का क्या हुआ....?मन तो ऐसा किया कि बस क्या कर दूं....कैसे इंसान होते हैं.....खैर हंसी भी आई और रोना भी, पछतावा भी और सर पकड़ के बैठना भी पड़ा.....खैर एक ब्लू लाइन बस आई, बोला चलो इस में चलते हैं में बोला नहीं एक देख लेते हिं इसे जाने दो...दूसरी फिर से ब्लू लाइन बस.....मैंने कहा चलो अब में यहाँ पर नहीं रुकना चाहता ...ढाई घंटे बैठे रहे अंत में उसी बस में....उफ़....! चलो बस में बैठे और आ गए नेहरु प्लेस ...वे भी साथ में आये, रास्ते में महिला वाली सीट खाली हुई तो इमरान जी फटाक से बैठ गए....मै और महापात्र हंस पड़े, नहीं सुधरेंगे इमरान ! मुझे दूसरी साइड सीट मिल गई एक स्कूल का छात्र उठा में उस सीट पर बैठ गया.....महापात्र को भी सीट मिल गई मेरे बगल में ही....नेहरु प्लेस आया तो उतरने पर पूछा- इमरान भाई ऐसा क्योँ किया हमारे साथ.......क्या माजरा है...खैर अब तक हम समझ चुके थे-.थ्री इडियट्स और एक लड़की हो तो.....! फिर भी वो बोले- चलो नीचे उतरते हैं फिर बताता हूं. मैंने सोचा पता नहीं क्या रह गया अब...नीचे उतरे तो इमरान ने अपने मोबाइल में नंबर दिखाया महापात्र को और कहा की बगल वाली का नंबर है , यानी बस में जिसके बगल में बैठे थे जनाब ! चीज़ पहुची हुई है ये....वहां भी अपनी बीमा की बीमारी से बाज नहीं आया.. बोले- बॉय फ्रेंड से मिलने आई है. जान न पहचान ये भी पता कर लिया ...मैने सोचा- बीमा लाइन ही ठीक है...कैसे लड़की से अन्दर की बात पूछ लेते हैं.....महापात्र बोले- अपनी आदत नहीं सुधारेगा....बोला नहीं यार फिर तो हो लिया बिज़नस , दे दिया बिज़नस ! पब्लिक डीलिंग का काम है काहे की शर्म..मन ही मन सोचा- भैया ,लगता है इसे कहीं चप्पल - थप्पड़ नहीं पड़े....या फिर जेल जाना पड़ जाए- वह भी संभव हो सकता है...ख़ुदा करे ऐसी नौबत न आये नहीं तो जेलर के पूरे परिवार का बीमा कर डालेंगे. ख़ैर हमारे बीच एक नया रिश्ता जुड़ गया था..और अब तक काफ़ी गहरा भी हो चला था...................................

रविवार, 17 जनवरी 2010

एक अच्छे राजनेता का अंत....

ज्योति बसु ....एक ऐसा नाम जो राजनीती में नेता नहीं बल्कि सच में राजनेता थे....पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के देहांत से देश की राजनीती से एक अहम् राजनेता का अंत हो गया.....दुखद है....राजनीती के लिए देश के लिए...देश को ऐसे नेता की जरुरत थी....खासकर बंगाल के लिए तो बहुत दुःख की बात है....उन्हूने जिंदगी भर गरीबूं के लिए काम किया और एक अछे राजनेता की तरह राजनीती की....अपने शरीर को मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर उन्हूने एक और मिशाल कायम की....बसु ने करीब सात साल पहले ऐलान किया था कि उनकी मौत के बाद 'गणदर्पण' नामक एनजीओ को उनकी बॉडी डोनेट कर दी जाए। ऐसे नेता को कौन नहीं याद करेगा....मगर एक सीख भी है आज के नेताओं के लिए....उनसे कुछ सीखें....तो इस देश का भला हो जायेगा....अंतिम सलाम इस राजनेता को हमारा !

एक रात सफ़दर जंग हॉस्पिटल में....



कहते हैं इंसान का कुछ पता नहीं होता कि कब क्या हो जाये ....और यही हाल हुआ मेरे साथ लेकिन इस हाल -ए -दरम्यान में बहुत कुछ सीखा भी....बात है जनवरी तारीक १० की ........ऑफिस गया,....दो दिन से सवास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था..कारन ठण्ड का ज्यादा होना दिल्ली में ....जिस वजह से ज़ुकाम और खांसी कि शिकायत कुछ ज्यादा हो रही थी....इस बीच मैंने सोचा कि चलो कुछ दवाई ले लूं ....और ली भी , उस अजीब टेबलेट ने मेरी हालत और खराब कर दी....फिर भी ऑफिस गया....ऑफिस में डेस्क पर सिर्फ तीन लोग थे ....बरिष्ठ घर पर थे उन्होंने घर पर बुलाया भी था शाम को खाने पर...लेकिन वहां भी नहीं जा सका....मेरी हालत रात ७ बजे बाद ख़राब होने लगी...लेकिन सोचा कि लास्ट बुलेटिन १२ बजे जाना है उसके बाद फ्री हो जायेंगे और फिर निकल लूँगा....लेकिन ११ बजे मुझे रहा नहीं गया...ब्रेथिंग प्रॉब्लम होने लगी क्यूंकि टेबलेट ने छाती जाम कर के रख दी थी...ट्रांसपोर्ट में फ़ोन किया राहुल को कि जल्दी घर ड्रॉप करवा दो ....उन्हूने जल्दी करके मुझे १२ बजे गाड़ी दे दी....मेरे साथ राजेश, वरुण,विवेक और एक लड़का नया था वो भी साथ आये....ऑफिस से चले थे तो सभी साथी लोगू ने कहा कि सर आपको जल्दी और सीधे घर ड्रॉप करेंगे....मैंने कहा चलो देखते हैं ...
थोड़ी दूर निकले थे तो ड्राईवर ने कहा कि सर तेल कम है इसलिए पम्प पर चलना पड़ेगा.ऐसे में बड़ा अजीब लगा कि आज ही इसका तेल- पानी भी कम होना था...खैर वो भी जरुरी था...लिया वो भी....ड्राईवर साहब तोतले बोलने वाले थे ....आधी बात समझ आये आधी बात सर से हां-ना हो रही थी....खैर साउथ एक्स आते- आते मेरी हालत और बिगड़ गयी...सफदरजंग अस्पताल के सामने पंहुचा तो ड्राईवर को बोला कि गाड़ी इमरजेंसी में ले चलो.....सभी घबराए....कि क्या हुआ? ...हालत लगता है ज्यादा ख़राब तो नहीं? ....खैर गए अमर्जेंसी में....डॉक्टर का झुण्ड अलग -अलग बैठा था... जैसा रेस्टोरेंट में होता है....२ लोग [डॉक्टर] उस टेबल में ३ उस टेबल में....कोई मरीज को देख रहा था कोई लैपटॉप में चैटिंग या मेल चेक करने में लगा हुआ था....खैर....एक टेबल पर गया बाद में पता चला कि वो हड्डीयौं का है...टूट फूट वाले मरीज़ जाते हैं उसके पास....वो बोला सामने जाओ...सामने गया तो पता चला कि वो कही और ब्यस्त था....और शक्ल से नोर्थ ईस्ट का रहने वाला लग रहा था...डॉक्टर को हेल्लो कहा और प्रॉब्लम बताई...उसने पुछा कि कहाँ गए थे ?क्या कर रहे थे....? जैसे कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो मैंने.......उसका भी सायद प्रश्न ठीक था...क्यूंकि रात के १२:३० बज रहे थे...फिर वही डॉक्टर बोला कि बगल वाली बिल्डिंग में चले जाओ...वहां फ्लू वाला डॉक्टर होगा...उसको दिखाओ....निकला बाहर....बगल वाली बिल्डिंग देखि....दरवाजा खट-खटाया तो गार्ड बहार आया और बोला क्या बात है....फिर पूछा मरीज़ कहा है....?
राजेश ने बताया कि यह है..मेरी ओर इशारा कर के.....फिर टेबल पर बैठा...डॉक्टर बोला कि अपना कोट खोलो...और स्वेटर भी ....उसने मुह में पहनने के लिए मास्क दिया....इस बीच उसने गले में प्रेस कार्ड देख लिया....पूछा प्रेस से हो ? मैंने कहाँ हाँ ! जोर्निलिस्ट हूँ रास्ट्रीय न्यूज़ चैनल में ! और ऑफिस से घर जा रहा था...बस हालत खराब हो गई आपके दर्शन के लिए आना पड़ा....अभी....उसने साड़ी बात पूछ पाच के बोला ठीक है एमर्जंसी में जाना होगा..बाहर से आओ..में अन्दर से आता हूँ ...फिर बाहर गया...फिर से वही शुरू वाला डोक्टर के पास ...इस बीच इस डोक्टर ने कुछ उस डोक्टर को बताया.....और कहा कि इनको नेबुलैज करना है....वो भी पहली बार पता चला कि यह भी होता है...फिल्मू में देखा था....फिर मुझे बैठा दिया एक बेंच में और कोने में...और मुह में एक ओक्सिजन वाला मास्क चिपका दिया....और बगल में एक सिलिंडर जिसमे से हवा और पानी कि एक छोटी सी बोतल.... जिसमे से पानी कि कुछ बूँदें टपक रही थी....मास्क मेरे नाक पर रख कर चिपका दिया ...थोड़ी देर बाद थोड़ी राहत मिली....कुछ कुछ....तक़रीबन २० मिनट तक चिपका के रखा फिर निकाल दिया और अन्दर सिस्टर के पास ले गए....सिस्टर बोली अब तक कहाँ था....डांटते हुए....गुस्सा बहुत आया..एक तो आदमी बीमार ऊपर से ये दांत रही है....मैन्नार्स नाम की कोई चीज़ भी है इसे? फिर सोचा की में तो हॉस्पिटल में हूँ....इंडिया के हॉस्पिटल में यही मैन्नार्स होता है....खैर नहीं तो ऊंची आवाज तो में भगवन की भी न सुनूँ....खैर मतलब अपना था...तकलीफ अपनी थी....इसलिए चुप रहा ....उसने इंजेक्सन निकाल कर मेरे हथेली में उलटी तरफ एक सुई घुसा दी ....भगवान् जाने कौन सी दवा थी.....खैर सरकारी अस्पताल था यकीन कर भी सकता था और नहीं भी...मन दुबिधा में था...मगर दुःख में डोक्टर भगवान् होता है...इसलिए मेरे साथ भी वही हुआ....लेकिन यहाँ लगता कि प्रेस कार्ड काम कर गया...जिस कारन थोड़े अलर्ट हो गए वे डॉक्टर....वरना हम और लोगों की हालत देख रहे थे.....फिर बताया कि फिर से एक बार और नेबुलैज़ करना होगा...चलो करेंगे भाई....उतनी देर में एक लड़की को और वही मास्क चिपका दिया...जो मुझे लगाया था....उसी के साथ मुझे भी बैठा दिया......और फिर से वही २० मिनट....राजेश जी सेवा पानी में लगे हुए थे....वो पूछ के आये डॉक्टर को कि क्या करना है आगे?....फ्लू वाले डॉक्टर ने बताया कि आपको इसके बाद ३२ नंबर कमरे में जाना है.....जो मुझे राजेश द्वारा बताया गया....राजेश को दवाई /मेडिकल कि जानकारी अछी थी....मेरी किस्मत से....भला हो उसका....मुझे घर भी छोड़ गया बाद में....खैर इस बीच मैंने कहा कि बाकी साथी को घर छोड़ दो......ड्राईवर को बोलना कि हॉस्पिटल में आ जाए..रिलीव हो गए तो ठीक है नहीं तो ऑफिस चला जायेगा....खैर २० मिनट हुए और विवेक और वरुण ने घर जाने से मना कर दिया और एक साथी घर चला गया...वे बाहर ठण्ड में ठिठुर रहे थे ...राजेश मेरे साथ ही था अन्दर...क्युओंकी एक को ही साथ रहने कि इजाजद थी......

में और राजेश दोनों गए लिफ्ट की ओर ......३२ नंबर कमरा कहा हैं....पता लगा कि तीसरी मंजिल में हैं....हमारे आगे एक सिस्टर जा रही थी...लिफ्ट का बटन दबाया उन्हूने जैसे ही लिफ्ट का दरवाजा खुला सामने से मुर्दा निकला बाहर .....एक ब्यक्ति लेटे मुर्दे को बाहर धकेल रहा था....रात के १:०० , १:३० बजे और सुन शान हॉस्पिटल में मुर्दे से आमना -सामना....हे भगवान् ! कैसे कैसे विचार दिल में ....मुर्दा निकला तो स्ट्रेचर में उसके पैर के पास एक रजिस्टर रखा हुआ था.....टेडी नज़र उसकी और देखा और इतनी देर में लिफ्ट का दरवाजा खुला और सामने गार्ड बैठा नज़र आया...सिस्टर अपने रूम में चली गई ...सायद सोने जा रही थी....सरकारी हॉस्पिटल हुआ न....सर्दी का टाइम मरीज भी कम हुए.....पहले देखते रहे कहा जाना है किस कमरे में जाना है....फिर गार्ड से पुछा भाई ३२ में जाना है....वो उठा और ले गया वार्ड के अन्दर से जहा डोक्टर बैठा हुआ था दो नर्स भी बैठी थी...देखा तो बोला मरीज बाहर और राजेश ने बात की ...उसने बाहर आ कर पीठ में चेक अप किया...पूछा कहा गया था किधर से आया....फलां ....फलां....?फिर अंगुली में कुछ रिंग जैसी डाली उसमे कुछ नम्बर दिख रहे थे....मुझे कहा कि आप पीठ मेरी और कर के खड़े रहिये..पत्रकार हुए हर चीज़ देखने पढने कि आदत हुई......फिर कहा कि नीच चले जाइये और एक्स -रे कर के लाइए..मैंने सोचा इसने पल्ला झाड लिया....और इस रात को सरकारी हॉस्पिटल में कौन एक्स रे करेगा मेरा....खैर नीचे गए राजेश आगे- आगे में पीछे पीछे.......तब तक ब्रेथिंग में थोडा आराम मिल गया था....थैंक्स नेबुलैज़ का .....नीचे गए तो सु-सु लग गई...अब टोइलेट/बाथरूम कहा मिलेगा...थोडा उधर को गए तो कुत्ते बैठे थे....फिर डर भी लगा कि कही काट न ले....राजेश बोला कर ले यार कही भी दिवार के पीछे...कौन देख रहा है.....मैंने भी सोचा कर लेना चाहिए और रही कुत्ते वाली बात तो यहाँ मेरे जैसे पता नहीं कितने आते होंगे....सु-सु करने...सुना है सु सु करते समय कुत्ता भी नहीं काटता ...सोचा पहले सु-सु कर लूं फिर देखा जायेगा......और वैसे भी कुत्ते भी जानते ही होंगे.....आदत हो गई होगी इनको भी कि सु सु करने आया है......शुक्र कि वे भौंके नहीं..... न ही पीछे भागे.....फिर चल पड़े वो एक्स रे वाला कमरा ढूँढने.....एक कमरे का दरवाजा खुला था...उसके अन्दर देखा तो एक आदमी सोया था..उसने हमारा कागज देखा तो बोला रुको....वो उठा और बगल वाले हॉल में ले गया और पुराने बटन दबाये....फिर एक जैसे रेलवे प्लात्फोर्म में वजन नापने वाली रंग बिरंगी मशीन लगी होती है वैसी थी...मगर वो रन बिरंगी नहीं थी....मैंने सोचा आये हैं एक्स रे के लिए और वजन क्योँ नाप रहा है ये...उसने मुझे उसके ऊपर खड़ा होने को कहा और में घबराते हुए खड़ा हो गया....और फिर मशीन को कहा कि टाईट पकड़ा लो..जैसे किसी को गले लगाना हो..गले लगाया..इतनी देर में उसने कहा कि चलो आधे घंटे बाद आना....और ले जाना.....एक्स रे ...जिंदगी में पहली बार करवाया था एक्स रे ....अब तक लोगो के हाथ में ले जाते हुए या फिर फिल्म में देखा था मैंने...सोचा बड़ा आसान है और बड़ी जल्दी हुआ एक्स रे ....बाहर आये राजेश बोला चल चाय पी लेते हैं........गए बाहर तो विवेक और वरुण दोनू बैठे हुए थे.....बेसर्ब्री से .....वरुण बोला सर चाय लता हूँ आपके लिए ..... वरुण मेरे लिए चाय लाया और राजेश को भी दी...वरुण ने नहीं पी....और विवेक गायब...सायद सु - सु करने चला गया था......थोड़ी देर बाद टाइम हुआ और राजेश बोला चल एक्स रे ले आते हैं ..... ...तब तक ड्राईवर भी आ गया....गाड़ी ले कर......गए अन्दर एक्स रे लिया....और वो आदमी सोया हुआ था......पूछा भैया ले जाएँ क्या? वो बोला ले जाओ....वो फिर सो गया...सरकारी हॉस्पिटल हुआ न ......ठाट ही कुछ और हैं.......खैर ऊपर गए ३२ नंबर में..डॉक्टर ने देखा ....फिर कुछ लिखा और बोला कि दवाई ले लेना तीन दिन कम से कम रेस्ट और आराम न हो तो चार दिन और ले लेना....फिर हमें रवाना करने वाला था...डॉक्टर पूछ बैठा कि क्या करते हो?......उसे पता चला कि बेचारा पत्रकार है तो इशारा किया सिस्टर को कुछ ......सिस्टर उठी और उसने एक मोटा सा इंजेक्सन मेरी हथेली में घुसा दिया ....और हम चले आये...गाड़ी में बैठे...घर तक राजेश छोड़ने आया....फिर चला गया....घर वालू को पता नहीं था कि में हॉस्पिटल से आ रहा हूँ ....

रात १० बजे के आस पास मैंने मामी को फ़ोन कर कहा था कि मेरे लिए गरम पानी रख देना....ऑफिस में अपने बरिष्ठ राम सर को मैंने एस एम् एस से सूचित कर दिया था......सबसे पहले उनको ही मैंने बताया था.....घर आया...सो थोड़ी नींद आई ....और एक हफ्ते घर से बाहर नहीं निकला.........रोज़ वही टेबलेट, सिरप, गोली गटकना !..कोशिश है ऐसा न हो दुबारा......ऑफिस से सभी बरिष्ठ और साथी लोगों ने फ़ोन पर हाल पूछा और आराम करने को कहा ........अमित सर, राम सर, रुपेश सर, सह्नावाज़ सर, निगम सर, अजीत, हासिम,तरुण, अभिषेक...राम....सभी ने अभिषेक राजेश...........धन्यवाद सभी का.....एक हफ्ते के आराम और इलाज़ के बाद फिर से संडे को ऑफिस ज्वाइन किया.....कुल मिला कर सरकारी हॉस्पिटल ने बचा लिया.........

शनिवार, 9 जनवरी 2010

ड्रामा तीन पागलों का ....





चेतन भगत ने आंखिर माफ़ी मांग ही ली....सुबह अखबार पढ़ा तो पता चला की आमिर खान से माफ़ी मांगी है...और दूसरे लोगू से माफ़ी मांगी या नहीं... उसका पता नहीं अभी....खैर इंडियन लेखक...सबसे ज्यादा इंडियन बुक, जो बिकी हो वो वाले लेखक...और पता नहीं क्या क्या....थ्री मिस्टेक ऑफ़ माय लाइफ...हो या वन नाईट @ कॉल सेंटर या फिर झगडे की जड़ वाली किताब फाइव पॉइंट सम वन.......के लेखक चेतन भगत.... ने ऐसा क्योँ किया ?किस लिए किया?.ये तो वही जाने और थोडा बहुत लोग जानते भी हैं जो भी है कही न कही अपनी फजीहत तो करा ही ली.....वे पहले से ही अपनी मार्केट बना चुके थे और उनकी किताब बिक भी रही थी....फिर भी बॉलीवुड से पंगा...वो भी आमिर जैसे टीम से ....क्या कह सकते हैं...?जो भी हो..पिछले दिनू नॉएडा में हुई प्रेस कांफेरेंस जिसमे विधु विनोद चोपड़ा मीडिया पर बिफर पड़े थे और 'शट अप' जैसा शब्द खुल्लम-खुल्ला बोल दिया था....मीडिया काफी नाराज़ हुआ इसके बाद और दुसरे दिन ही माफ़ी भी मांग ली मीडिया से , प्रेस कांफेरेंस करवा कर...हिंदुस्तान में पहले कतल कर दो फिर सॉरी बोल दो....प्रचलन पुराना है और अब यह हमारे खून में घुस चूका है....कुल मिला कर यह सब ड्रामा चेतन भगत और विधु विनोद चोपड़ा और आमिर खान जैसे ब्यक्ति से जुड़ा रहा ....और जो आमिर भेस बदल बदल कर पुरे देश में घूम रहे थे और जनता देख रही थी आमिर का परफेक्ट ड्रामा पर एक दम से नॉएडा की प्रेस कांफेरेंस ने विराम लगा दिया.....आंखिर वाद विवाद का दौर शुरू हुआ ...और यहाँ तक कह दिया गया की वे अब चेतन भगत का चेहरा देखना तक पसंद नहीं करेंगे.....फिल्म के लिए स्क्रिप्ट खरीदी या फिर वैसे ही दी या फिर जो भी समझौता हुआ ..उसके बावजूद ऐसा झगडा होना वो भी एक लेखक एक फिल्म मेकर और एक उम्दा कलाकार के बीच ऐसा झगडा होना वो भी मीडिया के सामने......देख कर शर्म आई...वजह जो भी हो दिमाग वाली बात कही रही नहीं ....कुछ भी हो...में इस विवाद के पीछे क्या बाते हैं , थी...या फिर होंगी....उस पर नहीं जाना चाहता .....जो भी है जनता को बेवकूफ बनाने की है...और दोनु को इसका फ़ायदा हुआ है....फिल्म, भी हित और किताब भी बिकेगी.....कुकी जो फिल देखेगा वो किताब कभी नहीं पढता होगा तब भी पढ़ेगा......इसकी को कहते हैं अंग्रेजी में 'कुरिओसिटी मैनिया'....जो हम लोगूँ में होती है......कुल मिलकर आमिर का बनारसी पान,साडी और शादी का ड्रामा बनाम चेतन भगत के कमरे से सीधा पर्सारण.... एक नया अध्याय लाया देश में ...की कैसे लड़ के सफलता छीनी जा सकती है !

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नए साल का पहला दिन....ऑफिस में पार्टी !

नए साल पर हमेशा की तरह ममी जी ने मुझे नए साल की बधाई दी और आशीर्वाद .....उठा तो देखा की फ़ोन में काफी मैसेज आये हैं ....शुभ काम नाए लोगूँ ने दी और मैंने उनको.... तैयार हुआ .......खीर बना रखी थी घर पर ममी ने.....बहुत स्वादिस्ट थी....और जब ३१ जनवरी की रात ३ बजे घर पंहुचा था तो गाजर का हलवा ममी ने बना रखा था...बहुत स्वादिस्ट था....थका था बहुत....१:३० बजे रात तक डेस्क पर ही थे....मुंबई, दिल्ली से लाइव पार्टी जा रही थी, नए वर्ष के अवसर पर....२ बजे ऑफिस से निकला....न्यूज़ रूम का माहौल भी अपने आप धीरे धीरे बदलने लगता है....बेशक न्यूज़ रूम में ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिलता है....बावजूद इसके एक दुसरे के साथ ....विश करके लोगूँ को खुशिया देकर सकूं फील कर लेते हैं....एक जनवरी को ऑफिस पंहुचा तो देखा की ४:३० पर पार्टी का मेल आया हुआ था...नया वर्ष पर पार्टी का आयोजन किया गया था....सभी कर्म्चारियौं को निमंत्रण था.....गए भी .....नाच, गाना, पीना [कोल्ड-ड्रिंक] ,पेस्टी.....अच्छा लगा, साथी लोगूँ को खुश देख कर.....और ख़ुशी हो तो फिजा का रंग और ही हो जाता है....ऐसा ही कैफेटेरिया में देखने को मिला...नए साल का पहला दिन पार्टी, और नाच गाने के साथ हो तो क्या कहने....वही हुआ .....शुक्रिया सभी का....और शुक्रिया पिछले साल को जो चला गया लेकिन बहुत यादे भी अपने पीछे छोड़ गया.....सफलता , असफलता , दुःख , सुख सब लगा रहता है......लेकीन इक पल अपने साथ जीना अपने साथ काम करने वालू को के साथ जीना , वाकई खूब था....बाई बाई २००९ , वेलकम २०१० ....................

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

हैप्पी न्यू इयर २०१०


नया साल ! हमेसा की तरह इस साल भी नया पुराना साल गया और नया साल आया, में न्यूज़ रूम में था और मुंबई, दिल्ली और अन्य शहरू से सीधा पर्सारण न्यूज़ रूम में देख रहा था और लोगू को खुसी और जिन्दा दिली देख रहा था कैसे लोग नए साल की तयारी में घर से निकल कर थिरक रहे थे, गा रहे थे, गले मिल रहे थे,खा रहे थे, पी रहे थे और पता नहीं क्या क्या....कहते हैं न ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं होता है....वही हुआ ....न्यूज़ रूम में रात के बारह बजते ही सभी सथियौं ने एक दुसरे को बधाई दी,,हमारे डेस्क में हमारे बरिष्ठ राम सर आये और सबको बधाई दी & आशीर्वाद, मेरे साथी अभिषेक, वरुण,आउट पुट डेस्क से सभी साथी और अन्य ने आपस में नए साल के आगमन पर खुशी बांटी.......अच्छा लगा...रात के तक़रीबन १ बजने को है और अब घर भी जाना है....काफी लोगू के फोन आये ..और नए साल की विश के साथ सबसे बात हुई....देखते हैं आने वाला साल क्या ले कर आता है....इश्वर करे सब के लिए ख़ुशी लाये और तरक्की दे सब को....यही दिल की तमन्ना है .......एक बार फिर से नए साल की सभी को हार्दिक शुभ कामना है.......हैप्पी न्यू इयर २०१० !

रविवार, 20 दिसंबर 2009

बी जे पी का नया चेहरा नितिन गडकरी ....


भारतीय जनता पार्टी आंखिर मंथन के दौर से बहार निकल ही गई, हेवी वेट नेताऊ को छोड़ कर नए नवेले नितिन गडकरी को पार्टी का रास्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है....आंखिर संघ ने फिर से पार्टी की नाक दबाई, और अपना काम कर दिया...गडकरी को पडोसी होने के फ़ायदा भी मिला संघ का ...खैर ये तो इत्तेफाक की बात है....आंखिर संघ को भी देर सबेर समझ आ ही गया....भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि वे केन्द्रीय राजनीति के लिए नए है और पार्टी ने उनके कंधों पर बडी जिम्मेदारी सौंपी है। जिसे वे आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शन में पूरी करने की कोशिश करेंगे।अडवाणी कितना साथ देते हैं और आशीर्वाद ये दो सालू में देखने को मिलेगा लेकिन अडवाणी के लिए भी यह एक खतरे की घंटी है...राजनाथ सिंह तो गाजिआबाद में ही सिमट के रह गए हैं अब...गडकरी अडवाणी से मिलने गए थे और वेंकियाह नायडू भी साथ में थे...खैर एक बात तो है आने वाले दिनू में भारतीय जनता पार्टी के लिए देखने वाले दिन होंगे....52 वर्षीय नितिन गडकरी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले महाराष्ट्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे. वो महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य भी हैं.जन्म महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में एक ब्रह्मण परिवार में हुआ. और उन्होंने एलएलबी और एमकॉम तक की शिक्षा ली है। चुनाव आयोग ने उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था, चुनाव के दौरान उन्हूने मनमोहन सिंह के खिलाफ आप्पति जनक टिपण्णी की थी.....एक बात तय है राजनीती के केंद्र रहे उत्तर परदेश बिहार जैसे राज्य अब काफी पीछे रह गए हैं , रास्ट्रीय राजनीती में महारास्त्र अब इन सबमे ऊपर आ गया है...चाहे मनसे हो , शिव सेना हो या फिर अब नितिन गडकरी के रूप में भारतीय जनता पार्टी ...केंद्र बिंदु राजनीती का महारास्त्र....! अगले दो साल तक कोई बड़ा चुनाव भी नहीं है...और वैसे भी अभी वरिष्ठ नेताऊ की भड़ास तो निकलनी बाकी है....फिर राहुल बनाम नितिन की लड़ाई तो रहेगी ही ...दोनु युवा हैं और अच्छे पढ़े लिखे भी.....देखते रहिये होता है क्या ......

रविवार, 13 दिसंबर 2009

आमिर का 'बनारसी अंदाज'.......

आमिर खान ......! जी हाँ हमेशा से ही एक ऐसा नाम... जिसने हिंदी सिनेमा में अपना अलग मुकाम बनाया है....जिस सख्स ने हिंदी सिनेमा को अच्छी फिल्मे दी हो .... और हिंदी सिनेमा उन्हें एक सफल कलाकार मानता हो ... और वे हैं भी....आमिर हमेशा से ही मेरे मनपसंद के कलाकार रहे हैं, सबसे बड़ी बात है उनका काम करने का तरीका... सबसे हटके ...और दिल को छू जाने वाला...उनकी पहली फिल्म 'क़यामत से क़यामत तक 'से लेकर आज ताक उन्हूने बेहतरीन फिल्मे दी हैं ...पहली फिल्म के प्रोमोशन पर उन्हूने खुद आधी रात में पोस्टर मुंबई के सडकू पर चिपकाए थे , वह भी एक परमोशन था, और आज भी एक परमोशन ....बनारास के जो दृश्य हमें देखने को मिले मीडिया के द्वारा....कुछ हटकर था..., भेष बदलकर वे बनारस की गलियौं में घूमे, लोगू से मिले, ख़ास अंदाज में.....वही बनारसी अन्ज्दाज में......और आज का मीडिया जो अपने आप को तेज़ मानता है कुछ नहीं कर सका, जब चिडया चूक गई खेत तब क्या हो ........मुह में पान चबाये.....गले में मफलर लपेटे, हलकी दाढ़ी.... कोई और नहीं बल्कि आमिर जैसा कलाकार ही ऐसा कर सकता है ...... और यह एक ज़मीन से जुड़े हुए आम आदमी के किरदार निभाने वाले कलाकार की ख़ास बात है....काबिले तारीफ ! वरना बोलीवूड में चिकने-चुपड़े कलाकार कहा तंग गलियौं में आयेंगे ये कोई सोच भी नहीं सकता...आमिर जैसा कलाकार ही ऐसा कर सकता है....उम्मीद है उनकी ''थ्री इडियट्स' या तीन बुद्धू कहु तो ठीक ही होगा न ? फिल्म भी और फिल्मू की तरह ही हिट होगी...मेरी सुभकामना .......!

Дели: правительство Индии вводит запрет на 59 китайских приложений, включая работу Tiktok в Индии, в том числе UC Brozer

-Collab на Facebook может заменить Tik Tok, может скоро запустить Collab в Индии -Решение заставило китайские технологические компании сд...