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बुधवार, 29 अगस्त 2012

हुक्का, हुक्का नहीं है.....बल्कि बहुत कुछ है !

 
 
हुक्के का भी अपना अंदाज है, इज्ज़त और रूतबा है...किसी को हुक्का ना पिलाओ तो मुश्किल और किसी को पिला दो तो आफ़त..अब यह आपको चुनना है, कब किसे और कहाँ हुक्का पिलाना है...बीडी,आज तक किसी की हो नहीं पाई ...और सिगरेट किसी को अपना नहीं पाया..लेकिन जितनी इज्जत हुक्के को मिली समाज में...खासकर उत्तर भारतीय समाज में उतनी इंसान को भी नहीं मिल पाई ..इस हुक्के की गुडगुडाहट ने ऐसी हुंकार भरी की आज कई जगह 'हुक्का बार' तक खुल बैठे हैं...लोग कह रहे हैं अगर धुएं को उडाना है, तो फिक्र के साथ क्यों उड़ायें, बल्कि खुसी साथ उडाओं ..आज सुबह उठ कर अपने पुराने मित्र के घर पर गया तो ये नज़ारा दिखा...उसकी की एक छोटी सी झलक आपके लिए ...

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