पृष्ठ

रविवार, 18 अप्रैल 2010

मैं, मेरी मछली और चोर बाज़ार.......



चोर बाज़ार ! जी हाँ चोर बाज़ार.......दिल्ली का प्रशिद्ध बाज़ार, जहा कहते थे कि आदमी भी बिक जाता था ! सामान तो दूर कि बात है....ऐसा नाम जिसको सुन कर एक बार इंसान जरुर सोचता है, जाऊं या न जाऊं ?जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए?देखना चाहिए या नहीं देखना चाहिए? वहां से सामान खरीदा जाये या नहीं ? ऐसे कई सवाल हैं जिनको इंसान अपने दिमाग में रख कर जद्दोजहद करता रहता है, लेकिन हर इंसान के जहन में यह ख्याल जरुरी आता है कि चलो एक बार देख लिया जाये.....

में भी जब दिल्ली विश्विद्यालय में पढता था उस समय मुझे भी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ! मेरे घर के सामने से सीधे पुरानी दिल्ली की बस जाया करती थी और बैठ गया उसमे. ...दिन इतवार था. चोर बाज़ार इतवार के दिन ही लगा करता था और अब भी लगता है, लेकिन अब स्वरुप बदल गया है जगह बदल गई है....पहले लाल किला के पीछे लगा करता था मिटटी में जहाँ पर अब हरा भरा पार्क बन गया है और अब लाल किले के सामने डामर रोड के किनारे लगा करता है..लेकिन पहले जैसा भरा और भरपूर नहीं लगता है.

में जब पहली बार गया तो देखा बस लाल किला तो पहुच गई और कंडक्टर चोर बाज़ार लाल किला वाले उतर जाओ चिल्लाने लगा...जैसे उसके सर से बोझ उतर गया है....लेकिन ये क्या ? बाहर देखा तो रोड में ३-4 लड़के बाग़ रहे हैं...फुल स्पीड में ! में दर सा गया फिर देखा डरने वाली बात क्या है मैंने कौन सा गुनाह कर दिया...दिल में दर भी था चोर बाज़ार जा रहा होऊ...कई तरह की कहानी सुन राखी थी...फिर देखा मैंने उन लड़कों के हाथ में लोकल, इम्पोर्टिड जैसे लगने वाले जूते -चप्पल थे. पुलिस वाले या फिर एमसीडी वाले उनको जहाँ तहां बेचने की परमिसन नहीं होगी..इसलिए वे जब भी दौरे पर आते हैं ये लोग सामान और अपने आप को बचाने की जुगत में भाग खड़े होते....थोडा आगे गया तो नीबू पानी और जलजीरा वाला खड़ा था....सब पी रहे थे मुझे भी प्यास लगी थी 2 गिलास गटक गया...रूपया अठन्नी ली, चवन्नी की एक गिलास ! मस्त था पानी...साड़ी घर से लाल किला तक पहुचने में जो थकान लगी और जो पांच रुपये दिए किराए सब वसूल हो गए...थोडा आगे गए तो दो तीन भिखारी दिखे एक बुढिया जिसके हाथ नहीं थे....सोचा ऐसे लोग क्योँ हो जाते हैं, लेकिन सायद वे भिखारी उसी हालात में अपने आप को ढाल लेते हैं और खुस रहते हैं...दूसरा लकड़ी की तख़्त से बना फट्टा और नीचे लोहे की बैरिंग पर बैठा हुआ है और एक औरत उसको धकेल रही है....कम वही भीख ! लेकिन मैंने नहीं दी उन्हें, क्योँ कि मुझे भिखारी नहीं लगे !लेकिन उनके कटोरे को देख कर लगा ठीक थक कम लेते हैं वो लोग! फिर आगे थोडा आगे गया तो एक बोतल में मछली बेच रहा था....बोतल 1 रुपये से लेकर 1000 तक कि थी....मुझे अछी लगी एक बोतल ली मैंने 10 रुपये कि और 4 मछली उसके अन्दर थी...

अन्दर घुसा तो देखा रंगीन टीवी जो 20000 का है और केवल 1500-2000 रुपये के बीच में लोग ले जा रहे थे...क्या था क्या नहीं .लेकिन टीवी दिख रहा था...लेकिन गारंटी कोई नहीं, कोई पर्ची नहीं सिर्फ चला कर दिखा देंगे...और ले जाओ !वाह क्या बात है...कपडे 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक बाकी मन मर्जी है, जितने में मना सको दूकान वाले को . सब जमीन पर बैठे हुए हैं. कालीन हज़ारों रुपये क़ी लेकिन इतने पैसे नहीं थे.......और कोई इरादा भी नहीं था...डम्बल बॉडी बनाने के लिए वाह ! गजब के थे...पौंड के हिसाब से मिल रहे थे..कुल मिलाकर 1-2 घंटे घूम कर देखा तो सब कुछ उपलब्ध था....रेट जितना लड़-झकड़ तय कर सको...एक और चीज़ देखि जो जानकारी के लिए अछा था....सामने ऑटो में पोलिस वाले कुछ चेक कर रहे थे.....पता लगा वो सामान चेक कर रहे हैं...सामान को, और अब ग्राहक फस गया कोई पर्ची नहीं कोई कोई रिकॉर्ड नहीं अब वो क्या जवाब दे.....कुछ सामन चोरी का भी होता था....इसलिए जो ले जा पाया अच्छी बात है जो नहीं ले जा पाया लड़ते रहो....लेकिन अब ऐसा नहीं है....
दूसरा जो सबसे अच्छी चीज़ लगी चिड़िया बिक रही थी...दुःख भी हो रहा था पिंजरे में देख कर.....आज़ाद पंछी आज़ाद न रहा! इन्दगी में पहली बार देखा कि प्रकृति का हवा का खिलौना 'चिड़िया' भी बिकती है...कबूतर....बटेर...गोरैया, तोता और पता नहीं कितनी रंग विरंगी...लोग खरीद रहे थे में देखा जा रहा था...मज़ा आ रहा था....मुझे शौक भी नहीं था ...मगर मेरे हाथ में मछली थी....बोतल के अन्दर...में भी घूम रहा था, मछली को भी चोर बाज़ार घुमा रहा था...कभी एक हाथ से पकड़ता कभी दोनू हाथों से बोतल को ...मछली कभी ऊपर कभी नीचे तैरती रहती..लाल , हरी , पीली मछली थी....ख़ुशी थी कुछ तो खरीदा मैंने...चोर बाज़ार से, पोलिस वाले ने भी नहीं पूछा?सब ठीक-ठाक !अब लगने लगी भूख क्या खाऊं? वहां के हालात देख कर खाने का मन नहीं कर रहा था, लोगों को देखू तो भूख लग रही थी....और फिर मेरे साथ मेरी मछली भी तो थी....वो भी भूखी बेचारी तैर रही थी. बाज़ार से बहार निकल आया तो देखा एक नीम के पेड़ के नीचे एक केले वाला खड़ा है, केले जमीन पर थे लेकिन थे ठीक थक...सोचा यही मंजिल है....6 केले लिए और पेट के अन्दर शहीद कर दिए...लेकिन कहते हैं न भूख बहुत खराब चीज़ होती है...में फिर से अपनी मछली को कुछ नहीं खिला पाया....पेट भर गया मेरा...लेकिन मेरी मछली फिर भी भूखी रही...पूछ भी नहीं पाया किसी से ....खौफ था दिल में...कहीं कोई पुलिस वाला पूछ न ले ?चोर बाज़ार से आ रहा था ना ?4-5 चक्कर लगाने के बाद, किताब बाज़ार देखने के बाद घर जाने का वक्त आया...और में बस के बारे में पुचा कहा मिलेगी पता लगा वहीं पर आती है...एक और गोलचा सिनेमा हाल भी देखा...पहली बार...दिल्ली का प्रशिद्ध सिनेमा हॉल हुआ करता था, और इसे अवार्ड भी मिला सबसे ज्यादा समय तक फिल्म चलाने का, सायद मुगले-ए-आज़म थी !कभी....खैर बस आई बैठा और पांच रुपये दिए यात्रा पत्र लिया कंडक्टर से और घर का रास्ता नापने लगी बस !

थोड़ी दूर पहुंचा तो देखा..एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ मेरे बगल वाली सीट पर बैठा...वो कभी मुझे देखे कभी मेरी मछली को....मैंने पूछा पकड़ोगे..उसने सर हिलाया हाँ में...और मैंने उसके हाथ में बोतल दे दी..उसके चेहरे में खुशी देखकर मुझे भी हर्ष हुआ........उसके पिता ने पूछा बेटे कहा से लाये और कितने की ? मैंने सब कुछ बताया.....फिर मैंने कहा कि ये भूखे हैं और कुछ खिला नहीं पाया बोतल खोलूं तो कही मन ना जाये...और मुझे जानकारी भी नहीं थी क्या खाते हैं....छोटा मासूम बोला इनके लिए दाने आते हैं....हमारे घर में हैं...दाने? जी हाँ उसने कहा हमारे घर में भी मछली हैं...बड़ी बड़ी....एक्वेरियम कि बात कर रहा था वो....मैंने कहा गुड ! अच है...तो तुम जानते हो....?उसके पिता ने कहा बेटा इसके लिए चारा होता है...और बाज़ार में मिलता है....ओह्ह ! मैंने कहा मुझे तो जानकारी नहीं है....और नदी में ऐसी ही रहते हैं यहाँ पर भी ऐसे ही रहती होगी....या फिर रोटी चांवल खाती होगी.वो दे देंगे.....मैंने देखा बच्चे ने हाथ में बड़े प्यार से बोतल पकड़ रखी थी...मैंने कहा छोटे आप रख लो इसे, आप जानते भी हैं पालना और खिलाना ! मुझे जानकारी भी ,कहीं मर जाएँगी ! आपके पास सुरक्षित तो रहेंगी. उसके पिता ने फटक से मना किया, लेकिन मैंने कहा अंकल एक ही बात है , बच्चा तो खुश रहेगा ...मगर वादा कीजिये? आप जिन्दा रखेंगे और सेफ रखेंगे और भूखा नहीं रखेंगे...मेरी मछली को....उन्हूने कहा नहीं रखेंगे.....मेरे घर में दो एक्वेरियम पहले से हैं ,आप चिंता न करें ! थोड़ी देर बाद उनका बस स्टॉप आ आया और वो दोनू उतर गए...मेरी मछली लेकर....!छोटा बच्चा मुझे हाथ से टा-टा करता रहा ...और बस आगे चलती रही.....

कोई टिप्पणी नहीं: